कृष्ण जन्माष्टमी
Krishna Janmashtami
भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव, जो वर्षा ऋतु की कृष्ण अष्टमी को उपवास, मध्यरात्रि की पूजा, भजन-कीर्तन और झाँकियों के साथ मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 | कृष्ण जन्माष्टमी |
| बुधवार, 25 अगस्त 2027 | कृष्ण जन्माष्टमी |
| रविवार, 13 अगस्त 2028 | कृष्ण जन्माष्टमी |
परिचय
कृष्ण जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है। यह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। उत्तर भारत की पूर्णिमान्त गणना में यह भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की अमान्त गणना में यही दिन श्रावण कृष्ण अष्टमी कहलाता है। पर्व एक ही है, बस महीने के दो नाम हैं।
मान्यता है कि श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को मथुरा के कारागार में हुआ। रात तूफ़ानी थी, अष्टमी तिथि थी और रोहिणी नक्षत्र था। इसीलिए निशीथ काल, यानी अर्धरात्रि का क्षण, इस पर्व का हृदय है। उसी समय घरों और मंदिरों में जन्म का उत्सव होता है।
महत्व और कथाएँ
मथुरा के राजा कंस को भविष्यवाणी मिली कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका अंत करेगी। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और छह संतानों को मार डाला। सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया, और उससे बलराम का जन्म हुआ। कृष्ण के जन्म पर कारागार के द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव शिशु को लेकर उफनती यमुना पार करके गोकुल पहुँचे, जहाँ नंद और यशोदा ने उनका पालन किया।
माखन चुराने, बाँसुरी बजाने और गोवर्धन उठाने की बाल लीलाएँ बच्चों को बहुत प्रिय हैं। बड़े होकर कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। यह पर्व इस विश्वास का उत्सव है कि जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर संसार में प्रकट होते हैं। अनेक परिवारों के लिए यह बच्चों का आनंदमय त्योहार है, जिसमें झूले, गीत और मिठाइयाँ होती हैं।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
- बाल गोपाल के लिए छोटा झूला या पूजा का कोना फूल, मोरपंख और दीपों से सजाएँ।
- दिन भर उपवास रखें और भजन, कथा-पाठ में समय बिताएँ।
- शाम या रात को बाल गोपाल की प्रतिमा का दूध, दही, शहद, घी और जल से अभिषेक करें, फिर नए वस्त्र, मुकुट और मोरपंख से शृंगार करें।
- तुलसी दल, चन्दन, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
- निशीथ काल की प्रतीक्षा करते हुए "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- अर्धरात्रि को परदा हटाएँ, शंख और घंटी बजाएँ, झूला झुलाएँ और आरती करें।
- पंजीरी, माखन-मिश्री, फल और मिठाई का भोग लगाएँ।
- प्रसाद से पारण करें, अपनी परंपरा के अनुसार मध्यरात्रि की पूजा के बाद या अगली सुबह।
पूजन सामग्री
- बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र, छोटा झूला
- दूध, दही, शहद, घी, शक्कर और तुलसी-जल
- नए वस्त्र, मोरपंख, बाँसुरी और मुकुट
- तुलसी दल, फूल, चन्दन, धूप और दीप
- माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, फल और खीर
- शंख और घंटी
व्रत और भोजन
बहुत से भक्त सूर्योदय से आधी रात तक उपवास रखते हैं। कुछ अन्न नहीं खाते, कुछ फल और दूध लेते हैं, कुछ निर्जला रहते हैं। हल्का उपवास भी ठीक है। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, गर्भवती स्त्रियों और दवा लेने वालों को उतना ही उपवास रखना चाहिए जितना उनके चिकित्सक उचित समझें। व्रत मध्यरात्रि की पूजा के बाद प्रसाद से या अगली सुबह खुलता है। पारंपरिक भोग में पंजीरी, माखन-मिश्री, खीर, दूध की मिठाइयाँ और कुछ मंदिरों में छप्पन भोग होता है।
क्या करें
- पंचांग में अपने शहर की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और निशीथ काल का समय देखें।
- व्रत श्रद्धा और शांत मन से रखें।
- झूले और पूजा-स्थान को सादे फूलों से सजाएँ।
- श्रीमद्भागवत में कृष्ण-जन्म का प्रसंग पढ़ें या सुनें।
- परिवार और बच्चों के साथ भजन-कीर्तन करें और प्रसाद पड़ोसियों में बाँटें।
- बच्चों को कृष्ण की कथा और गीता का संदेश सरल भाषा में सुनाएँ।
क्या न करें
- जिस परंपरा में व्रत के दिन अन्न वर्जित है, उसमें अन्न न खाएँ।
- पूजा पूरी करनी हो तो निशीथ काल का क्षण न चूकें।
- एकादशी और रविवार को तुलसी न तोड़ें; एक दिन पहले साफ़ हाथों से तोड़कर धोकर रखे पत्ते काम में लें।
- प्याज, लहसुन और मांसाहार से दूर रहें।
- पर्व को केवल दावत या शोर-शराबे का आयोजन न बनाएँ।
- कौन सा दिन सही है, इस पर बहस न करें; अपनी परंपरा मानें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
जब अष्टमी और रोहिणी एक ही अर्धरात्रि में नहीं मिलतीं, तब स्मार्त और वैष्णव परंपराएँ कभी-कभी अलग दिनों पर पर्व मनाती हैं। इस्कॉन सहित अनेक वैष्णव समुदाय अपने नियम का पालन करते हैं, इसलिए कई बार दूसरा दिन वैष्णव जन्माष्टमी होता है। अपने परिवार या संप्रदाय की सलाह मानें।
मथुरा, वृन्दावन और गोकुल के मंदिरों में सजावट और झाँकियों का विशेष आयोजन होता है, और उत्तर प्रदेश तथा बिहार के घरों में झूला, जागरण और भजन-कीर्तन की परंपरा है। महाराष्ट्र और गुजरात में अगले दिन दही हांडी होती है, जिसमें टोलियाँ मानव-पिरामिड बनाकर ऊँची टँगी दही की मटकी फोड़ती हैं, मानो कृष्ण की माखन-चोरी याद की जा रही हो। तमिलनाडु और केरल में आँगन में कृष्ण के नन्हें पैरों के चिह्न बनाए जाते हैं। मथुरा, वृन्दावन और ओडिशा में अगला दिन नंदोत्सव है।
आज के समय में
मध्यरात्रि की पूजा देर से होती है, इसलिए शहरों में कई मंदिर शाम को ही मुख्य आयोजन कर लेते हैं। घर पर आप शाम को सरल अभिषेक और रात बारह बजे की आरती परिवार के साथ कर सकते हैं। अगले दिन दफ़्तर या स्कूल हो तो पूजा छोटी रखें, या परंपरा इजाज़त दे तो मुख्य पूजा पहले कर लें। फ्लैट में घी के दीपक पर्दों से दूर रखें और शंख-घंटी की आवाज़ पड़ोसियों का ध्यान रखकर बजाएँ। निशीथ काल का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पंचांग में अपने शहर का समय देखें; विदेश में रहने वाले परिवार भी यही करें, क्योंकि वहाँ के मंदिर अक्सर सप्ताहांत पर उत्सव करते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।