अधिक मास (पुरुषोत्तम मास)
Adhika Masa (Purushottam Maas)
अधिक मास वह अतिरिक्त चान्द्र मास है जो लगभग साढ़े बत्तीस महीने में जुड़ता है और जप, कथा-श्रवण तथा दान के लिए रखा जाता है।
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परिचय
अधिक मास हिंदू पंचांग का वह अतिरिक्त चान्द्र मास है, जो लगभग हर साढ़े बत्तीस महीने बाद जुड़ता है। 19 वर्ष में यह लगभग सात बार आता है। इसे मलमास भी कहते हैं, और भगवान विष्णु के नाम पर पुरुषोत्तम मास भी।
चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष को ऋतुओं के साथ मिलाए रखने का यह प्राचीन उपाय है। जिस वर्ष अधिक मास आता है, उसमें 13 चान्द्र मास और 26 एकादशियाँ होती हैं।
महत्व और कथाएँ
पुराणों की कथा के अनुसार इस अतिरिक्त मास का कोई स्वामी देवता नहीं था। सब इसे उपेक्षित मानते थे, इसलिए यह दुखी होकर भगवान विष्णु की शरण में गया। भगवान ने इसे अपनाया, अपना नाम "पुरुषोत्तम" दिया और इसे अपना प्रिय मास कहा। इसी कारण यह मास विशेष भक्ति का समय माना जाता है।
इसे भय का समय न समझें। परंपरा में यह पूजा, जप, कथा-श्रवण और दान का श्रेष्ठ अवसर है।
अधिक मास क्यों जुड़ता है
12 चान्द्र मासों का वर्ष लगभग 354 दिन का होता है और सौर वर्ष लगभग 365 दिन का। हर साल लगभग 11 दिन का अंतर पड़ता है। इसे न सुधारें तो त्योहार ऋतुओं से खिसकने लगेंगे और दीपावली कभी गर्मी में आ जाएगी।
परंपरागत नियम यह है कि जिस चान्द्र मास में सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश नहीं करता, यानी संक्रांति नहीं पड़ती, वह अधिक मास गिना जाता है। उसका नाम अगले मास के नाम पर "अधिक" जोड़कर रखा जाता है, जैसे अधिक श्रावण। उसके बाद का नियमित मास निज मास कहलाता है। यह गणना अमावस्या से अमावस्या तक के चान्द्र मास (अमान्त) के आधार पर होती है; उत्तर भारत के पूर्णिमान्त पंचांग भी अधिक मास की यही अवधि मानते हैं।
इस मास में क्या आरंभ नहीं किया जाता
परंपरा के अनुसार इस मास में नए मांगलिक कार्य टाले जाते हैं, जैसे विवाह, यज्ञोपवीत, मुण्डन, गृह प्रवेश, नए व्यापार का आरंभ और नए घर की ख़रीद। रोज़ की पूजा, नियमित मासों के त्योहार और पहले से चल रहे अनुष्ठान जारी रहते हैं। अंत्येष्टि जैसे अनिवार्य कर्म नहीं रुकते। श्राद्ध की तिथि इस मास में पड़े तो पुरोहित से पूछ लें। महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्हीं की सलाह मानें।
पूजा विधि
- पहले दिन संकल्प लें कि यह मास भक्ति में बिताएँगे। वही नियम चुनें जो पूरे मास निभा सकें।
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। नदी पर जाना संभव न हो तो घर के जल में गंगाजल की कुछ बूँदें मिला लें।
- दीप जलाकर भगवान विष्णु का स्मरण करें और तुलसी को जल दें।
- रोज़ जप करें, जैसे "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- श्रीमद्भागवत, गीता या पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का एक अंश रोज़ पढ़ें या सुनें।
- एकादशी और अन्य व्रत परिवार की रीति से रखें।
- अन्न, दीप, वस्त्र या पुस्तकों का दान करें। पूरे मास दीपदान की परंपरा बहुत प्रचलित है।
- संभव हो तो विष्णु या कृष्ण मंदिर में दर्शन करें।
पूजन सामग्री
- भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र या मूर्ति
- तुलसी दल, पीले फूल, चंदन
- घी या तेल का दीप, धूप, कपूर
- जप की माला
- नैवेद्य के लिए फल और मिठाई
- दान के लिए अन्न, वस्त्र और दीप
व्रत और भोजन
बहुत से लोग इस मास में दिन में एक बार सादा सात्त्विक भोजन करते हैं, या कुछ दिन बिना अन्न का उपवास रखते हैं। कुछ लोग पूरे मास प्याज़, लहसुन, मांसाहार और अपनी कोई प्रिय वस्तु छोड़ देते हैं। वही नियम लें जो आप निभा सकें।
बीमार लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग उपवास अपने चिकित्सक की अनुमति से ही रखें। उनके लिए हल्का नियम भी पर्याप्त है।
क्या करें
- सामान्य से थोड़ा अधिक समय जप और पूजा को दें।
- रोज़ किसी ग्रंथ का छोटा अंश पढ़ें या सुनें।
- हर सप्ताह अपनी सामर्थ्य का दान करें।
- संध्या को दीप जलाएँ।
- भोजन सादा रखें और वाणी में नम्रता रखें।
क्या न करें
- यदि आपकी परंपरा इसे टालती है तो विवाह या नया मांगलिक कार्य इस मास में आरंभ न करें।
- धार्मिक कारण से बड़ी नई ख़रीद न करें, यदि आपका परिवार यह नियम मानता है।
- इस मास को भय या अशुभ का समय न मानें, यह पवित्र मास है।
- अपनी क्षमता से कठिन नियम न लें।
- पितरों के लिए आवश्यक कर्म न छोड़ें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में महिलाएँ इस मास में पुरुषोत्तम माहात्म्य का पाठ करती हैं और दीप जलाती हैं। महाराष्ट्र और दक्षिण के कुछ भागों में 33 अपूप (पुए जैसे पकवान) दान करने और दामाद को भी 33 अपूप देने की रीति बताई जाती है; 33 की संख्या को 33 देवताओं से जोड़ा जाता है। संख्या, पकवान और रीति परिवार के अनुसार बदलते हैं।
उत्तर भारत में भागवत कथा, तीर्थ-स्नान और तुलसी के सामने दीप जलाने का नियम अधिक प्रचलित है; काशी जैसे तीर्थों में लोग गंगा-स्नान के बाद दर्शन करते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
अधिक मास व्यस्त परिवारों को रोज़ की एक छोटी साधना जोड़ने का अच्छा अवसर देता है। सुबह पाँच मिनट का दीप और जप, शाम को ग्रंथ का एक पृष्ठ और सप्ताह में एक बार दान भी पर्याप्त है। फ़्लैट में रहने वाले लोग तुलसी के गमले के पास दीप रख सकते हैं।
विवाह या गृह प्रवेश की योजना हो तो पहले पुरोहित से पूछ लें कि तिथि इस मास से बाहर है या नहीं। विदेश में रहने वाले परिवार मंदिर या इंटरनेट पर प्रसारित होने वाली भागवत कथा से जुड़ सकते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।