प्रबोधिनी एकादशी (देवउठनी) और तुलसी विवाह
Prabodhini Ekadashi (Dev Uthani) and Tulsi Vivah
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर विष्णु जागते हैं, चातुर्मास पूरा होता है, विवाह जैसे शुभ कार्य शुरू होते हैं और तुलसी विवाह मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 | देवउठनी एकादशी |
| शनिवार, 21 नवंबर 2026 | तुलसी विवाह |
| शनिवार, 21 नवंबर 2026 | देवउठनी एकादशी (वैष्णव) |
| बुधवार, 10 नवंबर 2027 | देवउठनी एकादशी |
| गुरुवार, 11 नवंबर 2027 | तुलसी विवाह |
| शनिवार, 28 अक्टूबर 2028 | देवउठनी एकादशी |
| रविवार, 29 अक्टूबर 2028 | देवउठनी एकादशी (वैष्णव) |
| सोमवार, 30 अक्टूबर 2028 | तुलसी विवाह |
परिचय
प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को आती है। "प्रबोधिनी" का अर्थ है जगाने वाली और "देवउठनी" का अर्थ है देवता का उठना। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से चार महीने योगनिद्रा में रहे विष्णु इस दिन जागते हैं। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से यह दिन पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पद्धतियों में कार्तिक में ही आता है।
उनके जागने के साथ चातुर्मास पूरा होता है और विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य, जो इन महीनों में टाले जाते हैं, फिर शुरू हो जाते हैं। इसी दिन तुलसी विवाह भी होता है, जो तुलसी के पौधे का प्रतीकात्मक विवाह है। कभी-कभी स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में एकादशी का दिन अलग पड़ता है; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
महत्व और कथाएँ
मान्यता है कि वर्षा के महीनों में विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं और जागने पर भक्त दीपों और गीतों से उनका स्वागत करते हैं।
तुलसी विवाह की कथा वृंदा की है, जो दैत्यराज जालंधर की पतिव्रता पत्नी थी। उसके सतीत्व से जालंधर अजेय था। विष्णु के किए छल से वृंदा का व्रत भंग हुआ और जालंधर युद्ध में मारा गया। वृंदा ने विष्णु को पत्थर होने का शाप दिया, इसी से वे शालिग्राम शिला के रूप में पूजे जाते हैं। फिर वृंदा ने प्राण त्याग दिए और उनकी राख से तुलसी का पौधा उगा। विष्णु ने तुलसी को वचन दिया कि शालिग्राम रूप में वे उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करेंगे। इसीलिए हर वर्ष तुलसी और शालिग्राम का विवाह होता है। तुलसी को देवी और घर की रक्षक माना जाता है। कथा पुराणों में थोड़े अलग रूपों में मिलती है।
पूजा विधि
- भोर में स्नान करें, आँगन में चौक पूरें; कई घरों में गेरू और चावल के आटे से विष्णु के चरण बनाए जाते हैं। एकादशी व्रत का संकल्प लें।
- विष्णु की मूर्ति या चित्र पर दीप, फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई चढ़ाएँ। "ॐ नमो नारायणाय" का जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- शंख, घंटी या थाली बजाकर "उठो देव, बैठो देव" जैसे गीत से देवता को जगाएँ; बोल हर परिवार में अलग होते हैं।
- दिन विष्णु सहस्रनाम, भागवत पाठ या मंदिर दर्शन में बिताएँ; संभव हो तो रात्रि जागरण करें।
- संध्या को तुलसी विवाह करें।
- द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इस पंचांग में दिखाए पारण समय के भीतर व्रत खोलें।
