राहुकाल

राहुकाल दिन के उजाले का आठवाँ भाग है, यानी लगभग डेढ़ घंटा। बहुत लोग इस समय में कोई नया और महत्त्वपूर्ण कार्य शुरू नहीं करते।

राहुकाल क्या है

राहुकाल का अर्थ है राहु का समय। राहु नवग्रहों में से एक छाया ग्रह है, जिसे ग्रहणों से जोड़ा जाता है। परंपरा में हर दिन राहु के प्रभाव का एक समय माना गया है, और उसमें विवाह, गृह प्रवेश, अनुबंध पर हस्ताक्षर या यात्रा आरंभ जैसे नए और महत्त्वपूर्ण कार्य शुरू करना उचित नहीं समझा जाता।

यह मार्गदर्शन है, डराने वाला नियम नहीं। चल रहा काम, रोज़ के काम और नियमित पूजा राहुकाल में नहीं रुकते। बहुत-से परिवार बस नया काम शुरू करने से पहले थोड़ा रुक जाते हैं।

गणना कैसे होती है

राहुकाल उसी दिन के सूर्योदय और सूर्यास्त से निकलता है।

  1. सूर्योदय से सूर्यास्त तक के उजाले का समय निकालिए।
  2. उसे आठ बराबर भागों में बाँटिए।
  3. सूर्योदय से गिनकर भागों को 1 से 8 तक नंबर दीजिए।
  4. उस वार के लिए तय भाग ही राहुकाल है।

उजाला 12 घंटे का हो, तो हर भाग डेढ़ घंटे का होता है। काशी में साल के सबसे लंबे दिन हर भाग लगभग 1 घंटा 43 मिनट का और सबसे छोटे दिन लगभग 1 घंटा 19 मिनट का होता है। इसी कारण राहुकाल का समय रोज़ बदलता है और हर शहर में अलग होता है।

किस वार को कौन-सा भाग

तालिका में राहुकाल के साथ यमगण्ड और गुलिक काल के भाग भी हैं। उदाहरण वाला स्तंभ ऐसे दिन का है जब सूर्योदय सुबह 6:00 बजे और सूर्यास्त शाम 6:00 बजे हो, यानी हर भाग 90 मिनट का।

वार राहुकाल का भाग राहुकाल का उदाहरण यमगण्ड का भाग गुलिक काल का भाग
रविवार आठवाँ शाम 4:30 से 6:00 बजे पाँचवाँ सातवाँ
सोमवार दूसरा सुबह 7:30 से 9:00 बजे चौथा छठा
मंगलवार सातवाँ दोपहर बाद 3:00 से 4:30 बजे तीसरा पाँचवाँ
बुधवार पाँचवाँ दोपहर 12:00 से 1:30 बजे दूसरा चौथा
गुरुवार छठा दोपहर 1:30 से 3:00 बजे पहला तीसरा
शुक्रवार चौथा सुबह 10:30 से दोपहर 12:00 बजे सातवाँ दूसरा
शनिवार तीसरा सुबह 9:00 से 10:30 बजे छठा पहला

अपने शहर का समय ही देखें

राहुकाल उसी जगह के सूर्योदय और सूर्यास्त पर टिका है जहाँ आप हैं। मुंबई में सूर्योदय काशी से ऋतु के अनुसार लगभग 25 से 55 मिनट बाद होता है, इसलिए वहाँ का राहुकाल भी उसी हिसाब से खिसका हुआ होगा। किसी दूसरे शहर के लिए छपे पंचांग का राहुकाल आपके शहर में ठीक नहीं बैठता। विदेश में रहने वाले परिवारों को तो अपने ही शहर के लिए निकाला समय देखना चाहिए, क्योंकि भारतीय समय पर बना पंचांग वहाँ कई घंटे गलत पड़ेगा।

आज के जीवन में राहुकाल अक्सर दफ़्तर या स्कूल के समय में पड़ता है। यदि पूजा का आरंभ या कोई नया अनुबंध एक-दो घंटे आगे खिसक सकता है, तो कई लोग खिसका देते हैं; न खिसक सके, तो भी कोई बात नहीं।

यमगण्ड, गुलिक काल और परंपराओं का भेद

दक्षिण भारत में राहुकाल के साथ यमगण्ड और गुलिक काल भी अक्सर देखे जाते हैं। ये भी दिन के आठ भागों में से वार के अनुसार तय होते हैं (ऊपर की तालिका देखिए)। उत्तर भारत में राहुकाल ही सबसे अधिक माना जाता है। कुछ परंपराएँ रात का राहुकाल भी निकालती हैं, थोड़े अलग क्रम से, पर मुख्य पालन दिन के राहुकाल का ही होता है।

सभी परंपराएँ राहुकाल को बराबर महत्त्व नहीं देतीं। कुछ क्षेत्रों में इसे बहुत कड़ाई से माना जाता है, कुछ में लगभग नहीं। यदि आप किसी पुरोहित की सलाह या परिवार की रीति मानते हैं, तो उसी पर टिके रहें। राहुकाल केवल एक कारक है; उसे तिथि, नक्षत्र और बाकी समयों के साथ पढ़ा जाता है, जो यहाँ हर दिन के लिए दिखाए जाते हैं।

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