गणेश चतुर्थी
Ganesh Chaturthi
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्म का पर्व, जिसमें मिट्टी की प्रतिमा की स्थापना, प्रतिदिन पूजा और अंत में विसर्जन किया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| सोमवार, 14 सितंबर 2026 | गणेश चतुर्थी |
| शनिवार, 4 सितंबर 2027 | गणेश चतुर्थी |
| बुधवार, 23 अगस्त 2028 | गणेश चतुर्थी |
परिचय
गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता और शुभारंभ के देवता भगवान गणेश के जन्म का पर्व है। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को आती है, और पूर्णिमान्त तथा अमान्त, दोनों पंचांगों में यह एक ही दिन पड़ती है।
परिवार और समाज मिट्टी की गणेश प्रतिमा घर लाते हैं, उसकी स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा करते हैं, चुने हुए दिनों तक पूजा करते हैं और फिर विसर्जन से विदा करते हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सव को उन्नीसवीं सदी के अंत में महाराष्ट्र में व्यापक रूप मिला, जिसमें लोकमान्य तिलक की बड़ी भूमिका मानी जाती है; पर घर में गणेश पूजन बहुत पुराना है।
महत्व और कथाएँ
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार पार्वती जी ने अपने उबटन से एक बालक बनाकर उसमें प्राण डाले और उसे द्वार पर पहरे पर बिठाया। शिव जी लौटे तो बालक ने उन्हें रोक दिया, और संघर्ष में शिव जी ने उसका सिर काट दिया। पार्वती जी के शोक पर उन्होंने हाथी का सिर लगाकर बालक को जीवित किया, उसे गणों का नायक (गणपति) बनाया और वरदान दिया कि हर देवता से पहले उसकी पूजा होगी।
गणेश जी बुद्धि और नई शुरुआत के देवता हैं, इसलिए काम, पढ़ाई और व्यापार का आरंभ उनके स्मरण से होता है। मिट्टी की प्रतिमा का जल में घुल जाना याद दिलाता है कि रूप नश्वर है, जबकि चेतना बनी रहती है।
पूजा विधि
- घर और पूजा स्थल को साफ़ करके फूल, रंगोली और मंडप से सजाएँ। मुहूर्त से पहले प्रतिमा घर लाएँ।
- मुख्य पूजा का श्रेष्ठ समय मध्याह्न है, क्योंकि मान्यता है कि गणेश जी का जन्म इसी काल में हुआ था। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।
- संकल्प लें और प्राण प्रतिष्ठा के साथ गणेश जी का आवाहन करें; पुरोहित मार्गदर्शन कर सकते हैं।
- षोडशोपचार पूजा करें, यानी जल, आसन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह उपचार अर्पित करें।
- 21 दूर्वा और लाल गुड़हल के फूल चढ़ाएँ, और मोदक, नारियल तथा फल का नैवेद्य लगाएँ।
- "ॐ गं गणपतये नमः" का जप करें, या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- पूजा के दिनों में सुबह और शाम आरती करें।
- विसर्जन के दिन अंतिम पूजा करके अगले वर्ष फिर पधारने की प्रार्थना के साथ गणेश जी को विदा करें।
पूजन सामग्री
- मिट्टी की पर्यावरण-हितैषी गणेश प्रतिमा और लकड़ी की चौकी
- 21 दूर्वा, लाल गुड़हल और अन्य फूल
- मोदक, नारियल, केले, फल और मिठाई
- हल्दी, रोली, चंदन, अक्षत, पान और सुपारी
- धूप, घी का दीप, कपूर, लाल वस्त्र और जल से भरा कलश
व्रत और भोजन
बहुत से परिवार कठोर उपवास नहीं रखते, पर कुछ मुख्य पूजा पूरी होने तक उपवास करते हैं। यह पर्व शाकाहारी मिठाइयों का उत्सव है: मोदक (भाप में पके या तले हुए), पूरन पोली, लड्डू और नारियल के व्यंजन। जिन परंपराओं में आवश्यक है, वहाँ पूजा के दिनों में प्याज, लहसुन और मांसाहार नहीं लिया जाता। उपवास रखना हो तो बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।
क्या करें
- हानिकारक रंग और प्लास्टर से मुक्त, मिट्टी की प्रतिमा चुनें।
- मध्याह्न मुहूर्त देखें और पूजा समय पर शुरू करें।
- दूर्वा और लाल फूल चढ़ाएँ।
- दिन में दो बार आरती करें।
- अतिथियों का स्वागत करें और प्रसाद बाँटें।
- बच्चों को कथाएँ सिखाएँ।
क्या न करें
- प्लास्टर ऑफ पेरिस और विषैले रंगों वाली प्रतिमा न लें।
- पर्व की रात चन्द्रमा न देखें, यदि आपकी परंपरा ऐसा मानती है; कथा है कि चौथ का चन्द्रमा देखने से श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा था। चन्द्रमा दिख जाए तो घबराएँ नहीं; स्यमंतक कथा सुनने की रीति है।
- प्रतिमा को बिना दीप और देखभाल के न छोड़ें।
- गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ, क्योंकि अधिकतर परंपराओं में इसे वर्जित माना जाता है।
- पूजा के फूल और सामग्री नदी या तालाब में न फेंकें।
- पर्व को शोर और कचरे का उत्सव न बनाएँ।
क्षेत्रीय परंपराएँ
परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन प्रतिमा रखते हैं; दस दिन वाली स्थापना अनंत चतुर्दशी को पूरी होती है। महाराष्ट्र में पर्व भव्य होता है, जिसमें सामुदायिक पंडाल, शोभायात्राएँ और उकडीचे मोदक होते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसे विनायक चतुर्थी या चविथि कहते हैं, और तमिलनाडु में पिल्लैयार की पूजा कोझुकट्टै के साथ होती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में भी घरों और मोहल्लों में प्रतिमा स्थापित होती है। मिथिला (बिहार) में इसी तिथि की शाम को चौठचन्द्र, या चौरचन, मनाया जाता है, जिसमें दही, फल और पकवान से चन्द्रमा की पूजा होती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।
आज के समय में
फ्लैट के लिए मिट्टी की छोटी, पर्यावरण-हितैषी प्रतिमा चुनें। नदी, झील या समुद्र में विसर्जन पर कई शहरों में नियम हैं, इसलिए घर में बाल्टी या टब में प्रतिमा घोलकर उस जल को गमलों में डालना अच्छा विकल्प है; कई नगर निकाय कृत्रिम कुंड भी बनाते हैं। कार्यदिवस पर पर्व पड़े तो मुख्य पूजा सुबह जल्दी या शाम को करें, और चाहें तो स्थापना डेढ़ या तीन दिन की रखें। विदेश में सार्वजनिक जल में विसर्जन अक्सर वर्जित होता है, इसलिए घर में प्रतीकात्मक विसर्जन करें या स्थानीय समुदाय के अनुमत आयोजन में जाएँ।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।