पंचांग क्या है?

पंचांग हिंदू कालगणना की वह पुस्तिका है, जिसमें हर दिन के पाँच अंग मिलते हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।

नाम का अर्थ

"पंचांग" शब्द संस्कृत के पंच (पाँच) और अंग (भाग) से बना है। पंचांग हर दिन को पाँच अंगों से बताता है: तिथि (चन्द्र दिवस), वार (सप्ताह का दिन), नक्षत्र (चन्द्रमा जिस तारा-समूह में हो), योग (सूर्य और चन्द्रमा के मेल से बना काल) और करण (आधी तिथि)।

पीढ़ियों से घर के बड़े और पुरोहित पंचांग देखकर बताते आए हैं कि त्योहार कब है, एकादशी का व्रत किस दिन रखना है, पूजा कब शुरू करनी है और दिन के कौन-से घंटे नया काम आरंभ करने के लिए बेहतर माने जाते हैं। उत्तर भारत के अनेक घरों में आज भी सुबह की पूजा से पहले पंचांग देखा जाता है।

सूर्य और चन्द्रमा का पंचांग

हिंदू कालगणना चान्द्र-सौर है। मास और तिथि चन्द्रमा से चलते हैं, और सूर्य की गति से मासों को ऋतुओं के साथ मिलाकर रखा जाता है। चन्द्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा है, इसलिए समय-समय पर एक अधिक मास जोड़ा जाता है। इसी कारण तिथि वही रहती है, पर अंग्रेज़ी कैलेंडर में त्योहार हर साल आगे-पीछे खिसकते हैं।

सूर्य और चन्द्रमा की चाल एक-सी नहीं होती, इसलिए हर अंग के आरंभ और अंत का समय रोज़ बदलता है। सूर्योदय, सूर्यास्त और उनसे बने समय शहर के अनुसार बदलते हैं, और घड़ी का समय भी। इसीलिए अच्छा पंचांग किसी खास शहर के लिए गणित से बनाया जाता है।

यहाँ की गणना

  • निरयन राशिचक्र। सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति स्थिर तारों के सापेक्ष, लाहिड़ी (चित्रापक्ष) अयनांश से नापी जाती है।
  • सूर्योदय से दिन। दिन एक सूर्योदय से अगले तक चलता है। सूर्योदय पर चल रही तिथि उदया तिथि है और वही उस दिन की तिथि मानी जाती है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण किसी भी घड़ी बदलते हैं, इसलिए हर एक का ठीक आरंभ और अंत समय दिखाया जाता है।
  • मास के दो नाम। पूर्णिमान्त मास (उत्तर भारत) पूर्णिमा पर और अमान्त मास (गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत) अमावस्या पर समाप्त होते हैं। पूर्णिमान्त नाम पहले दिखता है, अमान्त उसके साथ।
  • वर्ष की दो गणनाएँ। विक्रम संवत् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, गुजरात का कार्तिकादि वर्ष दीपावली के अगले दिन से। शक संवत् भी दिया जाता है।
  • स्थानीय समय। सभी समय आपके शहर के स्थानीय समय में हैं।

शहर क्यों मायने रखता है

सूर्योदय हर जगह अलग क्षण पर होता है। जिस दिन दिन और रात बराबर हों, काशी में सूर्योदय लगभग 6 बजे होता है; गुवाहाटी में आधे घंटे से अधिक पहले और द्वारका में लगभग एक घंटा बाद। इसलिए उदया तिथि, वार का बदलना, राहुकाल, चौघड़िया और अभिजित मुहूर्त सब स्थान के साथ खिसकते हैं।

तिथि बदलने का क्षण पूरी पृथ्वी पर एक ही है। शहर बदलने पर घड़ी का समय बदलता है, और यह भी कि आपके सूर्योदय पर कौन-सी तिथि चल रही है। विदेश में रहने वाले परिवार अपने ही शहर के लिए बना पंचांग देखें; भारत के किसी शहर का पंचांग वहाँ सीधे ठीक नहीं बैठता।

जहाँ परंपराएँ अलग हैं

अंतर मुख्यतः तीन बातों में दिखता है: मास पद्धति (पूर्णिमान्त या अमान्त), नववर्ष का आरंभ, और कुछ त्योहारों को दिन के किस समय की तिथि से तय किया जाए। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आगे पाँच अंगों का परिचय और तिथि का पृष्ठ पढ़िए; "सूर्योदय आधारित दिन" और "उदया तिथि नियम" बताते हैं कि त्योहार सोची हुई तारीख से अलग दिन क्यों पड़ सकता है।

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