पुथांडु (तमिल नववर्ष)
Puthandu (Tamil New Year)
पुथांडु चित्तिरै 1 का तमिल नववर्ष है, जो शुभ प्रथम दर्शन कणि, आम की पचड़ी, नए कपड़ों और मंदिर-दर्शन के साथ मनता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | मेष संक्रांति |
| बुधवार, 14 अप्रैल 2027 | मेष संक्रांति |
| गुरुवार, 13 अप्रैल 2028 | मेष संक्रांति |
परिचय
पुथांडु का अर्थ तमिल में "नया वर्ष" है। यह तमिल मास चित्तिरै के पहले दिन पड़ता है, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, यानी मेष संक्रांति के दिन। तमिल पंचांग सौर है, इसलिए यह दिन हर वर्ष सूर्य की लगभग एक ही स्थिति पर पड़ता है। इस दिन को वरुष पिरप्पु, यानी वर्ष का जन्म, भी कहते हैं।
तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, श्रीलंका, मलेशिया और दुनिया भर के तमिल समुदाय इसे मनाते हैं। तमिलनाडु में यह सार्वजनिक अवकाश है।
महत्व और कथाएँ
तमिल वर्ष साठ वर्ष-नामों के चक्र पर चलता है, जैसे प्रभव, विभव और शुक्ल, जो साठ वर्ष बाद दोहराते हैं। नए वर्ष का नाम पंचांगम् में घोषित होता है, और उसे सुनना अनेक परिवारों और मंदिरों की रीति है।
पुथांडु का मूल भाव अच्छी शुरुआत है। अनेक परिवार मानते हैं कि नववर्ष की सुबह जो पहले दिखे, वह वर्ष का स्वर तय करता है। इसी विचार से "कणि", यानी शुभ वस्तुओं की थाली, एक रात पहले सजाई जाती है। आम की पचड़ी के मिले-जुले स्वाद याद दिलाते हैं कि जीवन में अनेक अनुभव हैं।
नववर्ष किस दिन हो, इस पर चर्चा रही है। चित्तिरै 1 परंपरागत दिन है। राज्य सरकार ने कुछ समय तै 1, यानी पोंगल का दिन, नववर्ष घोषित किया और फिर चित्तिरै 1 बहाल कर दिया। अनेक परिवार दोनों मनाते हैं।
पूजा विधि
- पिछली रात: घर साफ़ करें। पूजा-कक्ष में थाली पर कणि सजाएँ: आम, कटहल और केला (मुक्कणि, यानी तीन फल), दर्पण, सोना या सिक्के, फूल, कच्चा चावल, थोड़ी दाल, गुड़, पान और सुपारी। दीप जलाएँ।
- भोर: जागकर, कुछ और देखने से पहले, कणि के दर्शन करें। प्रायः बड़े सबसे छोटों को आँखें बंद कराकर वहाँ ले जाते हैं।
- स्नान करके नए या स्वच्छ पारंपरिक कपड़े पहनें। द्वार पर कोलम बनाएँ और चौखट पर आम के पत्ते लटकाएँ।
- कुलदेवता को फूल, दीप और धूप अर्पित करें और हो सके तो मंदिर जाएँ। वर्ष का पंचांग पढ़ा जाए तो उसे सुनें।
- उत्सव का भोजन बनाएँ और बाँटें, आरंभ थोड़ी-सी आम की पचड़ी से करें।
- बड़े छोटों को पैसों के छोटे उपहार देते हैं, और लोग मित्रों-रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं।
रीतियाँ परिवार-परिवार में अलग हैं; अपने बड़ों की रीति मानें।
पूजन सामग्री
- कणि की थाली: आम, कटहल, केला, या जो फल मिलें
- दर्पण, सोना या सिक्के, फूल, कच्चा चावल, दाल, गुड़, पान और सुपारी
- दीप, तेल, कपूर और धूप
- द्वार के लिए आम के पत्ते, कोलम के लिए चावल का आटा, और पचड़ी की सामग्री
व्रत और भोजन
पुथांडु भोज का दिन है, उपवास का नहीं। प्रमुख व्यंजन आम की पचड़ी (मांगाई पचड़ी) है, जो कच्चे आम, गुड़, नीम के फूल, इमली और मिर्च से बनती है। थोड़े नमक के साथ ये सामग्री तमिल परंपरा के छह स्वाद (अरुसुवै) देती हैं, जैसे मीठा, खट्टा, कड़वा और तीखा। भाव यह है कि जीवन में ये सारे स्वाद हैं; हर स्वाद के अर्थ पर विवरण अलग हैं। शेष भोजन अधिकतर घरों में शाकाहारी होता है: सांभर, चावल, वड़ै और पायसम।
बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग भोजन के बारे में चिकित्सक की सलाह मानें। नीम के फूल कड़वे होते हैं और बहुत थोड़ी मात्रा में लिए जाते हैं।
क्या करें
- कणि को सावधानी से सजाएँ और सुबह सबसे पहले उसे देखें।
- घर साफ़ करें और कोलम बनाएँ।
- सभी स्वादों वाली थोड़ी-सी आम की पचड़ी बनाएँ।
- बड़ों को प्रणाम करें और दूर रहने वाले रिश्तेदारों को फ़ोन करें।
- बच्चों को तमिल वर्ष-नाम और दिन का अर्थ बताएँ।
क्या न करें
- उस दिन इस पर बहस न करें कि चित्तिरै 1 सही नववर्ष है या तै 1।
- दीप को परदों से दूर सुरक्षित रखें और बिना देखे न छोड़ें।
- नीम के फूल अधिक न खाएँ; चुटकी भर परंपरागत है।
- कणि को अधूरा या अव्यवस्थित न छोड़ें।
- सब वस्तुएँ न मिलें तो चिंता न करें; सादी थाली भी ठीक है।
क्षेत्रीय परंपराएँ
तमिलनाडु के मंदिरों में चित्तिरै 1 पर विशेष पूजा होती है, और अनेक में पंचांगम् का पाठ होता है। श्रीलंका और मलेशिया के तमिल भी इसी दिन के आसपास नववर्ष मनाते हैं। केरल का विशु, बंगाल का पोइला बोइशाख और असम का बोहाग बिहू लगभग उसी दिन पड़ते हैं। उत्तर भारत में यही दिन मेष संक्रांति है।
आज के समय में
पुथांडु अधिकतर वर्षों में काम के दिन पड़ता है। तमिल संगठन और मंदिर नज़दीकी सप्ताहांत पर भोज, संगीत और पंचांगम् पाठ के साथ नववर्ष मनाते हैं। घर पर कणि रात को सजा दें और सुबह सबसे पहले उसे देखें, चाहे काम पर निकलना हो। कच्चे आम वसंत में बाज़ार में मिल जाते हैं। सूखे नीम के फूल न मिलें तो कड़वा स्वाद छोड़ा जा सकता है। काम के दिन उत्सव सरल रखें और पूरा भोज शाम को करें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।