विवाह का मुहूर्त
हिंदू विवाह की तिथि चुनने का शास्त्रीय मार्गदर्शन: नक्षत्र, तिथि, वार, वर्जित मास और काल, कुण्डली मिलान और आयोजन के सुझाव।
शुभ दिन खोजे जा रहे हैं…
विवाह क्या है
विवाह हिंदू धर्म के प्रमुख संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। अग्नि के सामने दो व्यक्ति और दो परिवार जुड़ते हैं, और सप्तपदी (सात पग) इसके केन्द्र में है। यह पूरे जीवन को प्रभावित करता है, इसलिए इसकी तिथि पर सबसे अधिक विचार किया जाता है।
शास्त्रीय मार्गदर्शन
उत्तर भारत के अनेक पंचांगकार मुहूर्त चिन्तामणि और मुहूर्त मार्तण्ड के नियम मानते हैं। सूचियाँ अलग हो सकती हैं; यहाँ सबसे प्रचलित रूप दिया गया है।
अनिवार्य (प्रायः अपवाद नहीं)
- चातुर्मास: देवशयनी एकादशी से प्रबोधिनी एकादशी तक, जब भगवान विष्णु का शयन माना जाता है, विवाह नहीं होते। विवाह का मौसम प्रबोधिनी एकादशी के आसपास फिर खुलता है।
- खरमास: सूर्य के धनु या मीन राशि में रहने का समय वर्जित है।
- गुरु अस्त और शुक्र अस्त: बृहस्पति और शुक्र विवाह के आशीर्वाद और दांपत्य जीवन के कारक हैं। इनमें से कोई अस्त हो, तो विवाह की तिथि नहीं ली जाती।
- अधिक मास, ग्रहण और (उत्तर भारत में) होलिका दहन से पहले के आठ दिन, होलाष्टक, भी वर्जित हैं।
- मुख्य विधि के समय भद्रा और राहुकाल न हों।
प्रबल रूप से अपेक्षित
- नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तर भाद्रपद और रेवती। मघा, मूल और रेवती गण्डमूल के नक्षत्र भी हैं; कुछ विद्वान मूल को छोड़ देते हैं। पुष्य अन्य कार्यों में उत्तम है, पर परंपरा से विवाह में वर्जित है। भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, पूर्व फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा और पूर्व भाद्रपद भी वर्जित हैं।
- तिथि: दोनों पक्षों की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी शुभ हैं। रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अष्टमी और अमावस्या वर्जित हैं। कुछ सूचियाँ द्वादशी या पूर्णिमा भी मानती हैं, और कुछ दशमी छोड़ देती हैं। इस पृष्ठ की सूची में द्वादशी और पूर्णिमा वर्जित नहीं हैं, पर "सर्वोत्तम" भी नहीं गिनी जातीं।
श्रेष्ठ
- वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार। मंगलवार और शनिवार से कई परिवार बचते हैं; कुछ क्षेत्रों में रविवार मान्य है।
- मास: अमान्त पद्धति में कार्तिक (प्रबोधिनी एकादशी के बाद), मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ प्रचलित हैं। पौष अधिकतर धनु खरमास में आता है। पूर्णिमान्त गणना में कृष्ण पक्ष का मास अगला कहलाता है; अपने पंचांग से मिलाते समय यह ध्यान रखें। कई परिवार ज्येष्ठ संतान का विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं करते।
- पक्ष: शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ है, पर कृष्ण पक्ष के पहले आधे भाग में भी बहुत विवाह होते हैं। अक्षय तृतीया जैसे दिन कई क्षेत्रों में अबूझ (स्वयंसिद्ध) मुहूर्त माने जाते हैं।
- दिन का समय: उत्तर भारत, गुजरात, राजस्थान और बंगाल में मुख्य विधि प्रायः संध्या या रात्रि में होती है; दक्षिण भारत और अनेक महाराष्ट्रीय विवाहों में दिन में। अपने परिवार की रीति मानें।
इस पृष्ठ की शुभ दिनों की सूची केवल इन्हीं सात मासों के उन दिनों को दिखाती है जो सोमवार, बुधवार, गुरुवार या शुक्रवार को पड़ते हैं; अक्षय तृतीया मंगलवार या शनिवार को पड़े तो वह उसमें नहीं आती। सूची के समय सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के हैं, इसलिए संध्या या रात्रि के विवाह-लग्न का समय पुरोहित से तय करें।
कुण्डली मिलान
अधिकतर परिवार तिथि तय करने से पहले दोनों कुण्डलियाँ मिलवाते हैं। उत्तर भारत की अष्टकूट पद्धति में 36 गुणों में से लगभग 18 या अधिक मिलना सामान्यतः स्वीकार्य माना जाता है। दक्षिण भारत में प्रायः दस पोरुथम देखे जाते हैं। मिलान बातचीत का आधार है; वर-वधू के अपने निर्णय का स्थान नहीं लेता।
विधि की रूपरेखा
- गणेश पूजन और संकल्प, कलश (जल, आम के पत्ते और नारियल) के साथ।
- नवग्रह पूजा और हल्दी, मेहँदी जैसी क्षेत्रीय पूर्व-विधियाँ।
- जयमाला, कन्यादान, विवाह होम, पाणिग्रहण, सप्तपदी और वचन।
- बड़ों का आशीर्वाद और वधू का नए घर में प्रवेश।
आरंभ में ॐ गं गणपतये नमः का उच्चारण होता है। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
क्या करें और क्या न करें
- भवन आदि का आरक्षण कराने से पहले दोनों कुण्डलियों के साथ योग्य ज्योतिषी से मिलें। पहले चातुर्मास, खरमास, गुरु अस्त और शुक्र अस्त देखें, फिर नक्षत्र और तिथि। मुख्य विधि का समय पुरोहित से तय करें।
- केवल आगे भेजी गई सूची से तारीख़ न चुनें, और वर-वधू की उपलब्धता, स्वास्थ्य तथा इच्छा की अनदेखी न करें।
- पूर्ण मुहूर्त को सुखी विवाह की गारंटी और समझौते की तारीख़ को दोष न मानें।
आज के समय में
विवाह-भवन, भोजन-व्यवस्था और मेहमानों के रेल-आरक्षण अक्सर तारीख़ बाँध देते हैं। शुभ तारीख़ों पर एक ही दिन कई विवाह होते हैं, इसलिए भवन और पुरोहित महीनों पहले तय करें। सुविधाजनक तारीख़ चुनकर पुरोहित से उस दिन का सर्वश्रेष्ठ समय पूछ सकते हैं। विवाह का पंजीकरण विवाह-पंजीयक या उप-पंजीयक कार्यालय में किसी भी कार्यदिवस पर हो सकता है, और धार्मिक विवाह चुने हुए मुहूर्त पर।
विदेश में रहने वाले परिवार वहाँ के विवाह-लाइसेंस के नियम देख लें और भवन से पूछ लें कि अग्नि की अनुमति है या नहीं। न हो, तो पुरोहित छोटे पात्र में अग्नि, कपूर या दीप से विधि कर सकते हैं।
यह सामान्य जानकारी है। व्यक्तिगत मुहूर्त योग्य ज्योतिषी परिवार की कुण्डलियों से बनाते हैं।