पोंगल
Pongal
पोंगल तमिल लोगों का चार दिन का फसल पर्व है, जिसमें सूर्य और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त होता है और नए चावल-दूध की खीर उफनाई जाती है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| बुधवार, 14 जनवरी 2026 | मकर संक्रांति |
| गुरुवार, 14 जनवरी 2027 | मकर संक्रांति |
| शनिवार, 15 जनवरी 2028 | मकर संक्रांति |
परिचय
पोंगल तमिल लोगों का फसल पर्व है, जो तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, श्रीलंका और जहाँ भी तमिल परिवार बसे हैं, वहाँ मनाया जाता है। नाम तमिल शब्द "पोंगु" से आया है, जिसका अर्थ है उफनना। यह मुख्य दिन पकाए जाने वाले नए चावल और दूध के उस बर्तन की ओर संकेत करता है जिसे उफनकर बहने दिया जाता है।
पोंगल तमिल सौर पंचांग के तै मास में आता है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करके उत्तरायण की ओर बढ़ता है, यानी मकर संक्रांति के आसपास। पर्व चार दिन चलता है: भोगी, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल और कानुम पोंगल।
महत्व और कथाएँ
पोंगल मूल रूप से धन्यवाद है। किसान सूर्य को उस प्रकाश के लिए धन्यवाद देते हैं जो फसल पकाता है, धरती को उपज के लिए और पशुओं को जो खेत जोतते हैं। पहला दिन, भोगी, लोक-परंपरा में वर्षा के देवता इंद्र से जुड़ा है। दूसरा दिन सूर्य का है, तीसरा पशुओं का और चौथा रिश्तेदारों और समाज का। स्थानीय कथाएँ अनेक हैं और स्थान-स्थान पर अलग हैं। बहुत-से तमिल परिवार सीधे यही कहते हैं कि पोंगल फसल और कृतज्ञता का पर्व है।
पूजा विधि
- भोगी: मुख्य पर्व से एक दिन पहले घर साफ़ करें और पुरानी, बेकार चीज़ें हटाएँ। कुछ लोग भोर में ऐसी चीज़ों की छोटी आग जलाते हैं, जो छोड़ने का प्रतीक है। आग संभव न हो तो फालतू वस्तुएँ दान कर दें।
- सजावट: मुख्य दिन द्वार पर चावल के आटे का कोलम बनाएँ। नए बर्तन की गर्दन पर पत्तों सहित हल्दी का पौधा बाँधें और हल्दी-कुमकुम लगाएँ।
- पोंगल पकाएँ: बर्तन में दूध और पानी उबालें। दूध उफनकर बहे तो परिवार "पोंगलो पोंगल" पुकारता है। फिर नया चावल, मूँग दाल और गुड़ डालें। मीठा पोंगल (सक्करै पोंगल) घी, काजू, किशमिश और इलायची से बनता है।
- सूर्य को अर्पण: पोंगल को केले के पत्ते पर गन्ने और केले के साथ रखकर जलते दीप और कपूर के साथ सूर्य की ओर मुख करके अर्पित करें, फिर बाँटकर खाएँ।
- मट्टू पोंगल: तीसरे दिन पशुओं को नहलाएँ, सजाएँ और चावल, फल तथा गुड़ खिलाएँ। पशु न हों तो मंदिर में किसी गाय को फल अर्पित करें।
- कानुम पोंगल: चौथे दिन रिश्तेदारों और मित्रों से मिलें और साथ भोजन करें।
परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं; अपने बड़ों की रीति मानें।
पूजन सामग्री
- नया मिट्टी का बर्तन, या स्वच्छ पीतल या स्टील का बर्तन
- नई फसल का चावल, मूँग दाल, गुड़, दूध, घी, काजू, किशमिश और इलायची
- हल्दी का पौधा (पत्तों सहित ताज़ी गाँठ), गन्ना, केले, पान के पत्ते, हल्दी और कुमकुम
- कोलम के लिए चावल का आटा; दीप, कपूर और धूप
व्रत और भोजन
पोंगल उत्सव है, उपवास नहीं। अनेक परिवार सूर्य को अर्पण के बाद ही खाते हैं, इसलिए पहला भोजन देर से हो सकता है। यह रीति है, नियम नहीं। मुख्य व्यंजन मीठा पोंगल और वेन पोंगल हैं। वेन पोंगल काली मिर्च, जीरे और घी से बना नमकीन रूप है। भोजन परंपरा से शाकाहारी है।
बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग चिकित्सक की सलाह मानें और समय पर खाएँ।
क्या करें
- मुख्य दिन से पहले घर साफ़ और व्यवस्थित करें।
- द्वार पर कोलम बनाएँ, भले छोटा हो।
- पहला पोंगल सूर्योदय के बाद पकाएँ, हो सके तो खुले में या सूर्य की ओर खुली खिड़की के पास।
- पोंगल पड़ोसियों, रिश्तेदारों और ज़रूरतमंद लोगों में बाँटें।
- खेत के मज़दूरों और अन्न उगाने वाले सबके प्रति आभार प्रकट करें।
क्या न करें
- दूध उफनने के समय चूल्हे पर बर्तन को अकेला न छोड़ें।
- आभार के दिन अन्न व्यर्थ न करें।
- भोगी की आग में प्लास्टिक, रबर या कोई असुरक्षित चीज़ न जलाएँ।
- पर्व के दिनों में विवाद न छेड़ें।
- बच्चों या अतिथियों को हर रीति निभाने के लिए बाध्य न करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
तमिलनाडु में पोंगल वर्ष के सबसे बड़े पारिवारिक पर्वों में है। गाँवों में सामूहिक रसोई और खेल होते हैं, और कुछ स्थानों पर मट्टू पोंगल पर जल्लीकट्टू, यानी बैल को वश में करने का आयोजन, होता है, जिस पर सार्वजनिक बहस भी है।
इसी शीतकालीन दिन को अन्यत्र दूसरे नामों से मनाया जाता है: कर्नाटक में मकर संक्रांति, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भोगी, संक्रांति और कनुमा, पंजाब में लोहड़ी और माघी, और उत्तर भारत में मकर संक्रांति, खिचड़ी और पतंग।
आज के समय में
पोंगल अक्सर काम के दिन पड़ता है; तमिल संगठन और मंदिर नज़दीकी सप्ताहांत पर सामूहिक भोजन और कोलम प्रतियोगिता रखते हैं। घर पर पोंगल सामान्य बर्तन में चूल्हे पर पकाएँ। फ़्लैट में खुली आग प्रायः नहीं जलती, इसलिए भोगी की सफ़ाई बिना आग के करें। उबलते दूध की भाप से धुएँ का अलार्म बज सकता है, इसलिए पंखा चलाएँ और बर्तन आँखों के सामने रखें। कोलम द्वार की सीढ़ी या थाली में बना लें, और हल्दी का पौधा न मिले तो ताज़ी हल्दी की गाँठ चलेगी। सूर्य बादलों में हो तो पूर्व की उजली खिड़की की ओर मुख करें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।