पक्ष: शुक्ल और कृष्ण

हिंदू चन्द्र मास के दो पक्ष होते हैं: शुक्ल (चन्द्रमा बढ़ने वाला उजला पखवाड़ा) और कृष्ण (घटने वाला अँधेरा पखवाड़ा), हर एक में 15 तिथियाँ।

महीने के दो पक्ष

पक्ष का अर्थ है पखवाड़ा, और इसका शाब्दिक अर्थ "पंख" है। चन्द्र मास के दो पंख हैं: एक में चन्द्रमा की कला बढ़ती है और दूसरे में घटती है। हर पक्ष में 15 तिथियाँ होती हैं और वह लगभग 15 दिन से कुछ कम चलता है; ठीक अवधि तिथियों की लंबाई के साथ बदलती है।

शुक्ल पक्ष कृष्ण पक्ष
अर्थ उजला पखवाड़ा अँधेरा पखवाड़ा
चन्द्रमा बढ़ता हुआ घटता हुआ
आरंभ अमावस्या के बाद पूर्णिमा के बाद
अंत पूर्णिमा पर अमावस्या पर

गुजराती पंचांगों में शुक्ल पक्ष को सुद और कृष्ण पक्ष को वद लिखा जाता है। दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसे छोटे रूप चलते हैं।

शुक्ल पक्ष

शुक्ल का अर्थ है उजला या श्वेत। यह अमावस्या के अगले दिन शुरू होता है और हर रात चन्द्रमा की कला बढ़ती जाती है, पूर्णिमा तक। तिथियाँ शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल चतुर्दशी तक गिनी जाती हैं, फिर पूर्णिमा।

बहुत-से बड़े पर्व शुक्ल पक्ष में पड़ते हैं, जैसे नवरात्र, रामनवमी और गणेश चतुर्थी। परंपरा में बढ़ते प्रकाश को आरंभ, वृद्धि और उत्सव से जोड़ा जाता है।

कृष्ण पक्ष

कृष्ण का अर्थ है काला या गहरा। यह पूर्णिमा के बाद शुरू होता है और अमावस्या तक चन्द्रमा घटता जाता है। तिथियाँ कृष्ण प्रतिपदा से कृष्ण चतुर्दशी तक गिनी जाती हैं, फिर अमावस्या।

इस पक्ष में भी बहुत-से पर्व और व्रत हैं। दीपावली अमावस्या को और महाशिवरात्रि चतुर्दशी को आती है। पितरों के संस्कार भी इसी पक्ष में होते हैं; पितृ पक्ष में गया, काशी और अनेक नदी-तटों पर श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। कृष्ण पक्ष को अशुभ न समझें; इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान हैं।

तिथि का पूरा नाम

हिंदू तिथि के तीन भाग होते हैं: मास, पक्ष और तिथि। "चैत्र शुक्ल नवमी" का अर्थ है चैत्र मास के उजले पक्ष की नौवीं तिथि, यानी रामनवमी। पर्व इसी तरह बताए जाते हैं, क्योंकि यह नाम हर साल वही रहता है, जबकि अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख बदलती है।

पक्ष और मास का नाम

शुक्ल पक्ष का मास-नाम दोनों मुख्य पद्धतियों में एक ही है, पर कृष्ण पक्ष के नाम अलग हो जाते हैं। पूर्णिमान्त पद्धति (उत्तर भारत) में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, इसलिए चैत्र की पूर्णिमा के बाद का कृष्ण पक्ष अगले मास वैशाख का माना जाता है। अमान्त पद्धति में मास अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वही पखवाड़ा अब भी चैत्र का कहलाता है। जब कोई "कृष्ण चतुर्दशी" बताए, तो पूछ लें कि कौन-सी पद्धति है। यहाँ दोनों नाम दिखाए जाते हैं।

दैनिक जीवन में पक्ष

एकादशी और प्रदोष व्रत दोनों पक्षों में आते हैं, इसलिए महीने में दो बार। चतुर्थी का शुक्ल रूप विनायक चतुर्थी है और कृष्ण रूप संकष्टी चतुर्थी; दोनों गणेश जी से जुड़ी हैं। पक्ष जान लें तो पता चल जाता है कि कौन-सी चतुर्थी की बात हो रही है।

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