रथ यात्रा

Rath Yatra

पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलती है और जिसे देश-विदेश के भक्त बड़े उत्साह से मनाते हैं।

देवता: जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्राअवधि: रथ खींचने का दिन, और नौ दिन चलने वाली संबंधित रीतियाँऋतु: वर्षा ऋतु का आरंभअन्य नाम: रथ जात्रा, जगन्नाथ का रथोत्सव, गुंडिचा यात्रा

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तारीख़पर्व या अवसर
गुरुवार, 16 जुलाई 2026जगन्नाथ रथ यात्रा
सोमवार, 5 जुलाई 2027जगन्नाथ रथ यात्रा
शनिवार, 24 जून 2028जगन्नाथ रथ यात्रा

परिचय

रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ का महारथोत्सव है। जगन्नाथ कृष्ण का रूप हैं और ओडिशा के पुरी में पूजे जाते हैं। यह आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होता है। शुक्ल पक्ष में पड़ने के कारण पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों गणनाओं में यह तिथि वही रहती है।

इस दिन जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा मंदिर से बाहर लाकर तीन विशाल लकड़ी के रथों पर विराजमान किए जाते हैं। भक्त रस्सियों से रथ खींचते हुए पुरी के मुख्य मार्ग से लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। वहाँ देवता कई दिन ठहरते हैं और फिर बाहुड़ा यात्रा में लौटते हैं। रथ यात्रा सबके लिए खुली है; हर पृष्ठभूमि के लोग रस्सी खींचने में शामिल होते हैं। देश-विदेश के अनेक नगरों में भी अपनी रथ यात्राएँ निकलती हैं।

महत्व और कथाएँ

इस उत्सव का भाव यह है कि प्रभु मंदिर से बाहर आकर सबसे मिलते हैं, अमीर-ग़रीब, पास-दूर, किसी भी जाति या हैसियत के भेद के बिना। रथ पर देवताओं का दर्शन बहुत बड़ा आशीर्वाद माना जाता है।

कथाएँ अलग-अलग हैं। एक के अनुसार सुभद्रा ने नगर देखना चाहा तो भाइयों ने उन्हें रथ में घुमाया। दूसरी मान्यता में गुंडिचा मंदिर की यात्रा देवताओं का मौसी के घर जाना है। एक और परंपरा इसे कृष्ण की गोकुल से मथुरा की यात्रा से जोड़ती है। पुरी में राजा इंद्रद्युम्न और जगन्नाथ के दारु विग्रह (काष्ठ मूर्ति) की खोज की कथा भी कही जाती है। ये परंपराएँ एक-दूसरे की पूरक हैं और सब भक्ति में साझा हैं।

रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा को देवताओं का स्नान होता है, जिसे स्नान यात्रा कहते हैं। इसके बाद परंपरा में लगभग पखवाड़े का विश्राम (अनवसर) माना जाता है, जब गर्भगृह में देवताओं के सामान्य दर्शन बंद रहते हैं।

पूजा विधि

  1. भोर में स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और घर के मंदिर में दीप जलाएँ।
  2. जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का चित्र रखें; न हो तो कृष्ण का चित्र रखें।
  3. फूल, तुलसी दल, धूप और दीप चढ़ाकर छोटी प्रार्थना करें।
  4. सादा भोग लगाएँ: मिठाई, फल या सरल खिचड़ी।
  5. "जय जगन्नाथ" का जप करें या भजन-कीर्तन करें।
  6. पास में शोभायात्रा हो तो शामिल हों, या पुरी का सीधा प्रसारण देखें।
  7. जहाँ अनुमति हो, रस्सी खींचने या सेवा में भाग लें।
  8. प्रसाद बाँटें और दूसरों को भोजन कराएँ।

पूजन सामग्री

  • जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र या छोटी मूर्तियाँ
  • तुलसी दल, फूल और मालाएँ
  • धूप, घी का दीप, कपूर
  • फल, मिठाई और सादा पका हुआ भोग
  • चंदन, अक्षत, देवताओं के लिए छोटा वस्त्र

व्रत और भोजन

यह उत्सव का दिन है, कठोर व्रत का नहीं। बहुत-से लोग केवल सात्त्विक शाकाहारी भोजन करते हैं और प्याज-लहसुन से दूर रहते हैं। पुरी में महाप्रसाद प्रसिद्ध है, जो मिट्टी की हाँड़ियों में पकता है और सबमें बाँटा जाता है। कुछ भक्त यात्रा शुरू होने तक आधे दिन का उपवास रखते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, दवा लेने वाले और गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएँ उपवास उतना ही रखें जितना डॉक्टर की सलाह से ठीक हो; हल्का व्रत भी मान्य है।

क्या करें

  • जगन्नाथ का नाम जपें और कीर्तन करें।
  • शोभायात्रा में धैर्य और सम्मान के साथ शामिल हों या उसे देखें।
  • भोजन और प्रसाद दूसरों में, विशेषकर ज़रूरतमंदों में, बाँटें।
  • धूप में चलने वालों को पानी या शरबत पिलाएँ।
  • बच्चों को तीनों देवताओं की कथा सुनाएँ।
  • घर के मंदिर को फूलों से सजा और स्वच्छ रखें।
  • भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का ध्यान रखें।

क्या न करें

  • रस्सी पकड़ते समय धक्का-मुक्की न करें।
  • मंदिर या शोभायात्रा के पास जूते-चप्पल न पहनें।
  • मार्ग में कचरा, प्लास्टिक या जूठन न फेंकें।
  • उत्सव को केवल घूमने-देखने का अवसर न बनाएँ।
  • जहाँ मनाही हो, वहाँ चित्र न लें।
  • दूसरी परंपराओं पर अप्रिय टिप्पणी न करें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

पुरी में तीनों रथ हर वर्ष पारंपरिक लकड़ी से नए बनाए जाते हैं: जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन। पुरी के गजपति राजा रथ के मंच पर झाड़ू लगाते हैं, जिसे छेरा पहँरा कहते हैं। ओडिशा के घरों में विशेष भोग बनता है।

काशी में असि क्षेत्र के जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा निकलती है और रथयात्रा चौराहे तक जाती है; वहाँ कई दिन का मेला लगता है, जिसके नाम पर मोहल्ले का नाम पड़ा; यह लगभग दो सौ वर्ष पुरानी परंपरा बताई जाती है। बंगाल में महेश की रथ यात्रा पुरानी और प्रसिद्ध है। गुजरात के नगरों में बड़ी शोभायात्रा निकलती है। इस्कॉन के समुदाय विश्व भर में कीर्तन, नृत्य और निःशुल्क भोजन के साथ रथ यात्रा मनाते हैं। परंपराएँ स्थान-स्थान पर अलग हैं।

आज के समय में

कई नगरों में रथ यात्रा की शोभायात्रा निकलती है, जिसे प्रायः इस्कॉन या अन्य वैष्णव समाज आयोजित करते हैं। ये सबके लिए खुली होती हैं, जिनमें सजा रथ, कीर्तन, नृत्य और निःशुल्क शाकाहारी भोजन रहता है। घर पर चित्र रखें, सादा भोग लगाएँ और पुरी का सीधा प्रसारण देखें। बाहर की शोभायात्रा में पानी और धूप से बचाव साथ रखें, भीड़ में बच्चों का हाथ थामे रहें और स्थानीय नियमों का पालन करें। विदेश में रहने वाले परिवार अपने नगर की शोभायात्रा की सूचना स्थानीय समाज से लें; वह प्रायः पास के सप्ताहांत पर होती है।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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