संकष्टी चतुर्थी
Sankashti Chaturthi
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का व्रत, जो चन्द्रोदय के बाद अर्घ्य, आरती और सादे भोजन से पूरा होता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शुक्रवार, 27 नवंबर 2026 | संकष्टी चतुर्थी |
| शनिवार, 26 दिसंबर 2026 | संकष्टी चतुर्थी |
| सोमवार, 25 जनवरी 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| बुधवार, 24 फ़रवरी 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| गुरुवार, 25 मार्च 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| शनिवार, 24 अप्रैल 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| रविवार, 23 मई 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| मंगलवार, 22 जून 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| गुरुवार, 22 जुलाई 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| शुक्रवार, 20 अगस्त 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| रविवार, 19 सितंबर 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
| सोमवार, 18 अक्टूबर 2027 | संकष्टी चतुर्थी |
परिचय
संकष्टी का अर्थ है संकट से छुटकारा। यह व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है, यानी पूर्णिमा के बाद घटते चन्द्रमा वाले पखवाड़े की चौथी तिथि को। यह दिन विघ्नहर्ता गणेश जी को समर्पित है। व्रत चन्द्रोदय के बाद, चन्द्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है, इसलिए वही दिन माना जाता है जिस दिन चन्द्रोदय के समय चतुर्थी तिथि हो। हर महीने की संकष्टी का अलग नाम और गणेश जी का अलग रूप माना गया है, और उसकी अलग कथा पढ़ी जाती है।
महत्व और कथाएँ
गणेश जी की पूजा हर शुभ कार्य से पहले होती है। इसीलिए अनेक परिवार काम, पढ़ाई और घर-गृहस्थी की बाधाएँ दूर होने की प्रार्थना के साथ यह व्रत रखते हैं। कथाओं में ऐसे भक्तों का वर्णन है जिन्होंने कठिन समय में गणेश जी की शरण ली और राहत पाई।
चन्द्रमा का स्थान इस व्रत में एक कथा के कारण है। कहते हैं कि चन्द्रमा ने गणेश जी का उपहास किया था, तब चन्द्रमा को शाप मिला। बाद में चतुर्थी के दिन गणेश जी की उपासना करने से वह शाप हल्का हुआ। इसी कारण चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत पूरा होता है।
अंगारकी संकष्टी
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं। मंगल का एक नाम अंगारक भी है। इसे विशेष शुभ माना जाता है। कई भक्त इस दिन अधिक नियम से व्रत रखते हैं और गणेश मंदिर में दर्शन करने जाते हैं।
माघ की बड़ी संकष्टी (सकट चौथ)
पूर्णिमान्त पंचांग के माघ मास (माघ कृष्ण चतुर्थी) की संकष्टी को उत्तर भारत में सकट चौथ, तिलकुटा चौथ या तिल चौथ कहते हैं। अमान्त पंचांग में यही दिन पौष कृष्ण चतुर्थी कहलाता है। कई लोग, विशेषकर उत्तर भारत में, इसे वर्ष की सबसे प्रमुख संकष्टी मानते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में माताएँ संतान की कुशलता के लिए यह व्रत रखती हैं। तिल और गुड़ का तिलकुट बनता है और उसी का भोग लगता है। महीने का नाम पद्धति के अनुसार बदल जाता है, इसलिए अपने क्षेत्र का पंचांग देख लें।
पूजा विधि
- सुबह उठकर स्नान करें और संकष्टी व्रत का संकल्प लें।
- स्वच्छ आसन पर गणेश जी की मूर्ति या चित्र रखें और दीप जलाएँ।
- दूर्वा (परंपरा में 21 दूर्वा), लाल फूल, मोदक या लड्डू और फल अर्पित करें।
- "ॐ गं गणपतये नमः" का जप करें, या गणपति अथर्वशीर्ष अथवा संकष्टी की कथा पढ़ें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- दिन भर व्रत रखें।
- चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा को जल का अर्घ्य दें, फिर गणेश जी की आरती करें।
- प्रसाद और सादे भोजन से पारण करें।
पूजन सामग्री
- गणेश जी की मूर्ति या चित्र।
- दूर्वा, लाल गुड़हल या अन्य लाल फूल।
- मोदक, लड्डू या कोई मिठाई; माघ में तिलकुट।
- नारियल, फल, पान और सुपारी।
- धूप, दीप, चंदन और सिंदूर।
- चन्द्रमा को अर्घ्य के लिए जल और दूध।
व्रत और भोजन
अधिकतर लोग दिन में केवल फल, दूध, साबूदाना या अन्न रहित आहार लेते हैं और चन्द्रोदय के बाद व्रत खोलते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, तो कुछ एक समय भोजन करते हैं। जो निभा सकें, वही चुनें।
चन्द्रोदय का समय हर शहर का अलग होता है। इस पंचांग में आपके शहर का समय दिया गया है। बादल छाए हों और चन्द्रमा न दिखे, तब भी सही समय पर प्रार्थना और अर्घ्य किया जा सकता है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें और हल्का व्रत करें।
क्या करें
- अपने शहर का चन्द्रोदय समय पहले से देख लें।
- हो सके तो 21 ताज़ी दूर्वा चढ़ाएँ।
- उस महीने की संकष्टी की कथा पढ़ें या सुनें।
- प्रसाद परिवार के साथ बाँटें।
- वाणी कोमल रखें और काम ईमानदारी से करें।
- ज़रूरतमंद को कुछ दान दें।
क्या न करें
- पारंपरिक व्रत में चन्द्रमा के दर्शन से पहले भोजन न करें।
- गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ।
- टूटी या सूखी दूर्वा न चढ़ाएँ।
- जो व्रत आपकी सेहत के लिए ठीक न हो, उसे न रखें।
- दिन ख़ाली बैठकर न बिताएँ; थोड़ी प्रार्थना और शांति को समय दें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
महाराष्ट्र और कर्नाटक में संकष्टी का विशेष महत्व है। मोदक का भोग लगता है और अंगारकी संकष्टी पर गणेश मंदिरों में भारी भीड़ रहती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा में माघ की सकट चौथ प्रमुख है, जिसमें तिल के व्यंजन बनते हैं। काशी के छप्पन विनायकों में ढुण्ढिराज गणेश प्रमुख माने जाते हैं, और संकष्टी पर लोग गणेश मंदिरों में दर्शन करते हैं। तमिलनाडु में इसे संकट हर चतुर्थी कहते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
चन्द्रोदय का समय शहर और मौसम के अनुसार बहुत बदलता है, इसलिए किसी और शहर का नहीं, अपने शहर का समय देखें। ऊँची इमारतों या बादलों के कारण चन्द्रमा न दिखे, तो उसी समय पूर्व दिशा की ओर जल अर्पित कर दें। दूर्वा बिना रसायन वाले बगीचे या गमले से लें; फ़्लैट में गमले में उगा लेना सुविधाजनक है। दफ़्तर में रहते हों तो दिन में हल्का व्रत रखें और शाम की पूजा घर लौटकर कर लें। विदेश में रहने वाले परिवार स्थानीय मंदिर की संकष्टी पूजा में भी शामिल हो सकते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।