अहोई अष्टमी
Ahoi Ashtami
अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण अष्टमी को माताओं का संतान की मंगलकामना का व्रत है, जो तारों या चन्द्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है।
वाराणसी के लिए दिखाया गया; पृष्ठ के ऊपर से अपना शहर चुनें।
| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| रविवार, 1 नवंबर 2026 | अहोई अष्टमी |
| शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2027 | अहोई अष्टमी |
| बुधवार, 11 अक्टूबर 2028 | अहोई अष्टमी |
परिचय
अहोई अष्टमी माताओं का व्रत है, जो संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख के लिए रखा जाता है। उत्तर भारत की पूर्णिमान्त गणना में यह कार्तिक कृष्ण अष्टमी को पड़ता है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण की अमान्त गणना में उसी दिन को आश्विन कृष्ण अष्टमी कहते हैं। दिन वही है, केवल मास का नाम बदलता है।
यह करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद और दीपावली से लगभग एक सप्ताह पहले आता है। इसे मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है।
महत्व और कथाएँ
अहोई उस देवी का नाम है जो बच्चों की रक्षा करती हैं। यह व्रत माँ की अपनी संतान के लिए की गई प्रार्थना है। पहले यह पुत्रों के लिए रखा जाता था; अब अधिकतर परिवार इसे सभी संतानों के लिए रखते हैं।
प्रचलित कथा में एक स्त्री दीपावली की लिपाई के लिए मिट्टी खोद रही थी। अनजाने में उसकी खुरपी से स्याहू (साही) के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी संतानों पर एक के बाद एक कष्ट आने लगे। बड़ों की सलाह पर उसने सच्चे पश्चात्ताप के साथ अहोई माता का चित्र बनाकर व्रत किया, और उसकी संतान का संकट दूर हुआ। कथा के रूप क्षेत्र के अनुसार अलग हैं।
यह व्रत सभी जीवों के प्रति दया और माँ की प्रार्थना की शक्ति सिखाता है। इसमें भय नहीं, केवल ममता का भाव है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान करें और तारे दिखने तक व्रत रखने का संकल्प लें।
- दीवार या काग़ज़ पर अहोई माता का चित्र बनाएँ या लगाएँ, जिसमें आठ कोने, साही और उसके बच्चे हों। छपा हुआ चित्र या कैलेंडर भी मान्य है।
- संध्या को पूजा का स्थान साफ़ करें। चित्र के सामने जल का कलश रखें, उस पर स्वस्तिक बनाएँ और कुछ मिठाई रखें।
- फूल, दीप, धूप और अक्षत चढ़ाएँ, फिर अहोई माता की कथा पढ़ें या सुनें। अपने परिवार में प्रचलित कथा के लिए किसी बड़े से पूछ लें।
- कई परिवारों में धागे में चाँदी की अहोई (स्याहू) और दाने पिरोकर माला बनाई जाती है, जिसे दीपावली तक पहना जाता है। कुछ घरों में हर साल उसमें और दाने जोड़ने की रीति भी है।
- तारे दिखाई देने पर उन्हें अर्घ्य दें। कुछ घरों में करवा चौथ वाले करवे का जल काम में लिया जाता है। कुछ परिवार चन्द्रमा की प्रतीक्षा करते हैं।
- जल और हल्के भोजन से व्रत खोलें और बच्चों के साथ प्रसाद लें।
पूजन सामग्री
- अहोई माता और उनके बच्चों का चित्र
- जल का कलश, रोली से बना स्वस्तिक
- अक्षत, फूल, दीप, धूप, रोली, हल्दी
- मिठाई, पूड़ी, हलवा, फल
- कुछ परिवारों में चाँदी की अहोई या दानों की माला
व्रत और भोजन
परंपरागत व्रत अन्न के बिना, और प्रायः जल के बिना, तारे दिखने तक रखा जाता है। कुछ महिलाएँ फल, दूध या जल के साथ हल्का व्रत रखती हैं। अर्घ्य के बाद सादा भोजन होता है, जिसमें पूड़ी, हलवा और मिठाई रहती है।
बीमार लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग व्रत अपने चिकित्सक की अनुमति से ही रखें। तबीयत बिगड़े तो जल पी लें; किसी भी परंपरा में स्वास्थ्य को जोखिम में डालना ज़रूरी नहीं है।
क्या करें
- अपने शहर के लिए तिथि और तारे दिखने का समय पंचांग में देख लें।
- पूजा की सामग्री एक दिन पहले तैयार रख लें।
- बच्चों को कथा कोमल ढंग से सुनाएँ।
- दिन में काम या गाड़ी चलाने का दायित्व हो तो व्रत हल्का रखें।
- पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति दया रखें, यही इस व्रत का मूल संदेश है।
- अर्घ्य के बाद व्रत जल और हल्के भोजन से धीरे-धीरे खोलें।
क्या न करें
- जिस परिवार में यह रीति है, वहाँ इस दिन मिट्टी न खोदें और धारदार औजार का उपयोग न करें।
- कुछ परंपराओं में इस दिन सिलाई नहीं की जाती; अपने परिवार की रीति का पालन करें।
- हल्का व्रत रखना पड़े तो मन में अपराध-बोध न लाएँ।
- बेटियों को इस प्रार्थना से बाहर न रखें।
- किसी पर व्रत रखने का दबाव न डालें।
- जलता हुआ दीप चित्र के पास अकेला न छोड़ें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
अहोई अष्टमी पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े भाव से मनाई जाती है। कुछ परिवार दीवार पर रंगों से चित्र बनाते हैं, कुछ छपा चित्र लगाते हैं। ब्रज में गोवर्धन के राधा कुण्ड पर इस अष्टमी की मध्यरात्रि को संतान की कामना से स्नान करने की लोक मान्यता भी है। तारे को अर्घ्य दें या चन्द्रमा को, यह क्षेत्र और परिवार पर निर्भर है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में संतान के लिए एक अलग व्रत जीवित्पुत्रिका (जितिया) पूर्णिमान्त गणना की आश्विन कृष्ण अष्टमी को रखा जाता है, यानी अहोई अष्टमी से लगभग एक मास पहले। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
शहरों में रोशनी के कारण तारे कम दिखते हैं और बादल हों तो बिल्कुल नहीं दिखते। ऐसे में पंचांग में दिया गया तारे निकलने का समय देख लें और उसी समय आकाश की ओर देखकर अर्घ्य दे दें। यही अधिकतर परिवारों की रीति है।
अष्टमी कार्य-दिवस पर पड़े तो माताएँ हल्का व्रत रखकर संध्या को कार्यालय से लौटकर पूजा कर सकती हैं। फ़्लैट में दीवार पर चित्र बनाना कठिन हो तो छपा चित्र फ़्रेम में रखें। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर के स्थानीय समय से तारे दिखने पर अर्घ्य दें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।