तुलसी विवाह: तुलसी के गमले को गेरू और रंगोली से सजाकर चारों ओर गन्ने के डंठलों का मंडप बनाएँ और फूल, आम के पत्ते तथा रोशनी लगाएँ। तुलसी को लाल चुनरी, बिंदी, चूड़ियों और माला से दुल्हन की तरह सजाएँ। शालिग्राम या विष्णु अथवा कृष्ण की मूर्ति या चित्र को वर मानकर बारात की तरह लाएँ। दोनों को जल, फूल, रोली, हल्दी और मिठाई अर्पित करें, बीच में दीप रखें, बड़ों या पुरोहित की अगुवाई में मंगलाष्टक या विवाह-गीत गाएँ और धागा या माला बाँधें। फिर आरती करें, तुलसी की परिक्रमा करें और प्रसाद बाँटें। यह विवाह एकादशी की रात, या एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन हो सकता है; कई स्थानों पर इसे द्वादशी की संध्या को किया जाता है।
पूजन सामग्री
- स्वस्थ तुलसी का पौधा गमले में
- गन्ने के डंठल, आम के पत्ते, फूल, मालाएँ
- लाल चुनरी, बिंदी, चूड़ियाँ, धागा
- शालिग्राम या विष्णु अथवा कृष्ण की मूर्ति या चित्र
- दीप, धूप, कपूर, रोली, हल्दी, अक्षत
- गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आँवला, बेर, मिठाई और खील
व्रत और भोजन
बहुत-से लोग अनाज और दालों के बिना व्रत रखते हैं और फल, दूध, मेवे, साबूदाना, आलू जैसे अनुमत पदार्थ लेते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, दवा लेने वाले और गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएँ उपवास उतना ही रखें जितना डॉक्टर की सलाह से ठीक हो; हल्का व्रत भी मान्य है। द्वादशी को तुलसी दल के साथ पारण करें और सादा भोजन लें, जिसमें चावल भी रहता है।
क्या करें
- विष्णु को तुलसी दल चढ़ाएँ; जहाँ एकादशी को तुलसी तोड़ना मना है, वहाँ एक दिन पहले सावधानी से तोड़कर रखें।
- बच्चों को मंडप सजाने में शामिल करें।
- विष्णु के नाम का जप करें या कीर्तन सुनें।
- पारण समय के भीतर व्रत खोलें।
- तुलसी को सम्मान से जल दें और पूरे वर्ष उसकी देखभाल करें।
क्या न करें
- पारंपरिक व्रत रखें तो एकादशी को अनाज और दालें न खाएँ।
- जहाँ नियम है, वहाँ एकादशी को तुलसी के पत्ते न तोड़ें। रीतियाँ अलग-अलग हैं।
- परंपरा के अनुसार गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ।
- व्रत में बहस और क्रोध से बचें।
- सूखे गन्ने और सजावट के पास जलता दीप न छोड़ें।
- जो व्रत न रख सके, उस पर दबाव न डालें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर प्रदेश और बिहार में महिलाएँ आँगन में विष्णु के चित्र या चरण बनाती हैं और देवताओं को जगाने के गीत गाती हैं; इसके बाद विवाहों का मौसम शुरू होता है। काशी के घाटों पर कार्तिक मास में बाँस पर टाँगकर आकाशदीप जलाने की परंपरा है। महाराष्ट्र के पंढरपुर में कार्तिकी एकादशी पर लाखों वारकरी विट्ठल मंदिर पहुँचते हैं। ओडिशा में कार्तिक के अंतिम पाँच दिनों का पंचुका इसी एकादशी से शुरू होता है।
आज के समय में
तुलसी गमले में घर पर आसानी से रखी जा सकती है। ठंडे प्रदेशों में सर्दियों में पौधा घर के भीतर रहता है; खिड़की या बालकनी के कोने में किया गया तुलसी विवाह भी उतना ही मान्य है। फ़्लैट में बिजली की लड़ियाँ या एक सुरक्षित दीप रखें, और उसे गन्ने तथा कपड़े से दूर रखें। कई मंदिर और संस्थाएँ पास के सप्ताहांत पर सामूहिक तुलसी विवाह कराती हैं। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर का पारण समय देख लें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।