राधा अष्टमी

Radha Ashtami

कृष्ण की प्रिया राधा का प्राकट्य दिवस, जो भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को प्रार्थना, कीर्तन और भक्तिपूर्ण उपवास के साथ मनाया जाता है।

देवता: राधा, कृष्णअवधि: एक दिनऋतु: वर्षा ऋतु का अंतअन्य नाम: राधाष्टमी, राधा जयंती

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तारीख़पर्व या अवसर
शनिवार, 19 सितंबर 2026राधा अष्टमी
बुधवार, 8 सितंबर 2027राधा अष्टमी
रविवार, 27 अगस्त 2028राधा अष्टमी

परिचय

राधा अष्टमी राधा के प्राकट्य का उत्सव है। राधा श्रीकृष्ण की प्रिया और निश्छल भक्ति का रूप मानी जाती हैं। यह भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को आती है, जो कृष्ण जन्माष्टमी के लगभग पंद्रह दिन बाद पड़ती है। शुक्ल पक्ष में होने के कारण पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों गणनाओं में महीने का नाम भाद्रपद ही रहता है और तिथि भी वही रहती है।

यह पर्व वैष्णव परंपराओं में, ब्रज (मथुरा, वृन्दावन, बरसाना) में और राधा-कृष्ण के भक्तों में विशेष महत्व रखता है। बरसाना को राधा का गाँव और रावल को उनका जन्मस्थान बताया जाता है। परंपरा में राधा का प्राकट्य मध्याह्न में माना जाता है, इसलिए मुख्य पूजा दोपहर के समय की जाती है; अपने नगर का समय पंचांग में देख लें।

महत्व और कथाएँ

परंपरागत वृत्तांतों के अनुसार राधा गोकुल के पास रावल में वृषभानु और कीर्ति की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। एक कथा कहती है कि पिता को वे सरोवर में कमल पर मिलीं। दूसरी कहती है कि जब तक कृष्ण सामने नहीं आए, उन्होंने आँखें नहीं खोलीं। ये भक्ति-कथाएँ हैं और अलग-अलग ग्रंथ इन्हें अलग तरह से कहते हैं।

राधा को प्रेम और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। अनेक वैष्णव आचार्य कहते हैं कि कृष्ण की भक्ति राधा के माध्यम से सुलभ होती है। यह दिन निस्वार्थ प्रेम और भक्त तथा भगवान की निकटता पर विचार करने का है; इसे गीत, कथा-पाठ और भोग के साथ मनाया जाता है।

पूजा विधि

  1. भोर में स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा-स्थान साफ़ करके सजाए हुए आसन पर राधा-कृष्ण की मूर्ति या चित्र रखें।
  3. भक्तिभाव से व्रत का संकल्प लें।
  4. परंपरा हो तो पंचामृत से स्नान कराकर प्रतिमा को नए वस्त्र पहनाएँ।
  5. फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
  6. "राधे राधे" का जप करें या राधा चालीसा जैसे भजन गाएँ। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  7. राधा के प्राकट्य की कथा पढ़ें या सुनें।
  8. आरती करें और खीर, फल, मिठाई, मक्खन-मिश्री का भोग लगाएँ।
  9. प्रसाद परिवार और आने वालों में बाँटें।

पूजन सामग्री

  • राधा-कृष्ण का चित्र या मूर्ति
  • पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, चीनी)
  • ताज़े फूल, तुलसी दल, मालाएँ
  • प्रतिमा के लिए नए वस्त्र और आभूषण
  • चंदन, रोली, अक्षत
  • धूप, घी का दीप, कपूर
  • फल, मिठाई, खीर या मक्खन-मिश्री

व्रत और भोजन

बहुत-से भक्त दिन भर उपवास रखकर दोपहर या संध्या की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं। व्रत प्रायः फलाहारी या सात्त्विक होता है; कुछ लोग आधे दिन का व्रत रखते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, दवा लेने वाले और गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएँ उपवास उतना ही रखें जितना डॉक्टर की सलाह से ठीक हो; हल्का व्रत भी मान्य है। प्याज, लहसुन और मांसाहार से दूर रहें। प्रसाद सादा होता है: फल, दूध की मिठाई और खीर।

क्या करें

  • पूजा-स्थान को फूलों से सजाएँ और स्वच्छ रखें।
  • राधा-कृष्ण के भजन गाएँ।
  • भागवत या भक्ति-साहित्य की कथाएँ पढ़ें।
  • सादा भोग श्रद्धा से बनाएँ।
  • प्रसाद बाँटकर सेवा करें।
  • बच्चों को राधा के प्राकट्य की कथा सुनाएँ।
  • मन शांत और वाणी कोमल रखें।

क्या न करें

  • इस दिन को इस बहस में न बदलें कि ईश्वर का कौन-सा रूप बड़ा है।
  • भोग लगाने से पहले भोजन को चखें नहीं।
  • पूजा में बासी फूल या पत्ते न चढ़ाएँ।
  • व्रत के दिन प्याज, लहसुन और मांसाहार न लें।
  • क्रोध में या जल्दबाज़ी में व्रत न खोलें।
  • भक्ति को दिखावा न बनाएँ।

क्षेत्रीय परंपराएँ

बरसाना में पहाड़ी पर राधा रानी का मंदिर है और पूरा नगर गीत, नृत्य और शोभायात्रा के साथ पर्व मनाता है। वृन्दावन और मथुरा के मंदिर सजाए जाते हैं और भजन गूँजते हैं। उत्तर भारत के अनेक परिवारों में इसी अष्टमी से सोलह दिन का महालक्ष्मी व्रत भी शुरू होता है। गुजरात और राजस्थान में पुष्टिमार्गी भक्त विशेष सेवा करते हैं। बंगाल और ओडिशा में गौड़ीय वैष्णव कीर्तन करते हैं। रीतियाँ अलग-अलग हैं; अपनी परंपरा के अनुसार चलें।

आज के समय में

शहर में रहने वाले परिवार घर पर राधा-कृष्ण का चित्र रखकर छोटा सजा हुआ आसन बना सकते हैं, फूल चढ़ा सकते हैं और मिलकर भजन गा सकते हैं। यह पर्व गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज के आसपास पड़ता है, इसलिए परिवारों के लिए सप्ताह व्यस्त रहता है। कामकाजी दिन हो तो पूजा संध्या को कर लें। ताज़े फूल और तुलसी बाज़ार में मिल जाते हैं; बगीचे या गमले के कुछ फूल भी पर्याप्त हैं। विदेश में रहने वाले परिवार अपने नगर के मध्याह्न का समय देखें और कीर्तन में स्थानीय वैष्णव समाज के साथ जुड़ सकते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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