दुर्गा पूजा
Durga Puja
बंगाल का देवी दुर्गा का महापर्व, जो महालया से शुरू होकर षष्ठी से दशमी तक सामुदायिक पूजा, कला, भोज और विसर्जन के साथ मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
| सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 | दुर्गा अष्टमी |
| मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 | महानवमी |
| मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 | विजयादशमी (दशहरा) |
| गुरुवार, 30 सितंबर 2027 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
| गुरुवार, 7 अक्टूबर 2027 | दुर्गा अष्टमी |
| शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2027 | महानवमी |
| शनिवार, 9 अक्टूबर 2027 | विजयादशमी (दशहरा) |
| मंगलवार, 19 सितंबर 2028 | शारदीय नवरात्रि प्रारंभ |
| मंगलवार, 26 सितंबर 2028 | दुर्गा अष्टमी |
| मंगलवार, 26 सितंबर 2028 | महानवमी |
| बुधवार, 27 सितंबर 2028 | विजयादशमी (दशहरा) |
परिचय
दुर्गा पूजा बंगाल और दुनिया भर के बंगाली समाज का सबसे बड़ा पर्व है। यह आश्विन शुक्ल पक्ष में, शारदीय नवरात्रि के समय ही मनाई जाती है, पर इसका केंद्र अंतिम पाँच दिन हैं: षष्ठी से दशमी। शुक्ल पक्ष की तिथियाँ होने से इनके लिए पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में महीना आश्विन ही रहता है।
यह उत्सव पूजा भी है और सामाजिक मिलन भी। परिवार घर लौटते हैं, और सजे हुए पंडालों (अस्थायी मंदिरों) में देवी अपनी संतानों के साथ विराजती हैं। कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में स्थान दिया है।
महत्व और कथाएँ
देवी दुर्गा को महिषासुर का वध करके धर्म की स्थापना करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है। बंगाली परंपरा में वे मायके आई बेटी भी हैं: शिव के हिमालय के धाम से चार दिन के लिए अपने बच्चों लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ आती हैं।
उत्सव का आरंभ महालया से होता है, जो शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा से पहले की अमावस्या है; यह पूर्णिमान्त गणना में आश्विन कृष्ण अमावस्या और अमान्त गणना में भाद्रपद अमावस्या कहलाती है। इस दिन बंगाली परिवार पितरों को तर्पण देते हैं, और भोर में देवी के आवाहन का पाठ सुना जाता है। परंपरा के अनुसार इसी समय प्रतिमा की आँखें बनाई जाती हैं, जिसे चक्षुदान कहते हैं।
बंगाल की कृत्तिवासी रामायण के अनुसार श्रीराम ने रावण से युद्ध से पहले शरद ऋतु में, जो देवी की पूजा का परंपरागत समय नहीं था, देवी की आराधना की; इसे अकाल बोधन कहते हैं।
पूजा विधि
- महालया: पितरों को तर्पण दें और चंडी पाठ, यानी देवी के स्तोत्र, सुनें या पढ़ें।
- षष्ठी: बोधन, यानी देवी को जगाने की विधि; फिर आमंत्रण और अधिवास। देवी का मुख अनावृत होता है।
- सप्तमी: नदी या तालाब में स्नान कराने के बाद नवपत्रिका की पूजा होती है। यह नौ पौधों का समूह है, जिसे देवी के रूप में वस्त्र पहनाए जाते हैं।
- अष्टमी: सुबह अंजलि, यानी पुष्पांजलि, दी जाती है, अक्सर पूरा समाज साथ मिलकर। अष्टमी और नवमी की संधि पर संधि पूजा सबसे गंभीर क्षण मानी जाती है। कुछ स्थानों पर कुमारी पूजा भी होती है।
