वार: सप्ताह का दिन और उसका स्वामी
हिंदू सप्ताह के सातों वार किसी एक ग्रह के नाम पर हैं, जो उस दिन का स्वामी माना जाता है। क्रम वही है जो प्रचलित सप्ताह का है।
सात वार
वार (संस्कृत में वासर भी कहते हैं) का अर्थ है सप्ताह का दिन। हिंदू सप्ताह में सात दिन हैं, और हर दिन एक ग्रह का है, जिसे उस दिन का स्वामी कहते हैं। बहुत-से लोग हर वार को किसी देवता के पूजन से भी जोड़ते हैं, पर यह रीति परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलती है।
| वार | संस्कृत नाम | स्वामी ग्रह |
|---|---|---|
| रविवार | रविवासर (आदित्यवार) | सूर्य |
| सोमवार | सोमवासर (चन्द्रवार) | चन्द्र |
| मंगलवार | मंगलवासर (भौमवार) | मंगल |
| बुधवार | बुधवासर | बुध |
| गुरुवार | गुरुवासर (बृहस्पतिवार) | बृहस्पति (गुरु) |
| शुक्रवार | शुक्रवासर | शुक्र |
| शनिवार | शनिवासर | शनि |
हिंदी में भी वारों के नाम ग्रहों के नाम पर ही हैं: रवि का दिन सूर्य का, सोम का दिन चन्द्रमा का, शनि का दिन शनिदेव का। यही विचार संसार की कई संस्कृतियों के सप्ताह में मिलता है।
यह क्रम क्यों
सात शास्त्रीय ग्रहों को उनकी आभासी गति के क्रम से, मंद से तेज़, रखें तो क्रम बनता है: शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र। दिन के हर घंटे का स्वामी ग्रह इसी क्रम में बारी-बारी से आता है, इसे होरा कहते हैं। दिन का नाम उस ग्रह का होता है जो उसके पहले होरा का स्वामी है।
रविवार का पहला होरा सूर्य का है। 24 घंटे गिनते हुए, सात ग्रहों के चक्र में, अगले दिन का पहला होरा चन्द्रमा पर पहुँचता है, फिर मंगल पर, और आगे यही क्रम चलता है। इस तरह सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि का जाना-पहचाना क्रम बनता है।
हिंदू वार कब बदलता है
हिंदू गणना में दिन सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, इसलिए वार भी आधी रात को नहीं, सूर्योदय पर बदलता है। यदि आप रविवार की रात 2 बजे जाग रहे हैं, तो पंचांग के अनुसार तब भी रविवार ही है; सूर्योदय होते ही सोमवार शुरू होगा। यहाँ वार आपके शहर के सूर्योदय के हिसाब से दिखाया जाता है। फ़ोन की तारीख आधी रात को ही बदलती है।
वार के स्वामी का उपयोग
- राहुकाल हर वार को दिन के अलग भाग में आता है।
- चौघड़िया का क्रम हर वार को अलग चौघड़िया से शुरू होता है।
- बहुत-से परिवार किसी वार को व्रत या पूजन रखते हैं। प्रचलित रीतियाँ हैं: सोमवार को शिव, मंगलवार को हनुमान या देवी, बुधवार को गणेश, गुरुवार को विष्णु या गुरु, शुक्रवार को लक्ष्मी या संतोषी माता, और शनिवार को शनिदेव या हनुमान। रीतियाँ अलग-अलग हैं, इसलिए अपने परिवार की परंपरा मानें।
मुहूर्त-विचार में वार को तिथि और नक्षत्र के साथ देखा जाता है। एक दिन किसी काम के लिए अनुकूल और किसी दूसरे के लिए कम अनुकूल माना जा सकता है। ये नियम परंपराओं में अलग-अलग हैं, और कोई भी नियम पुरोहित या बड़ों की सलाह की जगह नहीं लेता।
स्थान का असर
वार स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर है। भारत में घड़ी का समय एक है, पर पूर्व में गुवाहाटी और पश्चिम में द्वारका के सूर्योदय में घंटे भर से ऊपर का अंतर है। विदेश में रहते हुए भारत के किसी आयोजन का पंचांग देख रहे हों, तो देख लें कि वह किस शहर के सूर्योदय पर बना है।