करवा चौथ
Karwa Chauth
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का व्रत, जिसमें विवाहित स्त्रियाँ पति की लंबी आयु के लिए दिन भर उपवास रखती हैं और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 | करवा चौथ |
| सोमवार, 18 अक्टूबर 2027 | करवा चौथ |
| शनिवार, 7 अक्टूबर 2028 | करवा चौथ |
परिचय
करवा चौथ उत्तर भारत का प्रमुख व्रत है। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आता है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की अमान्त गणना में यही तिथि आश्विन कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है।
"करवा" मिट्टी के छोटे टोंटीदार घड़े को कहते हैं और "चौथ" का अर्थ चतुर्थी है। यह व्रत दीपावली से लगभग 10 से 11 दिन पहले पड़ता है। व्रत उसी दिन रखा जाता है जिस दिन चन्द्रोदय के समय चतुर्थी मिले। चन्द्रोदय का समय हर शहर में अलग है, इसलिए अपने शहर का समय पंचांग में देख लें।
महत्व और कथाएँ
विवाहित स्त्रियाँ पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख की कामना से यह व्रत रखती हैं। कई अविवाहित कन्याएँ भी अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना के साथ इसे करती हैं। इस दिन गौरी, शिव, गणेश और चन्द्रमा का पूजन होता है।
सबसे प्रचलित कथा रानी वीरवती की है। पहले व्रत में भूख-प्यास से बेहाल वीरवती को कथा के एक रूप में भाइयों ने छल से नकली चन्द्रमा दिखा दिया। उसने व्रत तोड़ दिया और पति पर संकट आ गया। पश्चाताप के बाद उसने फिर श्रद्धा से व्रत किया, तब पति का जीवन लौटा। कुछ कथाओं में करवा नाम की पतिव्रता स्त्री और सावित्री का भी स्मरण होता है। कथाएँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदलती हैं।
यह व्रत निजी और स्वैच्छिक है। कुछ घरों में पति भी साथ उपवास रखते हैं, जो अच्छी बात है, पर आवश्यक नहीं।
पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले स्नान करके सरगी खाएँ। यह सुबह की वह थाली है जो परंपरा से सास देती हैं: फल, मेवे, मिठाई, पराँठा, सेवइयाँ और चाय या पानी।
- संकल्प लें कि चन्द्र-दर्शन तक व्रत रखेंगी। दिन में आराम करें; चाहें तो मेहँदी लगाएँ और नए वस्त्र पहनें।
- दोपहर बाद स्त्रियाँ साथ बैठती हैं और कोई बड़ी स्त्री करवा चौथ की कथा सुनाती हैं। कुछ परिवारों और क्षेत्रों में कथा के समय पूजा की थाली एक-दूसरे को सात बार घुमाने की रीति है।
- थाली सजाएँ: दीपक, जल भरा करवा, छलनी, मिठाई और रोली। गौरी, शिव और गणेश का पूजन करें।
- चन्द्रोदय के बाद छलनी से चन्द्रमा को देखें, जल से अर्घ्य दें, फिर उसी छलनी से पति को देखें। क्रम हर परिवार में थोड़ा अलग हो सकता है।
- पति के हाथ से जल का पहला घूँट और मिठाई का पहला कौर लेकर पारण करें।
- बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लें, कुछ घरों में सास को मिठाई और वस्त्र का बायना (भेंट) दें, फिर परिवार के साथ भोजन करें।
पूजन सामग्री
- दो करवे (मिट्टी या पीतल के), जल भरे और ढक्कन सहित
- छलनी, दीपक, धूप और फूल
- रोली, हल्दी, अक्षत, सिंदूर, चूड़ियाँ और मेहँदी
- मिठाई, फल और मठरी
- गौरी, शिव और गणेश का चित्र या मिट्टी की प्रतिमा
व्रत और भोजन
परंपरागत व्रत निर्जला है, यानी सूर्योदय से चन्द्रोदय तक अन्न और जल नहीं लिया जाता। कुछ स्त्रियाँ हल्का व्रत रखती हैं, जिसमें जल, फल या रस लिया जाता है; इसे भी मान्य माना गया है।
यह लंबा व्रत है। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमार लोगों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली स्त्रियों तथा दवा लेने वालों को उपवास उतना ही रखना चाहिए जितना उनके चिकित्सक उचित समझें। चक्कर या कमज़ोरी लगे तो जल पीकर व्रत खोल लें। नियम से बड़ा स्वास्थ्य है, और अधिकतर परिवार तथा पुरोहित भी यही मानते हैं।
क्या करें
- सरगी में फल, मेवे और तरल पदार्थ संतुलित लें।
- दिन में आराम करें और भारी काम से बचें।
- अपने शहर का चन्द्रोदय समय पंचांग में देख लें।
- तबीयत बिगड़ने की स्थिति में खजूर, फल या रस पास रखें।
- व्रत खोलते समय पहले जल, फिर थोड़ी मिठाई, फिर सामान्य भोजन लें।
क्या न करें
- बीमार या कमज़ोर लगे तो व्रत को खींचें नहीं; हल्का व्रत पूरी तरह स्वीकार्य है।
- किसी पर व्रत का दबाव न डालें, यह निजी निर्णय है।
- स्वास्थ्य की मजबूरी न हो तो चन्द्र-दर्शन और पूजा से पहले व्रत न तोड़ें।
- चन्द्रमा देखने के लिए छत की मुँडेर जैसी जोखिम भरी जगह पर न चढ़ें।
- किसी बुज़ुर्ग को केवल रस्म के लिए नींद से जगाकर परेशान न करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
करवा चौथ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल और मध्य प्रदेश में सबसे अधिक प्रचलित है। पंजाब में स्त्रियाँ लाल वस्त्र पहनती हैं और आपस में करवे बदलती हैं। कई जगह मिट्टी या गोबर से गौर माता की आकृति बनाकर पूजा होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में तीज और वट सावित्री जैसे व्रत भी उतने ही महत्व के हैं। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में करवा चौथ परंपरा से व्यापक नहीं है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
कभी बादल, धुंध या ऊँची इमारतों के कारण चन्द्रमा नहीं दिखता। तब बहुत से परिवार पंचांग के चन्द्रोदय समय पर चन्द्रमा की दिशा में मुख करके अर्घ्य देते हैं, या उसके चित्र के दर्शन करते हैं। फ्लैट में बालकनी या खुली छत से देखना सरल है, पर सुरक्षा का ध्यान रखें। कामकाजी दिन पर सरगी जल्दी खाकर हल्के काम के साथ दिन बिताना आम बात है, और कई सोसाइटियों में शाम को सामूहिक कथा-पूजा होती है। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर का चन्द्रोदय समय देखें, क्योंकि वह भारत से बहुत अलग हो सकता है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।