अक्षय तृतीया

Akshaya Tritiya

वैशाख शुक्ल तृतीया का अक्षय तृतीया पर्व दान, नए आरंभ, विष्णु और लक्ष्मी की पूजा तथा पितरों के स्मरण का अक्षय पुण्य देने वाला दिन है।

देवता: विष्णु, लक्ष्मी, परशुरामअवधि: एक दिनऋतु: वसंत का अंत, ग्रीष्म का आरंभअन्य नाम: आखा तीज, अक्ती, परशुराम जयंती

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तारीख़पर्व या अवसर
रविवार, 19 अप्रैल 2026अक्षय तृतीया
शनिवार, 8 मई 2027अक्षय तृतीया
गुरुवार, 27 अप्रैल 2028अक्षय तृतीया

परिचय

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को आती है, यानी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष का तीसरा दिन। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पंचांगों में इसका मास एक ही रहता है। "अक्षय" का अर्थ है जो कभी नष्ट न हो। परंपरा मानती है कि इस दिन के अच्छे कर्मों का फल लंबे समय तक बना रहता है, जैसे दान, पूजा और कोई शुभ आरंभ।

इसे वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में गिना जाता है और स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता है, जिसमें कई कार्यों के लिए अलग मुहूर्त नहीं देखा जाता। फिर भी पूजा के लिए पूर्वाह्न, यानी दिन का पहला भाग श्रेष्ठ है, यदि उस समय तृतीया तिथि हो। अपने शहर के लिए इसका समय पंचांग में देख लें।

महत्व और कथाएँ

अनेक परंपराओं में इसे विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की जयंती माना जाता है। इसे त्रेता युग का आरंभ भी कहा जाता है, और कुछ मान्यताओं में गंगा के पृथ्वी पर आने से भी जोड़ा गया है।

महाभारत में कथा है कि सूर्य देव ने युधिष्ठिर को अक्षय पात्र दिया, जिसमें द्रौपदी के भोजन करने तक भोजन समाप्त नहीं होता था। लोक परंपरा इसे इसी दिन से जोड़ती है। एक और प्रिय कथा सुदामा की है, जो श्रीकृष्ण को मुट्ठी भर चिवड़ा भेंट करने गए और बदले में समृद्धि पाई। यह धन की नहीं, विनम्रता और मित्रता की कथा है।

जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने लंबे उपवास के बाद इसी दिन राजा श्रेयांस से गन्ने का रस ग्रहण करके पारण किया था। इसलिए जैन श्रद्धालु वर्षीतप (लगभग एक वर्ष तक एक दिन छोड़कर किया जाने वाला उपवास) का पारण इसी दिन गन्ने के रस से करते हैं। इसी दिन हिमालय में गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलते हैं और चार धाम यात्रा आरंभ होती है।

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान करें और स्वच्छ, हो सके तो हल्के रंग के वस्त्र पहनें। इस दिन कोई अच्छा कार्य करने का संकल्प लें।
  2. विष्णु और लक्ष्मी का चित्र, या अपने कुल देवता का चित्र रखें। दीप और धूप जलाएँ।
  3. तुलसी दल, पीले या सफ़ेद फूल, चंदन, अक्षत और फल चढ़ाएँ। जौ, तिल और गुड़ का अर्पण भी परंपरागत है।
  4. विष्णु सहस्रनाम, लक्ष्मी स्तोत्र या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का पाठ करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  5. परिवार की रीति हो तो पितरों को जल और तिल से तर्पण करें।
  6. गर्मी के अनुसार दान करें: जल, अन्न, जौ, सत्तू, फल, वस्त्र, मिट्टी का घड़ा, पंखा या छाता।
  7. आरती करें और प्रसाद बाँटें। कुछ लोग इस दिन कोई नया कार्य छोटे रूप में शुरू करते हैं।

पूजन सामग्री

  • विष्णु और लक्ष्मी का चित्र या मूर्ति
  • तुलसी दल, पीले या सफ़ेद फूल, चंदन
  • अक्षत, जौ, तिल, गुड़
  • फल, मिठाई, सत्तू, ककड़ी और आम (जहाँ मिले)
  • दान के लिए जल से भरा मिट्टी का घड़ा, पंखा या छाता
  • दीप, घी, धूप, कपूर

व्रत और भोजन

इस दिन उपवास आवश्यक नहीं है। बहुत से परिवार पूजा तक हल्का उपवास रखते हैं और फिर जौ, फल, सत्तू का शरबत या गुड़ का पानी जैसा ठंडक देने वाला सादा भोजन करते हैं। जैन समाज में गन्ने के रस से पारण किया जाता है।

उपवास रखना हो तो बीमार लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग अपने चिकित्सक की सलाह से ही रखें।

क्या करें

  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार खुले मन से दान दें।
  • गर्मी में किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें।
  • पितरों को जल अर्पित करके सरलता से याद करें।
  • कोई सार्थक आरंभ करें, जैसे पढ़ाई, कोई अच्छी आदत, बचत की योजना या व्यवसाय का कोई क़दम।
  • सोना या कोई मूल्यवान वस्तु ख़रीदना चाहें तो अपने बजट के भीतर ही ख़रीदें।

क्या न करें

  • यह न मानें कि सोना ख़रीदना ज़रूरी है। इस दिन का मुख्य पुण्य दान और अच्छे आचरण में है।
  • दिन के नाम पर क़र्ज़ न लें और सामर्थ्य से अधिक ख़रीदारी न करें।
  • इस दिन को धन की गारंटी न समझें। प्रार्थना के साथ परिश्रम भी चाहिए।
  • झगड़ा, छल या किसी को कष्ट देने से बचें, क्योंकि कर्मों का फल लंबे समय तक रहने की मान्यता है।
  • यदि अभी दे सकते हैं तो दान को अगले दिन पर न टालें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • उत्तर भारत: जौ, सत्तू और जल के घड़े का दान और गंगा-स्नान। वृन्दावन में बाँके बिहारी जी के चरण-दर्शन इसी दिन होते हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलते हैं; केदारनाथ और बद्रीनाथ बाद में खुलते हैं।
  • राजस्थान और गुजरात (आखा तीज): किसान आने वाले मानसून के संकेत देखते हैं। इस दिन विवाह भी बहुत होते हैं।
  • महाराष्ट्र: कई घरों में कुल देवता की पूजा और पितरों के लिए अर्पण होता है।
  • दक्षिण भारत: सोने-आभूषण की ख़रीद प्रचलित है और अनेक घरों में लक्ष्मी पूजा होती है।
  • ओडिशा: किसान बुवाई का शुभ आरंभ करते हैं और पुरी में रथ यात्रा के रथों का निर्माण शुरू होता है।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

इस दिन सोना ख़रीदने की प्रथा बहुत फैल गई है, पर यह ज़रूरी नहीं। सिक्का या छोटी-सी ख़रीद भी पर्याप्त है, और बहुत से परिवार उतनी ही राशि किसी अन्न-सेवा या ज़रूरतमंद की मदद में दे देते हैं। ख़रीदें तो भरोसेमंद दुकान से और रसीद सँभालकर।

पूजा घर पर सुबह कार्यालय जाने से पहले हो सकती है। फ़्लैट में रहने वाले लोग पानी का घड़ा या पंखा किसी ज़रूरतमंद को दे सकते हैं। विदेश में रहने वाले परिवार वहाँ के मंदिरों और जैन संस्थाओं के आयोजनों से जुड़ सकते हैं, जो प्रायः निकट के सप्ताहांत में रखे जाते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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