गंगा दशहरा
Ganga Dussehra
माँ गंगा के धरती पर उतरने की स्मृति का पर्व, जो ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को स्नान, दीपदान और दान के साथ मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| बुधवार, 24 जून 2026 | गंगा दशहरा |
| रविवार, 13 जून 2027 | गंगा दशहरा |
| शुक्रवार, 2 जून 2028 | गंगा दशहरा |
परिचय
गंगा दशहरा माँ गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने की याद का पर्व है। यह ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को आता है, यानी ज्येष्ठ के उजले पक्ष की दसवीं तिथि को। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पंचांगों में इसका महीना एक ही रहता है। अपने शहर के लिए गणना की गई तिथि पंचांग में देख लें।
हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज, काशी और पटना के घाटों पर भोर से श्रद्धालु जुटते हैं। यह आश्विन के दशहरे से अलग पर्व है। परंपरा में "दशहरा" का अर्थ "दस पापों को हरने वाली" बताया गया है: तीन शरीर के, चार वाणी के और तीन मन के दोष।
महत्व और कथाएँ
सबसे प्रसिद्ध कथा राजा भगीरथ की है। राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे, और उनकी मुक्ति केवल स्वर्ग की गंगा के जल से हो सकती थी। भगीरथ ने कठोर तप करके गंगा को धरती पर आने के लिए मनाया। गंगा का वेग इतना प्रबल था कि पृथ्वी उसे सह नहीं पाती, इसलिए भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में थामकर धीरे से छोड़ा। रास्ते में जह्नु मुनि ने गंगा को पी लिया और प्रार्थना करने पर फिर प्रवाहित किया, इसीलिए वे जाह्नवी भी कहलाती हैं। फिर गंगा भगीरथ के पीछे चलकर उन भस्मों तक पहुँचीं।
इसी कारण गंगा भागीरथी कहलाती हैं और माँ मानी जाती हैं, जो पवित्र भी करती हैं और पालन भी। परंपरा में इस दिन को हस्त नक्षत्र और कुछ विशेष योगों से जोड़ा गया है। कुछ ग्रंथ स्नान के फल बताते हैं; इन्हें श्रद्धा की प्रेरणा समझें, किसी परिणाम की गारंटी नहीं। वैशाख शुक्ल सप्तमी की गंगा सप्तमी अलग तिथि है।
पूजा विधि
- सुबह जल्दी उठें। हो सके तो गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें और डुबकी से पहले नदी को प्रणाम करें।
- संकल्प करें कि आज माँ गंगा का पूजन और दान करेंगे।
- नदी में, या घर पर गंगा जी के चित्र के सामने, जल, फूल, अक्षत और दीप अर्पित करें। कई परंपराओं में हर वस्तु दस की संख्या में चढ़ाई जाती है: दस फूल, दस दीप, दस फल।
- गंगा स्तोत्र पढ़ें। घर पर स्नान के समय यह श्लोक बोला जाता है: "गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।" सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- जहाँ अनुमति हो और बहाव सुरक्षित हो, वहाँ पत्तों के दोने में दीप प्रवाहित करें। इसे दीपदान कहते हैं।
- अन्न, जल से भरा घड़ा, पंखा, सत्तू या फल का दान दें। परंपरा में दस वस्तुओं के दान की बात कही जाती है।
- प्रसाद परिवार और आने-जाने वालों में बाँटें।
पूजन सामग्री
- गंगाजल, सफ़ेद फूल, तुलसी दल, अक्षत, चंदन और रोली
- घी या तेल का दीप, मिट्टी के दीये और पत्तों के दोने
- मौसमी फल, मिठाई, सत्तू और गुड़ का शरबत
- माँ गंगा का चित्र या प्रतिमा
व्रत और भोजन
बहुत से लोग हल्का उपवास रखते हैं या केवल सात्त्विक भोजन करते हैं, यानी बिना प्याज़ और लहसुन का सादा शाकाहारी भोजन। ज्येष्ठ की गर्मी में सत्तू का घोल, गुड़ का शरबत, छाछ और मौसमी फल, जैसे आम, खाए-पिए जाते हैं। राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना इस दिन का पुराना दान है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास तभी रखें जब चिकित्सक अनुमति दें।
क्या करें
- नदियों और जल के प्रति आदर के भाव से स्नान करें।
- ज़रूरतमंद लोगों को जल, भोजन या फल दें।
- भगीरथ और गंगा अवतरण की कथा पढ़ें या सुनें।
- घर या मंदिर की सफ़ाई करके दीप जलाएँ।
- एक पेड़ लगाएँ या कचरा कम करने का संकल्प लें।
- केवल फूल और पत्तों के दोने जैसी जल्दी गल जाने वाली चीज़ें अर्पित करें।
क्या न करें
- नदी में प्लास्टिक, कपड़े या कभी न गलने वाली चीज़ें न डालें।
- पवित्र नदी में साबुन या शैंपू का प्रयोग न करें।
- घाटों और नदी के किनारे कचरा न फैलाएँ।
- भीड़ वाले घाट पर धक्का-मुक्की न करें, और बच्चों को गहरे पानी में अकेले न उतरने दें।
- दिन की शुरुआत क्रोध या कठोर बोली से न करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
हरिद्वार की हर की पौड़ी और ऋषिकेश में सुबह स्नान और शाम को आरती होती है। काशी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान, दीपदान और भव्य गंगा आरती होती है, और प्रयागराज के संगम पर भी भीड़ रहती है। पटना के घाटों पर शाम की आरती होती है। बंगाल में हुगली को गंगा का ही रूप मानकर पूजा की जाती है। जहाँ गंगा दूर हैं, वहाँ लोग यमुना, नर्मदा या क्षिप्रा जैसी पास की नदी में स्नान करके गंगा का स्मरण करते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
अधिकतर परिवार गंगा किनारे नहीं रहते, पर घर में रखी गंगाजल की छोटी शीशी काफ़ी है। नहाने के पानी में कुछ बूँदें डालकर पूजा विधि में दिया गया श्लोक पढ़ें, और घर के मंदिर में गंगा जी के चित्र के सामने दीप जलाकर कथा पढ़ें। व्यस्त दिन में पाँच मिनट की प्रार्थना और किसी को पानी पिलाना भी पर्व का सच्चा रूप है।
विदेश में रहने वाले परिवार किसी नदी या झील में फूल, दोने या दीप न बहाएँ, क्योंकि वहाँ के नियम अलग होते हैं। एक बर्तन में जल लेकर पूजा करें और बाद में वह जल किसी पौधे में डाल दें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।