देवशयनी एकादशी
Devshayani Ekadashi
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जब भगवान विष्णु का चार महीने का शयन आरंभ माना जाता है और चातुर्मास शुरू होता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शनिवार, 25 जुलाई 2026 | देवशयनी एकादशी |
| बुधवार, 14 जुलाई 2027 | देवशयनी एकादशी |
| रविवार, 2 जुलाई 2028 | देवशयनी एकादशी |
परिचय
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से यह पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों पंचांगों में एक ही दिन पड़ती है। नाम का अर्थ है "वह एकादशी जब देव शयन करते हैं"। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन आरंभ करते हैं, और इसी दिन से चातुर्मास शुरू माना जाता है।
यह अवधि कार्तिक शुक्ल एकादशी, यानी प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी पर पूरी होती है, जब भगवान के जागने की मान्यता है। इन महीनों में लोग अतिरिक्त नियम लेते हैं और भजन-पूजन बढ़ाते हैं। विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्य परंपरा से इस अवधि में नहीं किए जाते।
महत्व और कथाएँ
एक कथा में सूर्यवंश के राजा मांधाता के राज्य में लंबे समय तक वर्षा नहीं हुई। ऋषि अंगिरा की सलाह पर राजा ने प्रजा के साथ इस एकादशी का व्रत किया, और वर्षा लौट आई। एक दूसरी मान्यता वामन अवतार से जुड़ी है: विष्णु ने राजा बलि को पाताल का राज्य दिया और वचन दिया कि वे इन महीनों में उसके पास निवास करेंगे।
कई लोग चातुर्मास को व्यावहारिक समझ का समय भी मानते हैं। वर्षा में यात्रा कठिन थी और पाचन धीमा रहता है, इसलिए व्रत और सादा भोजन अपनाने की सलाह दी गई। भक्तों के लिए यह ग्रंथ पढ़ने, जप करने और सेवा करने का समय है। महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी पर लाखों वारकरी पैदल चलकर पंढरपुर में भगवान विट्ठल के दर्शन करने पहुँचते हैं।
पूजा विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- एकादशी व्रत का संकल्प लें, और चाहें तो चातुर्मास का कोई नियम भी।
- चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रखें, अक्सर लक्ष्मी जी के साथ। दीप और धूप जलाएँ।
- प्रतिमा को जल से (परंपरा हो तो पंचामृत से) स्नान कराएँ, फिर पीले फूल, तुलसी दल और चंदन चढ़ाएँ।
- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- देवशयनी एकादशी की कथा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- फल और मिठाई का भोग लगाकर आरती करें।
- संभव हो तो रात में भजन और कीर्तन के साथ जागरण करें।
- द्वादशी को सूर्योदय के बाद, पंचांग में बताए पारण के समय में, भगवान को भोग लगाकर व्रत खोलें।
पूजन सामग्री
- भगवान विष्णु या विट्ठल की मूर्ति या चित्र
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए भी चलते हैं) और पीले फूल
- चंदन, हल्दी, रोली, अक्षत
- धूप, घी का दीप, कपूर
- फल, पंचामृत, मिठाई
व्रत और भोजन
एकादशी का उपवास कई तरह से रखा जाता है। कुछ लोग अन्न और जल, दोनों छोड़ देते हैं, पर अधिकतर लोग फल, दूध, साबूदाना, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक लेते हैं। चावल, गेहूँ और दालें नहीं खाई जातीं। फलाहार या एक बार अन्नरहित सात्विक भोजन भी मान्य है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें। पारण द्वादशी को सूर्योदय के बाद, पंचांग में बताए पारण-काल के भीतर करें।
क्या करें
- पूजा, पाठ और जप में समय बिताएँ।
- चातुर्मास का कोई नियम लें, जैसे चार महीने कोई भोजन या आदत छोड़ना।
- विष्णु को तुलसी दल चढ़ाएँ; हो सके तो उन्हें एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- ज़रूरतमंदों को दान दें, विशेषकर भोजन का।
- स्वास्थ्य ठीक हो तो रात्रि जागरण करें।
- द्वादशी को समय पर पारण करें।
क्या न करें
- व्रत में चावल, गेहूँ, दाल या अन्य अनाज न खाएँ, यदि आपकी परंपरा उन्हें वर्जित मानती है।
- एकादशी के दिन तुलसी दल न तोड़ें; कई परिवारों की यही रीति है।
- प्याज, लहसुन और मांसाहार से दूर रहें।
- चिकित्सक ने समय पर भोजन की सलाह दी हो तो पारण में देर न करें।
- नशा न करें।
- बहस न करें और किसी की बुराई न करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी वारी का शिखर है, जब वारकरी अभंग गाते हुए पंढरपुर पहुँचते हैं। ओडिशा में यह दिन रथ यात्रा की अवधि से जुड़ा है। उत्तर भारत में इसे देवशयनी और हरिशयनी, दोनों नामों से जाना जाता है, और इसी दिन से कई परिवार चातुर्मास के नियम और मांगलिक कार्यों में रोक का पालन शुरू करते हैं। गुजरात और राजस्थान में भी यह हरिशयनी है। जैन साधु भी लगभग इसी समय एक स्थान पर ठहरते हैं। रीतियाँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की परंपरा मानें।
आज के समय में
अनेक नगरों के विष्णु और विट्ठल मंदिरों में इस दिन पूजा, कीर्तन और सात्विक भोजन होता है। मंदिर जाना संभव न हो तो सुबह या दफ़्तर से लौटकर घर पर छोटी पूजा कर लें। एकादशी कार्यदिवस पर पड़े तो सरल फलाहार रखें और शाम को कथा पढ़ लें। द्वादशी का पारण-समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर का पंचांग देखें। तुलसी का पौधा घर के भीतर गमले में भी उगाया जा सकता है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।