मुहूर्त कैसे तय होता है

पंचांग से किसी महत्वपूर्ण कार्य का शुभ समय कैसे चुना जाता है, और कौन-से नियम अनिवार्य हैं तथा कौन-से केवल श्रेष्ठ।

मुहूर्त क्या है

मुहूर्त वह समय-खण्ड है जिसे किसी विशेष कार्य के लिए अनुकूल माना जाता है। यह समय की एक इकाई का भी नाम है, जो लगभग 48 मिनट की होती है। बोलचाल में इसका अर्थ है "कार्य आरंभ करने का सही समय"।

मान्यता है कि हर क्षण का अपना गुण होता है, जो चन्द्रमा की स्थिति, तिथि, वार और सूर्य की स्थिति से बनता है। ज्योतिष की जिस शाखा में इसका अध्ययन होता है, उसे मुहूर्त शास्त्र कहते हैं। उसका उद्देश्य है कि विवाह या गृह प्रवेश जैसा बड़ा कार्य ऐसे समय शुरू हो जब परिस्थितियाँ साथ दें।

मुहूर्त के घटक

अधिकतर नियम पंचांग के अंगों से बनते हैं।

  • तिथि: चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी रिक्ता (खाली) कही जाती हैं और प्रायः वर्जित हैं। अमावस्या भी अधिकांश शुभ आरंभों में वर्जित है।
  • वार: शुभ और उत्सव के कार्यों के लिए सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार सबसे अधिक माने जाते हैं; मंगलवार और शनिवार से प्रायः बचा जाता है।
  • नक्षत्र: कुछ नक्षत्र सौम्य और स्थिर हैं, कुछ उग्र। हर कार्य की अपनी पसंदीदा सूची है।
  • योग और करण: ये दिन के और विभाजन हैं। इनमें करण भद्रा (विष्टि) नए कार्य के लिए वर्जित मानी जाती है।
  • मास और ऋतु: कुछ कार्यों के लिए कुछ मास श्रेष्ठ हैं और कुछ काल वर्जित।

जिन कालों से प्रायः बचा जाता है

  • चातुर्मास: देवशयनी एकादशी से प्रबोधिनी एकादशी तक के चार माह। इनमें विवाह, गृह प्रवेश और उपनयन नहीं होते।
  • खरमास: सूर्य के धनु या मीन राशि में रहने का समय।
  • अधिक मास: लगभग हर तीन वर्ष में जुड़ने वाला अतिरिक्त चान्द्र मास।
  • पितृ पक्ष: पितरों के स्मरण का पखवाड़ा, जिसमें नई खरीद और उत्सवों से बचा जाता है।
  • गुरु अस्त और शुक्र अस्त: बृहस्पति या शुक्र के सूर्य के इतने निकट होने का समय कि दिखाई न दें, जो अक्सर एक माह या अधिक चलता है। विवाह, उपनयन और मुण्डन वर्जित रहते हैं।
  • राहुकाल: प्रतिदिन लगभग डेढ़ घंटे की अवधि।
  • भद्रा: विष्टि करण का समय, जो कुछ घंटे चलता है।
  • पंचक: चन्द्रमा के कुम्भ या मीन राशि में रहने का लगभग पाँच दिन का समय; इसकी मुख्य सावधानी दक्षिण की यात्रा के लिए है।
  • गण्डमूल: अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती, जो दो राशियों की संधि पर पड़ते हैं; कई आरंभों में इनसे सावधानी रखी जाती है।
  • होलाष्टक: फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका दहन तक के आठ दिन।
  • ग्रहण: ग्रहण का दिन।

अनिवार्य और श्रेष्ठ

सभी नियमों का भार बराबर नहीं होता।

  1. अनिवार्य: ऊपर के वर्जित काल, विशेषकर विवाह और संस्कारों में। तारीख़ इनमें पड़े तो अधिकतर पुरोहित दूसरी तारीख़ की सलाह देते हैं।
  2. प्रबल रूप से अपेक्षित: उपयुक्त नक्षत्र और तिथि।
  3. श्रेष्ठ: शुभ वार, शुभ मास और अभिजित मुहूर्त जैसा उचित समय।

कोई तारीख़ सब पर खरी न उतरे, तो परंपरा पहले श्रेष्ठ नियमों में ढील देती है, फिर अपेक्षित नियमों में; अनिवार्य नियमों में ढील सबसे अंत में दी जाती है।

व्यक्तिगत कारक

सामान्य और व्यक्तिगत मुहूर्त एक नहीं होते। ज्योतिषी परिवार की अपनी कुण्डलियाँ भी देखते हैं। दो सामान्य जाँचें हैं:

  • चन्द्र बल: जन्म राशि से गिनकर चन्द्रमा की शक्ति। जन्म राशि से 1, 3, 6, 7, 10 और 11वीं राशि में चन्द्रमा सामान्यतः अनुकूल माना जाता है।
  • तारा बल: जन्म नक्षत्र से गिनती। जन्म नक्षत्र से गिनने पर 3, 5 और 7वें नक्षत्र प्रतिकूल माने जाते हैं।

इसीलिए एक ही कार्य के लिए दो परिवारों को अलग तिथियाँ मिल सकती हैं।

सूचियाँ अलग-अलग क्यों हैं

मुहूर्त का ज्ञान मुहूर्त चिन्तामणि और मुहूर्त मार्तण्ड जैसे ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं से आता है। पुरोहित और पंचांगकार नक्षत्रों, तिथियों और मासों की अलग-अलग सूचियाँ मानते हैं। यहाँ हर कार्य के लिए सबसे प्रचलित सूची ली गई है; आपके परिवार या पुरोहित की सूची अलग हो, तो उसी का पालन करें।

यहाँ नियमों का उपयोग

हर कार्य के पृष्ठ पर शुभ दिनों की सूची चुने हुए शहर के सूर्योदय के आधार पर बनती है। उसमें तिथि, नक्षत्र, वार, चान्द्र मास (अमान्त नाम से) और वर्जित काल जाँचे जाते हैं। वर्जित काल, तिथियाँ और नक्षत्र हमेशा बाहर रहते हैं। कई पृष्ठों पर शुभ वार, मास या शुक्ल पक्ष भी कड़ी शर्त हैं, यानी सूची केवल उन्हीं दिनों को दिखाती है; यह उस पृष्ठ पर लिखा है। शुभ तिथि और नक्षत्र भी पूरे हों तो दिन "सर्वोत्तम" है, एक कम हो तो "अच्छा"। समय सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच दिखाए जाते हैं। सूर्योदय, राहुकाल और अभिजित मुहूर्त जैसे समय वाराणसी, मुंबई और चेन्नई में अलग होते हैं, इसलिए अपने शहर के समय देखें।

व्यावहारिक जीवन पहले

मुहूर्त मार्गदर्शन है, परीक्षा नहीं। रजिस्ट्री की तारीख़, विवाह-भवन का आरक्षण या बच्चों की परीक्षा जीवन के तथ्य हैं। परंपरा भी श्रद्धा और शांत मन को कठोर समय-नियम से ऊपर रखती है। असली कार्य के समय के पास शुभ घड़ी में की गई छोटी प्रार्थना भी स्वीकार्य है।

यह सामान्य जानकारी है। व्यक्तिगत मुहूर्त योग्य ज्योतिषी परिवार की कुण्डलियों से बनाते हैं।

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