विशु

Vishu

विशु केरल का वसंत-पर्व है, जो सूर्य के मेष में प्रवेश पर विशुक्कणि के शुभ प्रथम दर्शन, उपहारों और भोज के साथ मनता है।

देवता: विष्णु और कृष्णअवधि: एक दिनऋतु: वसंत, सूर्य के मेष राशि में प्रवेश का समयअन्य नाम: मलयालम नववर्ष, विशुक्कणि

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तारीख़पर्व या अवसर
मंगलवार, 14 अप्रैल 2026मेष संक्रांति
बुधवार, 14 अप्रैल 2027मेष संक्रांति
गुरुवार, 13 अप्रैल 2028मेष संक्रांति

परिचय

विशु केरल का पर्व है, जो मलयालम मास मेडम के पहले दिन मनाया जाता है। यह सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के दिन, यानी मेष संक्रांति पर पड़ता है। "विशु" शब्द को सामान्यतः संस्कृत के "विषुव" (बराबर) से जोड़ा जाता है, यानी वह समय जब दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। पर यह नाम बहुत पुराना है। आज की खगोलीय विषुव-तिथि विशु से लगभग तीन-चार सप्ताह पहले पड़ती है, इसलिए नाम को आज के विषुव से जोड़कर न देखें।

विशु को प्रायः मलयालम नववर्ष कहा जाता है। केरल सरकार चिंगम के पहले दिन को वर्ष का आरंभ मानती है, पर अनेक परिवार विशु को भावना से नववर्ष मानते हैं, और कुछ विवरणों के अनुसार चिंगम 1 अपनाए जाने से पहले विशु ही नववर्ष था। इतिहास पर स्रोत भिन्न हैं। केरल में दोनों दिन मनाए जाते हैं।

महत्व और कथाएँ

विशु शुरुआत का पर्व है। व्यापक मान्यता है कि विशु की सुबह जो पहले दिखे, वह वर्ष का स्वर तय करता है। यही "कणि" का भाव है, जिसका अर्थ है "जो पहले देखा जाए"। विशुक्कणि वह सजावट है जिसे सुबह सबसे पहले देखा जाता है।

एक परंपरा विशु को भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जोड़ती है, पर पर्व किसी एक कथा से बँधा नहीं है। अधिकतर परिवार इसे आशा, समृद्धि और कृतज्ञता का दिन मानते हैं। यह खेती के वर्ष से भी जुड़ा है: वसंत की फसल समेटी जा चुकी होती है और वर्षा के लिए बुवाई की तैयारी शुरू होती है। इसी समय कोन्ना वृक्ष (अमलतास) के सुनहरे फूल खिलते हैं, इसीलिए वे पर्व का हिस्सा हैं।

पूजा विधि

  1. पिछली शाम: पूजा-कक्ष या किसी शांत स्थान में विशुक्कणि सजाएँ। काँसे का पात्र (उरुळि) कच्चे चावल से भरकर उसमें नीचे लिखी वस्तुएँ रखें। दीप सबसे अंत में, सोने से पहले या भोर में, जलाएँ।
  2. भोर से पहले: कोई बड़ा आँखें बंद रखकर सबको जगाता है और एक-एक को विशुक्कणि तक ले जाता है। इसे कणि काणल कहते हैं। आँखें तभी खोली जाती हैं जब सामने पहुँच जाएँ।
  3. जलते दीप के साथ विशुक्कणि को देखें और आने वाले वर्ष के लिए छोटी प्रार्थना करें।
  4. बड़े छोटों को पैसे या सिक्के का उपहार देते हैं, जिसे विशुक्कैनीट्टम कहते हैं।
  5. स्नान करें, नए या स्वच्छ कपड़े पहनें और हो सके तो मंदिर जाएँ।
  6. दोपहर से पहले शाकाहारी भोज, विशु सद्या, बनाएँ और बाँटें।

रीतियाँ घर-घर अलग हैं; अपने परिवार का ढंग मानें।

पूजन सामग्री

  • काँसे का पात्र (उरुळि) या चौड़ा पीतल का पात्र, कच्चे चावल से भरा
  • सुनहरे कोन्ना फूल, या न मिलें तो गेंदे जैसे पीले फूल
  • कृष्ण या विष्णु की मूर्ति या चित्र, दर्पण, सोने का आभूषण या सिक्का और नया वस्त्र
  • नारियल, फल और सब्ज़ियाँ, जिनमें पीला खीरा (वेल्लरिक्का) और हो सके तो कटहल
  • पीतल का दीप (निलविलक्कु) और उपहार के लिए सिक्के

व्रत और भोजन

विशु भोज का पर्व है, उपवास का नहीं। कुछ परिवार दिन की शुरुआत विशु कट्टा या विशु कंजी जैसे सादे अर्पण से करते हैं, जो चावल की मीठी बनावट है और प्रसाद के रूप में ली जाती है। मुख्य भोजन केले के पत्ते पर परोसा गया शाकाहारी सद्या है, जिसमें प्रायः चावल, सांभर, कुछ सब्ज़ियाँ, रसम, अचार, केले के चिप्स और कई प्रकार के पायसम होते हैं। व्यंजनों की संख्या अलग-अलग होती है; छोटा भोजन भी ठीक है।

बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग भोजन के बारे में चिकित्सक की सलाह मानें।

क्या करें

  • विशुक्कणि एक रात पहले सावधानी से सजाएँ।
  • बच्चों और बड़ों को आँखें बंद रखकर कणि तक ले जाएँ।
  • छोटों को विशुक्कैनीट्टम दें, थोड़ी राशि ही सही।
  • स्वच्छ, नए या पारंपरिक कपड़े पहनें।
  • सद्या पड़ोसियों और अतिथियों के साथ बाँटें।

क्या न करें

  • कणि तैयार होने से पहले उसे न देखें।
  • दीप न छोड़ें, पर उसे परदों और कागज़ से सुरक्षित दूर रखें।
  • दिन को केवल उपहारों का न बना दें; प्रथम दर्शन और प्रार्थना ही उसका सार है।
  • भोजन व्यर्थ न करें।
  • हर वस्तु न मिले तो चिंता न करें; सादी सजावट भी मान्य है।

क्षेत्रीय परंपराएँ

विशुक्कणि बहुत सादी भी हो सकती है और बहुत भव्य भी। अनेक घरों में बीच में कृष्ण या विष्णु की प्रतिमा रहती है। केरल के अनेक भागों में, विशेषकर उत्तर में, पटाखे भी विशु का हिस्सा हैं, और मंदिरों में भोर में विशुक्कणि के दर्शन की व्यवस्था होती है।

केरल के बाहर लगभग यही दिन दूसरे नामों से मनाया जाता है: तमिलनाडु में पुथांडु, पंजाब में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू, बंगाल में पोइला बोइशाख, ओडिशा में महाविषुव संक्रांति और बिहार में सतुआन।

आज के समय में

विशु अक्सर काम के दिन पड़ता है; अनेक नगरों के मलयाली संगठन आसपास के सप्ताहांत पर सद्या और विशुक्कणि की प्रदर्शनी के साथ इसे मनाते हैं। घर पर विशुक्कणि शाम को, जो मिले उसी से सजाएँ। कोन्ना के फूल प्रायः नहीं मिलते, इसलिए गेंदे या अन्य पीले फूल चलते हैं। दीप को स्थिर थाली में रखें और परदों से दूर। सुबह जल्दी काम पर निकलना हो तो निकलने से पहले प्रथम दर्शन कर लें। उपहार के लिए लिफ़ाफ़े में थोड़े पैसे काफ़ी हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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