अनंत चतुर्दशी

Anant Chaturdashi

भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनंत सूत्र के साथ विष्णु का व्रत रखा जाता है और गणेशोत्सव का समापन गणेश विसर्जन से होता है।

देवता: भगवान विष्णु (अनंत), गणेशअवधि: एक दिनऋतु: वर्षा ऋतु का अंतअन्य नाम: अनंत चौदस, अनंत व्रत, गणेश विसर्जन का दिन

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तारीख़पर्व या अवसर
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026अनंत चतुर्दशी
मंगलवार, 14 सितंबर 2027अनंत चतुर्दशी
शनिवार, 2 सितंबर 2028अनंत चतुर्दशी

परिचय

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को पड़ती है, यानी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष का चौदहवाँ दिन। पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में यह एक ही दिन है। इसके दो अंग हैं। पहला, भगवान विष्णु के अनंत रूप का व्रत, जिसमें चौदह गाँठों वाला रक्षा-सूत्र हाथ में बाँधा जाता है। दूसरा, दस दिन के गणेशोत्सव का समापन, जब गणेश जी की प्रतिमा का विदाई-पूजन के साथ विसर्जन होता है।

दोनों कर्म एक ही दिन होते हैं, पर एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हैं। कुछ परिवार केवल एक ही करते हैं, बहुत से दोनों।

महत्व और कथाएँ

अनंत व्रत की कथा पुराणों में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में आती है। वनवास में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को खोया राज्य पाने के लिए यह व्रत करने की सलाह दी। दूसरी कथा सुशीला और ऋषि कौण्डिन्य की है। सुशीला ने अनंत सूत्र बाँधा और उसके घर समृद्धि आई। कौण्डिन्य ने उसे तुच्छ समझकर जला दिया और कष्ट में पड़ गए। भूल समझने पर वे भगवान अनंत की खोज में निकले, और व्रत के प्रभाव से परिवार का संकट दूर हुआ।

अनंत नाम शेषनाग का भी है, जिन पर विष्णु शयन करते हैं। चौदह गाँठों को परंपरा में चौदह लोकों से जोड़ा गया है। अधिकतर लोगों के लिए यह व्रत अटल श्रद्धा और विनम्रता का है, किसी निश्चित परिणाम की गारंटी का नहीं।

गणेश विसर्जन भगवान को भावभीनी विदाई है, जो याद दिलाती है कि सब रूप अंत में प्रकृति में लौटते हैं। भक्त कहते हैं: "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।"

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा का स्थान साफ़ करें। अनंत व्रत का संकल्प लें।
  2. कलश पर भगवान विष्णु या अनंत का चित्र रखें। सूती या रेशमी धागे में चौदह गाँठें लगाकर अनंत सूत्र तैयार करें और उसे हल्दी या कुमकुम से रंग लें।
  3. फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप और दीप चढ़ाएँ। सूत्र को अर्पित करके हाथ में बाँधें। रीति के अनुसार पुरुष इसे दाएँ हाथ में और स्त्रियाँ बाएँ हाथ में बाँधती हैं।
  4. "ॐ अनन्ताय नमः" का जप करें या अनंत चतुर्दशी की कथा पढ़ें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  5. नैवेद्य में मीठी पूड़ी, खीर या फल अर्पित करें। कुछ परिवारों में चौदह की संख्या में पूड़ी या पुए अर्पित करने की भी रीति है।
  6. घर में गणेश जी की स्थापना की हो तो अंतिम पूजा और आरती करें, और मोदक तथा नारियल चढ़ाएँ।
  7. जहाँ अनुमति हो वहाँ विदाई की प्रार्थना के साथ प्रतिमा का विसर्जन करें।
  8. अनंत सूत्र चौदह दिन पहनने की परंपरा है। फिर उसे आदर के साथ उतारकर किसी पेड़ या गमले में रख दें।

पूजन सामग्री

  • विष्णु या अनंत का चित्र और कलश
  • चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्र, हल्दी और कुमकुम
  • तुलसी दल, फूल, चंदन, अक्षत
  • धूप, घी का दीप, कपूर
  • फल, मीठी पूड़ी, खीर, पंचामृत
  • विसर्जन के लिए दूर्वा, मोदक, नारियल, फूल और आरती की थाली

व्रत और भोजन

बहुत से भक्त पूजा होने तक उपवास रखते हैं और फिर सादा सात्त्विक भोजन करते हैं। कुछ परंपराओं में बिना नमक का भोजन किया जाता है। हल्का उपवास भी ठीक है। इस दिन प्याज़, लहसुन और मांसाहार से दूर रहें। बीमार लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग उपवास अपने चिकित्सक की सलाह से ही रखें।

क्या करें

  • अनंत सूत्र को स्वच्छ रखें और चौदह दिन आदर के साथ पहनें।
  • विसर्जन से पहले पूरे परिवार के साथ गणेश जी की आरती करें।
  • विसर्जन का पर्यावरण के अनुकूल तरीक़ा चुनें, जैसे मिट्टी की प्रतिमा और घर में या कृत्रिम कुण्ड में विसर्जन।
  • पूजा और विसर्जन का मुहूर्त पंचांग में देख लें।
  • पड़ोसियों के साथ प्रसाद बाँटें और बच्चों को अनंत तथा गणेश की कथाएँ सुनाएँ।
  • कृतज्ञता के रूप में अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ दान करें।

क्या न करें

  • विसर्जन में जल्दबाज़ी न करें और उसे हल्के में न लें।
  • अनंत सूत्र को जलाएँ नहीं और अनादर के साथ फेंकें नहीं।
  • प्लास्टिक, थर्मोकोल या न गलने वाली चीज़ें विदाई में न लें।
  • पूजा की सामग्री सार्वजनिक जल में न डालें।
  • विदाई में नशा न करें और बहुत तेज़ संगीत न बजाएँ।
  • व्रत को किसी निश्चित फल की गारंटी न समझें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

महाराष्ट्र में मुंबई और पुणे जैसे नगरों में गणेश प्रतिमाओं के बड़े सार्वजनिक जुलूस निकलते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से घरों में यह दिन मुख्यतः अनंत व्रत, कथा और विष्णु पूजा का है; गणेशोत्सव वहाँ महाराष्ट्र जैसे विशाल रूप में नहीं होता। दक्षिण में विष्णु की अनंत पद्मनाभ के रूप में उपासना होती है, और केरल में इसका संबंध तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर से जोड़ा जाता है। दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व, जो भाद्रपद शुक्ल पंचमी से शुरू होता है, इसी दिन पूर्ण होता है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।

आज के समय में

कई नगरों में नदियों, झीलों और तालाबों में प्रतिमा विसर्जन पर रोक है, इसलिए घर में प्रतीकात्मक विसर्जन अच्छा विकल्प है। मिट्टी की प्रतिमा को टब या बड़ी बाल्टी के जल में घोलें और उस जल को गमलों या बग़ीचे की मिट्टी में डाल दें, अथवा प्रतिमा को गमले में रखकर उसमें कोई पौधा लगा दें। मोहल्ले या नगर निगम के कृत्रिम कुण्ड में भी विसर्जन हो सकता है।

कार्य-दिवस पर पूजा सुबह और विदाई शाम को रखें। पूजा तथा विसर्जन का मुहूर्त पंचांग में देख लें। फ़्लैट में दीप और धूप पर्दों तथा जलने वाली चीज़ों से दूर रखें। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर के मंदिर या समुदाय द्वारा आयोजित विसर्जन में शामिल हो सकते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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