चातुर्मास

Chaturmas

चातुर्मास देवशयनी एकादशी से प्रबोधिनी एकादशी तक के चार महीने हैं, जो संयम, व्रत, स्वाध्याय और भक्ति के लिए माने जाते हैं।

देवता: भगवान विष्णुअवधि: लगभग चार महीनेऋतु: वर्षा ऋतु और शरद का आरंभअन्य नाम: चौमासा, चातुर्मास्य

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परिचय

चातुर्मास का अर्थ है "चार महीने"। यह आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी या देवउठनी एकादशी) तक चलता है। इसमें वर्षा ऋतु और शरद का आरंभ आता है; श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक इसके मुख्य महीने हैं। दोनों तिथियाँ शुक्ल पक्ष की हैं, इसलिए पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में इनके महीनों के नाम एक ही रहते हैं। अंतर केवल श्रावण के आरंभ में है: उत्तर भारत की पूर्णिमान्त गणना में वह आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन शुरू होता है, और महाराष्ट्र तथा दक्षिण की अमान्त गणना में आषाढ़ अमावस्या के अगले दिन।

मान्यता है कि इन महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए इसे भगवान की निद्रा का काल कहते हैं। यह उत्सव से अधिक संयम, स्वाध्याय और भक्ति का समय है।

महत्व और कथाएँ

पुराने समय में वर्षा के दिनों में नदियाँ उफान पर रहती थीं, यात्रा कठिन थी और पाचन मंद रहता था। इसलिए साधु-संत एक स्थान पर रुककर प्रवचन करते थे, और गृहस्थ सादे भोजन, व्रत और पूजा-पाठ पर ध्यान देते थे। आज इसे अपनी दिनचर्या सँवारने का मौसम माना जाता है।

कथाएँ अलग-अलग हैं: एक में विष्णु शेषशय्या पर विश्राम करते हैं, तो दूसरी में दिए हुए वचन के कारण वे राजा बलि के पाताल लोक में निवास करते हैं। चातुर्मास शांत दिखता है, पर त्योहारों से भरा है। गुरु पूर्णिमा, श्रावण के सोमवार, रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, दशहरा, दीपावली और छठ इसी अवधि में आते हैं।

शुभ कार्यों के नियम

विवाह, यज्ञोपवीत, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य परंपरा से चातुर्मास में नहीं होते, क्योंकि भगवान शयन में माने जाते हैं। प्रबोधिनी एकादशी के बाद विवाह के मुहूर्त फिर शुरू होते हैं। रोज़ की पूजा, त्योहार और व्रत चलते रहते हैं। कुछ क्षेत्रों में कुछ संस्कारों की छूट है; परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

जैन और वैष्णव दृष्टि

जैन परंपरा में चातुर्मास सामान्यतः आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से कार्तिक पूर्णिमा तक माना जाता है, जो वैष्णव गणना से थोड़ा अलग है। वर्षा में सूक्ष्म जीव बढ़ जाते हैं, इसलिए साधु-साध्वी विहार रोककर एक स्थान पर रहते हैं; श्रावक उपवास, स्वाध्याय और दान बढ़ाते हैं, और पर्युषण पर्व इसी अवधि में आता है। वैष्णव परंपरा में भक्त भोजन, वाणी और सेवा के नियम लेते हैं, भागवत का पाठ करते हैं, और कई संत एक स्थान पर रहकर प्रवचन देते हैं।

पूजा विधि

  1. देवशयनी एकादशी पर स्नान के बाद संकल्प लें कि चार महीने एक छोटा नियम निभाएँगे।
  2. एक या दो संयम चुनें: कोई प्रिय भोजन छोड़ना, जल्दी उठना या शाम का नाश्ता छोड़ना।
  3. एक अच्छा नियम जोड़ें: रोज़ जप, गीता या भागवत का एक अध्याय, या शाम को तुलसी के पास दीप।
  4. सभी एकादशी और अपने अन्य व्रत रखें, और नियमित दान करें।
  5. प्रबोधिनी एकादशी पर पूजा करें, परिवार में रीति हो तो तुलसी विवाह करें, और भोजन के साथ चातुर्मास का समापन करें।

पूजन सामग्री

  • भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति, और चौकी पर स्वच्छ वस्त्र
  • तुलसी दल, पीले फूल, चंदन, अक्षत
  • घी का दीप, धूप, कपूर और प्रसाद
  • पाठ के लिए गीता, भागवत या विष्णु सहस्रनाम

व्रत और भोजन

खान-पान के नियम महीने और परिवार के अनुसार बदलते हैं। एक प्रचलित परंपरा में श्रावण में पत्तेदार साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल छोड़ी जाती है। कई परिवार चारों महीने प्याज, लहसुन और मांसाहार से दूर रहते हैं। वही नियम लें जिसे आप निभा सकें। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।

क्या करें

  • कोई एक छोटा नियम चुनें और उसे रोज़ निभाएँ।
  • रोज़ थोड़ा ग्रंथ पढ़ें, जैसे गीता, रामचरितमानस या भागवत।
  • सभी एकादशी के व्रत रखें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या धन का दान दें।
  • हो सके तो सुबह जल्दी उठकर स्नान और ध्यान करें।
  • प्रबोधिनी एकादशी पर विधि से समापन करें।

क्या न करें

  • परिवार की परंपरा हो तो इस अवधि में विवाह, यज्ञोपवीत या गृह प्रवेश तय न करें।
  • ऐसा नियम न लें जिसे निभाना संभव न हो।
  • अलग ढंग से मानने वालों की आलोचना न करें।
  • अपने स्वास्थ्य की अनदेखी न करें।
  • झगड़े और कठोर वचन से बचें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

काशी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में श्रावण के सोमवार को बाबा विश्वनाथ को गंगाजल चढ़ाया जाता है। श्रावण में बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर कांवड़िये पैदल झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ तक जाते हैं। कार्तिक में काशी के घाटों पर गंगा स्नान और आकाशदीप की परंपरा है। महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी पर पंढरपुर की वारी के साथ चातुर्मास का आरंभ होता है। कर्नाटक और गुजरात में कई परिवारों की महिलाएँ चारों महीने के नियम रखती हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

चातुर्मास को बड़े संकल्प की जगह छोटी और टिकाऊ आदत की तरह अपनाएँ: रोज़ एक दीप, कुछ पन्नों का पाठ और भोजन में एक सरल नियम। दफ़्तर जाने वालों के लिए शाम का नाश्ता छोड़ना या घर का सादा भोजन साथ ले जाना व्यावहारिक है। विवाह जैसे आयोजन महीनों पहले तय हो जाते हैं, इसलिए यदि आपका परिवार इन महीनों में शुभ कार्य नहीं करता, तो तिथि पक्की करने से पहले पुरोहित से पूछ लें। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर की एकादशी और पारण का समय देखकर नियम निभा सकते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।