संक्रांति

Sankranti

सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश का दिन, जो साल में बारह बार आता है और स्नान, दान तथा सूर्य पूजा से मनाया जाता है।

देवता: सूर्य देवअवधि: एक दिनऋतु: हर महीनेअन्य नाम: सूर्य संक्रमण, सौर संक्रांति

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तारीख़पर्व या अवसर
सोमवार, 16 नवंबर 2026वृश्चिक संक्रांति
बुधवार, 16 दिसंबर 2026धनु संक्रांति
गुरुवार, 14 जनवरी 2027मकर संक्रांति
शनिवार, 13 फ़रवरी 2027कुम्भ संक्रांति
सोमवार, 15 मार्च 2027मीन संक्रांति
बुधवार, 14 अप्रैल 2027मेष संक्रांति
शनिवार, 15 मई 2027वृषभ संक्रांति
मंगलवार, 15 जून 2027मिथुन संक्रांति
शनिवार, 17 जुलाई 2027कर्क संक्रांति
मंगलवार, 17 अगस्त 2027सिंह संक्रांति
शुक्रवार, 17 सितंबर 2027कन्या संक्रांति
सोमवार, 18 अक्टूबर 2027तुला संक्रांति

परिचय

संक्रांति का अर्थ है एक स्थिति से दूसरी में जाना। जिस दिन सूर्य एक राशि से निकलकर अगली राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं। यह साल में बारह बार, हर सौर मास के आरंभ में एक बार आती है। तिथि वाले पर्व चन्द्रमा की चाल से चलते हैं, पर संक्रांति सूर्य की चाल से तय होती है, इसलिए यह हर वर्ष मौसम के लगभग उसी समय पर पड़ती है। राशियों की गणना निरयन पद्धति से की जाती है।

हर संक्रांति का नाम उस राशि पर रखा गया है जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, जैसे मेष संक्रांति या मकर संक्रांति।

महत्व और कथाएँ

संक्रांति सौर मास का मोड़ है। तमिल, बंगाली, मलयालम और ओड़िया जैसे कई क्षेत्रीय पंचांगों में महीना संक्रांति के दिन से ही शुरू होता है।

संक्रांति के आसपास का समय पुण्य काल कहलाता है और उसका सबसे श्रेष्ठ भाग महापुण्य काल। परंपरा में इस समय गंगा स्नान, दान और प्रार्थना की महिमा बताई गई है। आपके शहर के लिए संक्रांति का क्षण और उसका पुण्य काल इस पंचांग में देखा जा सकता है।

दो विशेष संक्रांतियाँ

संक्रांति सूर्य किस राशि में महत्व
मकर संक्रांति मकर उत्तरायण का आरंभ यानी सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा; फसल का पर्व
कर्क संक्रांति कर्क दक्षिणायन का आरंभ यानी सूर्य की दक्षिण की ओर यात्रा

उत्तरायण और दक्षिणायन का यह "आरंभ" निरयन गणना का कथन है। ऋतुओं पर आधारित गणना में सूर्य के उत्तर या दक्षिण की ओर मुड़ने का वास्तविक क्षण (अयनांत) इन संक्रांतियों से लगभग तीन से चार सप्ताह पहले आ जाता है।

बारह संक्रांतियाँ

क्रम संक्रांति सूर्य किस राशि में
1 मेष संक्रांति मेष
2 वृषभ संक्रांति वृषभ
3 मिथुन संक्रांति मिथुन
4 कर्क संक्रांति कर्क
5 सिंह संक्रांति सिंह
6 कन्या संक्रांति कन्या
7 तुला संक्रांति तुला
8 वृश्चिक संक्रांति वृश्चिक
9 धनु संक्रांति धनु
10 मकर संक्रांति मकर
11 कुम्भ संक्रांति कुम्भ
12 मीन संक्रांति मीन

मेष संक्रांति से अनेक क्षेत्रों में सौर नववर्ष शुरू होता है। धनु और मीन संक्रांति से वह अवधि शुरू होती है जिसे कुछ परंपराओं में खरमास कहते हैं।

पूजा विधि

  1. सुबह जल्दी स्नान करें। संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में, नहीं तो घर पर पवित्र नदियों का स्मरण करते हुए।
  2. पूर्व की ओर मुख करके सूर्य को जल का अर्घ्य दें और "ॐ सूर्याय नमः" कहें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  3. दीप जलाएँ और सूर्य या अपने इष्ट देव को फूल चढ़ाएँ।
  4. परिवार में रीति हो तो पितरों को छोटी प्रार्थना के साथ याद करें।
  5. पुण्य काल में भोजन, वस्त्र, अनाज या तिल का दान करें।
  6. सादा भोजन करें।

पूजन सामग्री

  • अर्घ्य के लिए ताँबे का लोटा और स्वच्छ जल।
  • लाल फूल, रोली, अक्षत और तिल।
  • दीप, धूप और कपूर।
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र या तिल।

व्रत और भोजन

संक्रांति पर निश्चित उपवास नहीं होता। बहुत-से लोग सात्त्विक और हल्का भोजन करते हैं। कुछ परिवार स्नान और दान पूरा होने तक अन्न नहीं लेते। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें।

क्या करें

  • सुबह जल्दी स्नान करके सूर्य को अर्घ्य दें।
  • अन्न, तिल, वस्त्र या धन का दान करें।
  • अपने ही शहर का पुण्य काल देखें।
  • दीप जलाकर छोटी प्रार्थना करें।
  • पितरों को कृतज्ञता से याद करें।
  • भोजन सादा रखें।

क्या न करें

  • दान जल्दबाज़ी में न करें; शांत मन से दें।
  • जिस परिवार में इस दिन भारी या मांसाहारी भोजन नहीं करते, वहाँ उस रीति को न तोड़ें।
  • झगड़े और कठोर वचन से बचें।
  • सामर्थ्य हो तो स्नान और प्रार्थना न छोड़ें।
  • इतना दान न दें कि अपने घर का ख़र्च चलाना कठिन हो जाए।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • मकर संक्रांति: उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी कहते हैं; गंगा स्नान, खिचड़ी और तिल-गुड़ का दान प्रचलित है, और प्रयागराज के संगम पर माघ मेला लगता है। पंजाब में लोहड़ी के बाद माघी, असम में माघ बिहू, गुजरात में उत्तरायण और तमिलनाडु में पोंगल मनाया जाता है।
  • मेष संक्रांति: केरल में विशु, तमिलनाडु में पुथांडु, पंजाब में बैसाखी, बंगाल में पोइला बैशाख और बिहार में सतुआनी।
  • कन्या संक्रांति: पूर्वी भारत में इसी दिन विश्वकर्मा पूजा होती है।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

संक्रांति की तारीख़ हर वर्ष लगभग वही रहती है, इसलिए पहले से योजना बनाई जा सकती है। सूर्य के राशि प्रवेश का क्षण समय क्षेत्र के अनुसार बदलता है और विदेश में किसी और तारीख़ पर भी पड़ सकता है, इसलिए अपने शहर का समय देखें। फ़्लैट या दफ़्तर की व्यस्तता में भी सुबह का स्नान, सूर्य की ओर मुख करके छोटी प्रार्थना और किसी मंदिर, गौशाला या ज़रूरतमंद को दान संक्रांति निभाने का अच्छा तरीक़ा है। जो परिवार गंगा तक नहीं पहुँच सकते, वे घर के जल में पवित्र नदियों का स्मरण करके स्नान करें।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।