विजयादशमी (दशहरा)
Dussehra (Vijayadashami)
आश्विन शुक्ल दशमी का पर्व, जो राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 | विजयादशमी (दशहरा) |
| शनिवार, 9 अक्टूबर 2027 | विजयादशमी (दशहरा) |
| बुधवार, 27 सितंबर 2028 | विजयादशमी (दशहरा) |
परिचय
दशहरा, या विजयादशमी ("विजय की दशमी"), आश्विन शुक्ल दशमी को आता है, यानी नवरात्रि की नौ रातें पूरी होने के अगले दिन। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में इसका महीना आश्विन ही है। यह हिंदू समाज के सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले पर्वों में है, और नया कार्य शुरू करने के लिए शुभ माना जाता है।
महत्व और कथाएँ
इस दिन से कई कथाएँ जुड़ी हैं। रामायण परंपरा में यह श्रीराम की दस सिरों वाले रावण पर विजय का पर्व है, जिसने सीता का हरण किया था; यह विजय सिखाती है कि धर्म अहंकार और अन्याय पर भारी पड़ता है। शाक्त परंपरा में यह वह दिन है जब देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ अपना युद्ध पूरा किया, और बंगाल में यह देवी की विदाई का भी दिन है।
महाभारत एक तीसरी कथा जोड़ता है: अज्ञातवास के बाद पांडवों ने अपने शस्त्र शमी के वृक्ष से वापस लिए। इसीलिए अनेक क्षेत्रों में इस दिन शमी की पूजा होती है।
महाराष्ट्र की लोक परंपरा में विजयादशमी साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक गिनी जाती है; शेष हैं गुड़ी पड़वा, अक्षय तृतीया और आधे मुहूर्त के रूप में बलि प्रतिपदा। बहुत से लोग अलग मुहूर्त देखे बिना इस दिन नया काम शुरू करते हैं। इस पर परंपराएँ अलग हैं; बड़े कार्य के लिए पुरोहित से सलाह लें।
पूजा विधि
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा का स्थान सजाएँ।
- शस्त्र पूजा या आयुध पूजा करें: औज़ार, पुस्तकें, वाद्य या वाहन को स्वच्छ वस्त्र पर रखकर फूल और रोली चढ़ाएँ।
- परिवार की मान्यता के अनुसार देवी दुर्गा या श्रीराम की पूजा फूल, दीप और नैवेद्य से करें।
- अपराह्न काल में देवी अपराजिता (अजेय) की पूजा करें। मंत्रों के सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- शमी पूजन करें: शमी वृक्ष को जल और फूल अर्पित करें, वृक्ष न मिले तो उसकी पत्तियों को। पत्तियों को सोने और सद्भाव के प्रतीक के रूप में आपस में बाँटें।
- कुछ परिवारों में इस दिन बच्चों का विद्यारंभ, यानी अक्षराभ्यास, कराया जाता है। माता-पिता या गुरु बच्चे से चावल या रेत पर पहले अक्षर लिखवाते हैं।
- शाम को रामलीला देखें या रावण दहन में भाग लें, जिसमें रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं, और बड़ों से मिलकर शुभकामनाएँ दें।
पूजन सामग्री
- रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, धूप और दीप
- शमी की पत्तियाँ और, मिले तो, अपराजिता के फूल
- पूजा के लिए रखे औज़ार, पुस्तकें या शस्त्र
- मिठाई, फल और पान
व्रत और भोजन
दशहरा सामान्यतः उपवास का दिन नहीं है। जिन परिवारों ने नवरात्रि के व्रत रखे, वे दशमी को उत्सव के सात्विक भोजन से व्रत पूरा करते हैं। उत्तर भारत में जलेबी का चलन है, गुजरात में जलेबी-फाफड़ा प्रसिद्ध है, और अन्य क्षेत्रों में पूरन पोली या खीर बनती है। नवरात्रि का उपवास रखने वालों में बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।
क्या करें
- अपने शहर के लिए बताए अपराजिता पूजा के समय में पूजा करें।
- अपने काम के औज़ारों की सफाई करके कृतज्ञता से उनकी पूजा करें।
- मिठाई और शमी की पत्तियाँ परिवार और मित्रों में बाँटें, और इस दिन कोई नई पढ़ाई या कला शुरू करें।
- रावण दहन सुरक्षित दूरी से देखें।
- जो लोग रावण को विद्वान और शिवभक्त मानते हैं, उनकी आस्था का सम्मान करें।
क्या न करें
- बिना अनुमति के घर के भीतर या निजी भूमि पर पटाखे न चलाएँ और पुतला न जलाएँ।
- जलते पुतलों के पास न खड़े हों; ढाँचे गिर सकते हैं।
- बच्चों को देखरेख के बिना आग या पटाखों के पास न जाने दें।
- रावण के चित्रण के बहाने किसी का अपमान न करें।
- किसी सार्वजनिक उद्यान या पड़ोसी के बगीचे के शमी वृक्ष की टहनियाँ बिना अनुमति के न तोड़ें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर भारत में रामलीला का समापन रावण दहन से होता है। काशी के रामनगर की रामलीला लगभग एक महीने चलती है, और विजयादशमी के अगले दिन नाटी इमली में भरत मिलाप होता है, जिसे देखने काशी नरेश भी पहुँचते हैं। कानपुर के शिवाला में दशानन मंदिर के कपाट वर्ष में केवल विजयादशमी को खुलते हैं, जहाँ रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में पूजा जाता है। कर्नाटक का मैसूरु दशहरा भव्य राजसी उत्सव है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में लोग आपटा या शमी की पत्तियाँ "सोने" के रूप में बाँटते हैं, और राजस्थान तथा गुजरात में शमी, यानी खेजड़ी, की पूजा होती है। दक्षिण भारत में आयुध पूजा और सरस्वती पूजा विजयादशमी से ठीक पहले होती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
दशहरा अक्सर कार्यदिवस पर पड़ता है। सुबह अपने कंप्यूटर या औज़ारों के पास फूल और दीप रखकर की गई छोटी पूजा इसे मनाने का सुंदर तरीका है। रामलीला और रावण दहन के लिए अपने मोहल्ले या नगर की समिति के आयोजन में जाएँ; पुतला जलाने के लिए प्रशासन की अनुमति ज़रूरी है। विद्यारंभ कई मंदिरों में कराया जाता है। विदेश में बसे परिवार स्थानीय संघ के आयोजन में शामिल हों और अपने शहर के अपराजिता पूजा का समय पंचांग में देखें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।