गुरु पूर्णिमा
Guru Purnima
आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरुजनों और शिक्षकों के प्रति आभार का पर्व, जो महर्षि वेदव्यास की स्मृति से भी जुड़ा है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| बुधवार, 29 जुलाई 2026 | गुरु पूर्णिमा |
| रविवार, 18 जुलाई 2027 | गुरु पूर्णिमा |
| गुरुवार, 6 जुलाई 2028 | गुरु पूर्णिमा |
परिचय
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह तिथि पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पंचांगों में एक ही रहती है। यह दिन उन सबको धन्यवाद कहने का है जिन्होंने हमें राह दिखाई, चाहे वे आध्यात्मिक गुरु हों, विद्यालय के शिक्षक, माता-पिता या कोई मार्गदर्शक। महर्षि वेदव्यास के सम्मान में इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
"गुरु" शब्द का सामान्य अर्थ बताया जाता है: "गु" यानी अंधकार और "रु" यानी उसे हटाने वाला। यह दिन हिंदू, जैन और बौद्ध, तीनों परंपराओं में आदर से मनाया जाता है। बौद्ध इसे काशी के पास सारनाथ में बुद्ध के पहले उपदेश, यानी धर्मचक्र प्रवर्तन, की स्मृति से जोड़ते हैं। जैन परंपरा की कुछ धाराओं में इसे गौतम स्वामी की स्मृति से जोड़ा जाता है, जिन्हें भगवान महावीर का प्रथम गणधर (मुख्य शिष्य) माना गया है; इसकी मान्यता संप्रदाय के अनुसार अलग है। यह चातुर्मास के आरंभ के पास पड़ता है, जब साधु-संन्यासी चार महीने एक स्थान पर ठहरते हैं और शिष्य उनके पास जुटते हैं।
महत्व और कथाएँ
परंपरा में वेदव्यास को वेदों को चार भागों में बाँटने वाला, महाभारत का रचयिता और पुराणों का संकलनकर्ता माना जाता है। मान्यता है कि उनका जन्म इसी दिन हुआ था। हिंदू परंपरा में गुरु को शिष्य और परम ज्ञान के बीच का सेतु माना गया है। वह प्राचीन श्लोक, जिसमें गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान कहा गया है, इस दिन बहुत पढ़ा जाता है। संत कबीर का यह दोहा भी याद किया जाता है: "गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।"
इस दिन भगवान शिव को आदिगुरु के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने सप्तर्षियों को योग का ज्ञान दिया। भगवान दत्तात्रेय का भी स्मरण होता है। परंपरा की कथा के अनुसार उन्होंने पृथ्वी, जल और वायु जैसे प्रकृति के अनेक रूपों सहित चौबीस गुरुओं से सीखा। शिक्षक के प्रति आभार जताने के लिए किसी औपचारिक दीक्षा की ज़रूरत नहीं होती।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और घर में दीप जलाएँ।
- साफ़ कपड़े पर अपने गुरु का चित्र, या व्यास जी, शिव जी या दत्तात्रेय जी का चित्र रखें। कई संप्रदायों में गुरु की चरण-पादुका का भी पूजन होता है।
- फूल, धूप, चंदन और कुछ फल अर्पित करें।
- यह श्लोक पढ़ें: "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।" सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- महाभारत, गीता या अपने गुरु के उपदेशों का कोई अंश पढ़ें।
- गुरु जीवित हों तो उनसे मिलें या फ़ोन करें, प्रणाम करें और फल, फूल या दान के रूप में गुरु दक्षिणा अर्पित करें।
- माता-पिता और शिक्षकों के प्रति भी आभार प्रकट करें, फिर प्रसाद बाँटकर परिवार के साथ सादा भोजन करें।
पूजन सामग्री
- अपने गुरु या व्यास जी का चित्र
- फूल, माला, धूप, दीप और चंदन
- अक्षत, हल्दी, रोली, फल और मिठाई
- पाठ के लिए कोई धर्मग्रंथ
- गुरु के लिए छोटा सा उपहार या दक्षिणा
व्रत और भोजन
इस दिन कोई अनिवार्य व्रत नहीं है। कुछ लोग पूजा पूरी होने तक हल्का उपवास रखते हैं। बहुत से लोग सात्त्विक शाकाहारी भोजन करते हैं और प्याज़-लहसुन से बचते हैं। कुछ परिवार पूर्णिमा होने के कारण सत्यनारायण की पूजा भी करते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास तभी रखें जब चिकित्सक अनुमति दें।
क्या करें
- अपने किसी शिक्षक या मार्गदर्शक को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद कहें।
- कोई धार्मिक या प्रेरक ग्रंथ पढ़ें या सुनें।
- कुछ देर ध्यान या मौन चिंतन में बिताएँ।
- अपने से छोटे किसी व्यक्ति को कुछ सिखाएँ।
- माता-पिता का आभार प्रकट करें।
- जो गुरुजन अब इस संसार में नहीं हैं, उन्हें भी याद करें।
क्या न करें
- गुरु को ऐसी सत्ता न बना दें जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठ सकता। श्रद्धा और विवेक साथ चलते हैं।
- किसी भी गुरु या शिक्षक की निंदा या चुग़ली न करें।
- अपने ज्ञान का घमंड न करें।
- गुरु दक्षिणा को धन के प्रदर्शन का रूप न दें।
- रोज़मर्रा के शिक्षकों, जैसे विद्यालय के अध्यापकों, को न भूलें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
काशी में रामनगर क़िले के परिसर का व्यास मंदिर इस दिन विशेष रूप से याद किया जाता है, और गंगा के घाटों तथा आश्रमों में व्यास पूजन होता है। महाराष्ट्र और गुजरात में शिष्य आश्रमों और मंदिरों में जुटते हैं; दत्त और साईं बाबा के मंदिरों में विशेष पूजा होती है, और शिरडी में बड़ी भीड़ रहती है। नेपाल में विद्यार्थी इस दिन शिक्षकों का सम्मान करते हैं। दक्षिण भारत के कई मठों में व्यास पूजा होती है, और इसी दिन से संन्यासियों का चातुर्मास शुरू माना जाता है। संगीत और नृत्य की गुरु-शिष्य परंपरा में भी शिष्य गुरु का सम्मान करते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या अपने गुरु की सलाह मानें।
आज के समय में
दफ़्तर या विद्यालय के दिन भी इस पर्व को छोटे रूप में मनाया जा सकता है। सुबह घर के मंदिर में चित्र के सामने दीप और फूल रखकर प्रणाम कर लें, और शाम को परिवार के साथ बैठकर कोई अंश पढ़ें। किसी पुराने शिक्षक को फ़ोन या संदेश भेजकर धन्यवाद कहना भी सुंदर तरीक़ा है। जिनके गुरु दूर किसी दूसरे शहर या देश में हैं, वे समय का अंतर ध्यान में रखकर बात कर सकते हैं। विदेश के मंदिर और सांस्कृतिक केंद्र अक्सर पास के सप्ताहांत में कार्यक्रम रखते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।