बैसाखी (वैसाखी)
Baisakhi (Vaisakhi)
बैसाखी पंजाब का वसंत और फसल का पर्व है तथा सिखों के लिए खालसा पंथ की स्थापना का दिन, जो कीर्तन, नगर कीर्तन और लंगर के साथ मनता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | मेष संक्रांति |
| बुधवार, 14 अप्रैल 2027 | मेष संक्रांति |
| गुरुवार, 13 अप्रैल 2028 | मेष संक्रांति |
परिचय
बैसाखी पंजाब और दुनिया भर के पंजाबी समुदायों के लिए वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में है। यह सौर मास वैशाख के पहले दिन, यानी मेष संक्रांति पर आती है, जब पंजाब में गेहूँ पकता है और देश के कई भागों में सौर नववर्ष मनता है।
सिखों के लिए इस दिन का गहरा अर्थ है: इसी दिन आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। हिंदू और सभी धर्मों के पंजाबी परिवार फसल और वसंत के उल्लास में साथ होते हैं। सिख उपासना में हिंदू अर्थ वाली पूजा नहीं होती; नीचे के शीर्षक इस साइट के सामान्य ढाँचे के अनुसार हैं, और पाठ सिख परिवारों की रीति बताता है।
महत्व और कथाएँ
सर्दी के अंत में गेहूँ पकता है, इसलिए बैसाखी किसान के धन्यवाद और उल्लास का समय है।
सिख इतिहास के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में सभा बुलाकर प्राण देने को तैयार लोगों को पुकारा। एक-एक करके पाँच व्यक्ति आगे आए। वे पंज प्यारे बने और खालसा में दीक्षित हुए। उन्हें अलग-अलग पृष्ठभूमियों का बताया जाता है, जिसे इस शिक्षा के रूप में लिया जाता है कि खालसा में सब समान हैं। फिर गुरु जी ने स्वयं उनसे दीक्षा ली।
नानकशाही पंचांग में बैसाखी दूसरे मास के पहले दिन पड़ती है, जबकि वर्ष चेत से शुरू होता है। तारीख़ पर मतभेद हो तो अपने गुरुद्वारे की बात मानें।
पूजा विधि
- प्रातः घर या गुरुद्वारे में नितनेम, यानी नित्य की बाणियों, का पाठ करें।
- गुरुद्वारे में सिर ढकें, जूते उतारें, हाथ धोएँ और भूमि पर बैठें। श्री गुरु ग्रंथ साहिब को माथा टेकें, कीर्तन और हुक्मनामा (उस दिन का आदेश) सुनें।
- दोनों हाथों की ओक बनाकर कड़ाह प्रसाद लें और श्रद्धा से खाएँ, फिर सबके साथ बैठकर लंगर, यानी निःशुल्क शाकाहारी सामुदायिक भोजन, करें।
- पंज प्यारों की अगुवाई वाले नगर कीर्तन में शामिल हों या दर्शन करें।
- कुछ गुरुद्वारे इस दिन खालसा में दीक्षा (अमृत संचार) का समारोह करते हैं, उनके लिए जिन्होंने यह मार्ग चुना है।
- शाम को परिवार के साथ उत्सव का भोजन करें और रिश्तेदारों से मिलें।
पंजाबी हिंदू परिवारों में प्रायः प्रातः स्नान, मंदिर-दर्शन और उत्सव का भोजन होता है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।
पूजन सामग्री
सिख उपासना में कर्मकांड की सामग्री नहीं लगती। गुरुद्वारे जाते समय साथ रखें:
- सिर ढकने का वस्त्र (द्वार पर प्रायः रूमाल मिल जाते हैं)
- स्वच्छ, शालीन कपड़े और मोज़े, क्योंकि जूते उतारने पड़ते हैं
- चाहें तो लंगर के लिए दान
व्रत और भोजन
बैसाखी उपवास का नहीं, भोज और बाँटने का दिन है। लंगर सादा, गर्म शाकाहारी भोजन होता है: प्रायः दाल, सब्ज़ी, रोटी और खीर। घर पर पंजाबी परिवार छोले, परांठे, लस्सी और मीठे चावल बनाते हैं।
बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग भोजन और विश्राम के बारे में चिकित्सक की सलाह मानें, क्योंकि पर्व का दिन लंबा होता है।
क्या करें
- गुरुद्वारे या मंदिर जाएँ और परिवार-मित्रों को साथ ले जाएँ।
- जहाँ रीति हो, वहाँ सिर ढकें और जूते उतारें।
- लंगर में सबके साथ बैठें और उतना ही लें जितना खा सकें।
- लंगर में सेवा या दान करें और ज़रूरतमंदों की मदद करें।
- बच्चों को पंज प्यारों की कथा सुनाएँ।
क्या न करें
- गुरुद्वारे में तंबाकू या शराब न ले जाएँ।
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब की ओर पैर या पीठ न करें।
- लंगर का भोजन व्यर्थ न करें।
- दिन को केवल आमोद-प्रमोद न समझें; सिखों के लिए इसमें पवित्र अर्थ है।
- इस पर बहस न करें कि बैसाखी हिंदू पर्व है या सिख पर्व। यह पंजाबियों की फसल का दिन भी है और सिखों का पवित्र दिन भी।
क्षेत्रीय परंपराएँ
पंजाब के गाँवों में भांगड़ा, गिद्धा, कुश्ती और खाने की दुकानों वाले मेले लगते हैं। सबसे बड़ा उत्सव आनंदपुर साहिब में है, और तलवंडी साबो (दमदमा साहिब) में भी भीड़ रहती है।
लगभग यही दिन अन्यत्र नववर्ष है: पुथांडु, विशु, बोहाग बिहू, पोइला बोइशाख, महाविषुव संक्रांति और नेपाल में बैशाख 1। बिहार में इसी समय सतुआन मनाया जाता है।
आज के समय में
बैसाखी काम के दिन पड़े तो शाम को गुरुद्वारे जाएँ और सप्ताहांत पर नगर कीर्तन में शामिल हों। बड़े नगरों में, और विदेश में बसे परिवारों के पास के गुरुद्वारों में, इन दिनों कार्यक्रम और नगर कीर्तन होते हैं। भीड़ बड़ी होती है, इसलिए तारीख़ और व्यवस्था पहले पूछ लें। घर पर उत्सव का भोजन बनाएँ और बच्चों को खालसा की कथा सुनाएँ। लंगर सबके लिए खुला है, इसलिए किसी भी पृष्ठभूमि के मित्र मर्यादा निभाते हुए आ सकते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।