शारदीय नवरात्रि
Sharad Navratri
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक माँ दुर्गा की नौ रात्रियों की उपासना, जिसमें उपवास, पाठ, कन्या पूजन, गरबा और डांडिया होते हैं।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
| गुरुवार, 30 सितंबर 2027 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
| मंगलवार, 19 सितंबर 2028 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
परिचय
शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में देवी का महान पर्व है। नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलती है, और दशमी को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाता है।
वर्ष की चार नवरात्रियों में चैत्र और आश्विन की सबसे अधिक मनाई जाती हैं; आषाढ़ और माघ की गुप्त नवरात्रियाँ हैं। आश्विन का शुक्ल पक्ष पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में एक ही है, इसलिए पूरा देश यह पर्व साथ मनाता है।
महत्व और कथाएँ
नवरात्रि शक्ति की उपासना है, जो संसार का सृजन, पालन और नवीनीकरण करती है। अनेक परंपराओं में ये रातें महिषासुर पर देवी की विजय की याद दिलाती हैं। कथा है कि देवताओं के तेज से माँ प्रकट हुईं और उन्होंने महिषासुर का वध किया। यह कथा दुर्गा सप्तशती में मिलती है।
नौ दिन नवदुर्गा के नौ रूपों को समर्पित हैं:
- पहला दिन: शैलपुत्री, हिमालय की पुत्री।
- दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी, तप में लीन देवी।
- तीसरा दिन: चन्द्रघण्टा, मस्तक पर अर्धचन्द्र वाली।
- चौथा दिन: कूष्माण्डा, ब्रह्माण्ड की रचयिता।
- पाँचवाँ दिन: स्कन्दमाता, कार्तिकेय की माता।
- छठा दिन: कात्यायनी, योद्धा रूप।
- सातवाँ दिन: कालरात्रि, भय और अंधकार का नाश करने वाली।
- आठवाँ दिन: महागौरी, उज्ज्वल और शांत।
- नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री, सिद्धि देने वाली।
किसी वर्ष कोई तिथि घट या बढ़ जाती है, तब दिन और रूप का क्रम बदल सकता है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
पूजा विधि
- पहले दिन से पहले घर और पूजा स्थान साफ़ करें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- प्रतिपदा को घटस्थापना (कलश स्थापना) करें: स्वच्छ मिट्टी में जौ बोएँ और उस पर जल से भरा कलश रखें, जिस पर आम के पत्ते और नारियल हों। श्रेष्ठ समय प्रतिपदा में दिन का पहला भाग है; न मिले तो अभिजित मुहूर्त। इस पंचांग में आपके शहर का मुहूर्त दिया गया है।
- कलश के पास अखंड दीप या नित्य दीप जलाएँ। रोज़ देवी को फूल, धूप और सादा नैवेद्य अर्पित करें, और उस दिन के रूप का स्मरण करें।
- दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या कोई देवी स्तोत्र पढ़ें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- बोए हुए जौ में रोज़ जल दें। उगते हरे अंकुर माँ की कृपा का शुभ संकेत माने जाते हैं।
- अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन करें: नौ कन्याओं को बुलाकर उनके पाँव धोएँ, भोजन कराएँ और उपहार दें। कई घरों में एक छोटे बालक को भी बैठाते हैं।
- आरती करके प्रसाद बाँटें। समापन नवमी के अंत में या दशमी को परिवार की रीति से होता है।
पूजन सामग्री
- पीतल या ताँबे का कलश, स्वच्छ मिट्टी, जौ या गेहूँ।
- आम के पत्ते, नारियल, लाल कपड़ा, रोली, हल्दी और अक्षत।
- देवी की मूर्ति या चित्र, लाल गुड़हल के फूल, धूप और कपूर।
- दीप के लिए घी या तेल, रुई की बत्तियाँ।
- फल, मिठाई, और कन्या पूजन के लिए पूड़ी, चने और हलवा।
व्रत और भोजन
कुछ लोग नौ दिन उपवास रखते हैं, कुछ पहले और अंतिम दिन, और कई केवल अष्टमी को। भोजन सात्त्विक रहता है: प्याज, लहसुन, अन्न और मांसाहार नहीं। उपवास में चलने वाली चीज़ें हैं सेंधा नमक, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, समा के चावल, राजगिरा, आलू, शकरकंद, फल, दूध, दही और मेवे।
बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें और हल्का उपवास चुनें, जैसे एक समय भोजन या फल-दूध।
क्या करें
- अपने शहर के सही मुहूर्त में घटस्थापना करें।
- नौ दिन घर और पूजा स्थान स्वच्छ रखें।
- सात्त्विक भोजन करें और पर्याप्त पानी पिएँ।
- अखंड दीप का संकल्प हो तो घी या तेल कम न पड़ने दें।
- कन्याओं का सच्चे आदर से स्वागत करें, औपचारिकता के लिए नहीं।
- थकान हो तो विश्राम करें; श्रद्धा से किया छोटा अनुष्ठान भी पर्याप्त है।
क्या न करें
- परिवार में नियम हो तो उपवास में प्याज, लहसुन और साधारण नमक न लें।
- कलश को जल के बिना या जलते दीप को अकेला न छोड़ें।
- परिवार की रीति हो तो इन दिनों बाल और नाखून न कटवाएँ।
- चिकित्सक की सलाह के विरुद्ध कठोर उपवास न करें।
- झगड़े और कटु वाणी से बचें।
- कन्या पूजन को फ़ोटो का अवसर न बनाएँ और बच्ची को असुविधा होने तक न बैठाएँ।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में घटस्थापना, जवारे और कन्या भोज के साथ रामलीला की परंपरा चलती है, जो दशहरे पर रावण दहन तक पहुँचती है। काशी में कई भक्त नौ दिन क्रम से नवदुर्गा के नौ मंदिरों में दर्शन की परिपाटी निभाते हैं; दुर्गा कुण्ड का मंदिर विशेष प्रसिद्ध है। मिर्ज़ापुर के विंध्याचल में विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। गुजरात में यह गरबा और डांडिया रास का मौसम है। बंगाल, ओडिशा और असम में नवरात्रि दुर्गा पूजा से मिल जाती है, जो मुख्यतः षष्ठी से मनती है। दक्षिण में गुड़ियों की झाँकी (गोलू) सजती है और अंत में सरस्वती पूजा तथा आयुध पूजा होती है।
आज के समय में
अधिकतर परिवार नौ दिन काम के साथ ही पर्व निभाते हैं। सुबह जाने से पहले छोटी पूजा और शाम की आरती भी पूर्ण पूजा मानी जाती है। कामकाजी दिनों में साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की रोटी टिफ़िन में रखना आसान है। फ़्लैट में दीप को स्थिर थाली पर पर्दों से दूर रखें। विदेश में रहने वाले परिवार सेंधा नमक और कुट्टू-सिंघाड़े का आटा भारतीय दुकानों या ऑनलाइन से मँगा सकते हैं। गरबा आयोजन प्रायः सप्ताहांत में होते हैं, और कन्या पूजन पड़ोस के बच्चों के साथ उनके माता-पिता की सहमति से किया जा सकता है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।