- नवमी: अंतिम पूजा, महा आरती और, जहाँ परंपरा है, नवमी हवन।
- दशमी: विदाई का दिन। विवाहित स्त्रियाँ देवी को मिठाई और सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे सिंदूर खेला कहते हैं। फिर शोभायात्रा के साथ प्रतिमा का विसर्जन होता है।
- विसर्जन के बाद परिवार और मित्र गले मिलते हैं, जिसे बिजया कहते हैं, और बड़ों को आदर से प्रणाम किया जाता है।
पूजन सामग्री
- संतानों सहित देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र
- लाल गुड़हल, गेंदे के फूल, बेलपत्र और दूर्वा
- धुनुची (मिट्टी का धूपदान), धूप, कपूर और घी के दीप
- लाल किनारी की सफ़ेद साड़ी, अलता और सिंदूर
- फल, मिठाई, भोग (खिचड़ी, मिश्रित सब्ज़ी, पायेश यानी खीर) और पान
व्रत और भोजन
बहुत से लोग अष्टमी की अंजलि तक उपवास रखते हैं और उसके बाद सामूहिक भोग ग्रहण करते हैं। यह सादा शाकाहारी भोजन होता है: खिचड़ी, मिली-जुली सब्ज़ी, चटनी और पायेश। कुछ बंगाली परिवार उत्सव के कुछ दिनों में मछली या मांस खाते हैं, जबकि दूसरे समुदाय पूरी तरह शाकाहारी रहते हैं; अपने परिवार की रीति मानें। उपवास रखना हो तो बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।
क्या करें
- हो सके तो अष्टमी की सुबह स्वच्छ वस्त्र पहनकर अंजलि में शामिल हों।
- पारंपरिक वस्त्र (साड़ी या धोती-कुर्ता) पहनें, भोग ग्रहण करें और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें।
- धुनुची को सावधानी से पकड़ें; नारियल के छिलके और कपूर बहुत गरम जलते हैं।
- दशमी को विवाहित स्त्रियों को आदर से सिंदूर अर्पित करें।
- समिति की सहायता करें, और दशमी के बाद बड़ों से "शुभो बिजया" कहकर आशीर्वाद लें।
क्या न करें
- जलती धुनुची को बच्चों या सिंथेटिक कपड़ों के पास न घुमाएँ।
- संधि पूजा या अंजलि के समय फोटो न खींचें, यदि इससे पूजा में बाधा पड़े।
- पुजारी के बताए बिना प्रतिमा या सामग्री को न छुएँ।
- पंडाल में कचरा या जूठन न फैलाएँ।
- विसर्जन में ऐसी सामग्री न डालें जो पानी में घुलती नहीं, ख़ासकर जहाँ नियम इसे मना करते हों।
क्षेत्रीय परंपराएँ
संध्या आरती का एक प्रसिद्ध भाग धुनुची नाच है, जिसमें लोग जलते धूपदान लेकर नाचते हैं। ओडिशा, असम, बिहार और त्रिपुरा में पूजा के अपने रूप हैं। बंगाली समाज की पुरानी बस्तियों में, जैसे काशी के बंगाली टोला में, और बिहार तथा झारखंड के कई शहरों में भी दुर्गा पूजा के बड़े पंडाल सजते हैं। बंगाल में बारोयारी ("बारह मित्रों" की) सामुदायिक पूजा अठारहवीं सदी के अंत में शुरू हुई; पहले यह मुख्यतः धनी परिवारों के घरों में होती थी। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
यदि षष्ठी से दशमी कार्यदिवसों पर पड़ें, तो अधिकतर लोग निकट के पंडाल में शाम या सप्ताहांत में जाते हैं। नदी न हो तो छोटी प्रतिमा का विसर्जन घर में बड़े पात्र में किया जा सकता है; कई जगह दर्पण में प्रतिबिंब का प्रतीकात्मक विसर्जन भी होता है। किराए के सभागारों में खुली लौ की अनुमति लेनी पड़ती है, इसलिए बिजली के दीप उपयोगी हैं। विदेश में बसे बंगाली परिवार अपने स्थानीय संघ से कार्यक्रम की जानकारी लें और भोग के लिए पहले से पंजीकरण करा लें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।