मकर संक्रांति
Makar Sankranti
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का पर्व, जिसे स्नान, दान, तिल-गुड़, खिचड़ी और पतंगों के साथ आभार के रूप में मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| बुधवार, 14 जनवरी 2026 | मकर संक्रांति |
| गुरुवार, 14 जनवरी 2027 | मकर संक्रांति |
| शनिवार, 15 जनवरी 2028 | मकर संक्रांति |
परिचय
मकर संक्रांति उन थोड़े से हिंदू पर्वों में है जो चन्द्रमा से नहीं, सूर्य से तय होते हैं। संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। इस दिन सूर्य निरयन गणना की मकर राशि में प्रवेश करते हैं।
सौर वर्ष पर चलने के कारण यह पर्व हर वर्ष लगभग एक ही दिन पड़ता है। ठीक दिन संक्रमण के क्षण पर निर्भर करता है, और कभी-कभी पुण्य काल, यानी स्नान और दान का शुभ समय, अगली सुबह तक चला जाता है। पंचांग की निरयन गणना में इसी दिन से उत्तरायण, यानी सूर्य का उत्तर की ओर चलना, माना जाता है। आकाश में सूर्य वास्तव में उत्तर की ओर लगभग तीन सप्ताह पहले, शीत अयनांत के दिन, मुड़ता है; उसके बाद से दिन धीरे-धीरे बड़े और गर्म होने लगते हैं। इससे पहले, सूर्य के धनु राशि में रहने का काल खरमास कहलाता है।
महत्व और कथाएँ
शास्त्रों में उत्तरायण को प्रकाश और स्पष्टता का समय कहा गया है। महाभारत में पितामह भीष्म शर-शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा करते रहे और तभी देह त्यागी, इसीलिए इस काल को शुभ गति से जोड़ा जाता है।
एक प्रिय कथा के अनुसार इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं, जो मकर राशि के स्वामी हैं। यह पिता-पुत्र के मेल-मिलाप और पुराने गिले-शिकवे भुलाने का प्रतीक है। माना जाता है कि भगीरथ के पीछे चलती गंगा इसी दिन गंगासागर में सागर से मिलीं।
महाराष्ट्र में कहावत है "तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला", यानी तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो। मूल में यह दिन सूर्य, धरती और उन किसानों तथा पशुओं के प्रति आभार का है जो शीत की फसल घर लाते हैं।
पूजा विधि
रीतियाँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदलती हैं। यह घर के लिए सरल रूपरेखा है।
- सुबह जल्दी स्नान करें, आदर्श रूप में गंगा या किसी नदी में। न जा सकें तो घर के पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें या थोड़े तिल डाल लें।
- स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूर्व की ओर मुख करके ताँबे के लोटे से उगते सूर्य को अर्घ्य दें। हो सके तो जल में लाल फूल या लाल चन्दन डालें।
- सूर्य मंत्र या गायत्री मंत्र का धीमे स्वर में जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- दीपक जलाएँ और सूर्य तथा अपने कुल देवता को तिल, गुड़ और चावल अर्पित करें।
- सामर्थ्य के अनुसार तिल, गुड़, कंबल, अनाज या भोजन का दान दें। उत्तर प्रदेश और बिहार में उड़द की दाल और चावल दान करने की परंपरा है।
- परिवार और पड़ोसियों में तिल-गुड़ बाँटें और साथ बैठकर त्योहार का भोजन करें।
पूजन सामग्री
- ताँबे का लोटा, लाल फूल और लाल चन्दन
- काले और सफ़ेद तिल, गुड़ और तिल-गुड़ की मिठाइयाँ
- खिचड़ी के लिए चावल, उड़द या मूँग की दाल और घी
- दीपक, धूप, और दान के लिए ऊनी वस्त्र, कंबल और अनाज
व्रत और भोजन
मकर संक्रांति मुख्यतः दावत का दिन है, उपवास का नहीं। भोजन गरम तासीर वाला और नई फसल से बना होता है: तिल के लड्डू, चिक्की, घी वाली खिचड़ी, दही-चूड़ा, पोंगल, पूरन पोली, और शकरकंद या गन्ने के पकवान।
कुछ परिवार स्नान और अर्घ्य के बाद ही खाते हैं। हल्का उपवास रखना हो तो बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, गर्भवती स्त्रियों और दवा लेने वालों को उतना ही रखना चाहिए जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।
क्या करें
- जल्दी स्नान करें और हो सके तो सूर्योदय पर सूर्य को जल चढ़ाएँ।
- तिल, गुड़, अनाज या गर्म कपड़ों का दान करें।
- बड़ों, मित्रों और पड़ोसियों के साथ तिल-गुड़ बाँटें।
- किसानों और रसोइयों का धन्यवाद करें जो आपके भोजन का प्रबंध करते हैं।
- पतंग उड़ाएँ तो सूती धागा लें और बिजली के तारों तथा सड़कों से दूर उड़ाएँ।
- पुण्य काल में ही मुख्य पूजा और दान करें।
क्या न करें
- काँच लगे, नायलॉन या धातु वाले मांझे (चीनी मांझे) से पतंग न उड़ाएँ, यह पक्षियों और राहगीरों के लिए जानलेवा है।
- दिन की शुरुआत क्रोध या कटु वाणी से न करें।
- भोजन बर्बाद न करें और माँगने वाले को खाली हाथ न लौटाएँ।
- छतों की मुँडेर या किनारे पर बिना सावधानी के न चढ़ें।
- पर्व का दिन चन्द्र तिथि से तय न करें; संक्रांति का क्षण अपने शहर के पंचांग में देखें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
- उत्तर प्रदेश: इसे खिचड़ी कहते हैं। उड़द की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी मेला लगता है, प्रयागराज के माघ मेले में संगम स्नान होता है, और काशी के घाटों पर स्नान-दान की भीड़ रहती है।
- बिहार: दही-चूड़ा, तिलकुट, तिल के लड्डू और खिचड़ी का भोज होता है, साथ में गंगा-स्नान।
- पंजाब: एक शाम पहले लोहड़ी का अलाव जलता है। संक्रांति के दिन माघी पर पवित्र स्नान और खिचड़ी का चलन है।
- तमिलनाडु: थाई पोंगल चार दिन का फसल पर्व है, जिसमें चावल उबलकर उफनता है।
- गुजरात और राजस्थान: उत्तरायण पतंगबाज़ी के लिए प्रसिद्ध है, साथ में उंधियू और चिक्की बनती है।
- महाराष्ट्र और कर्नाटक: तिल-गुड़ बाँटकर मीठा बोलने की बात कही जाती है।
- असम: माघ बिहू (भोगाली बिहू) में सामूहिक भोज और अलाव होते हैं।
- पश्चिम बंगाल में गंगासागर मेला लगता है और केरल में सबरीमला की मकर ज्योति के दर्शन होते हैं।
परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
संक्रांति कई वर्ष कामकाजी दिन पर पड़ती है। आप बालकनी या छत से दफ़्तर जाने से पहले सूर्य को जल चढ़ा सकते हैं और बाकी पूजा शाम को कर सकते हैं। तिल, गुड़ और उड़द की दाल पास की दुकान पर मिल जाती है। नदी तक न जा पाएँ तो घर पर थोड़े तिल डालकर स्नान करना मान्य है, और दान में ज़रूरतमंदों को कंबल बाँटने में सहयोग दे सकते हैं। पतंग खुले मैदान में, बिजली के तारों से दूर और सादे सूती धागे से उड़ाएँ। विदेश में रहने वाले परिवार निकटतम सप्ताहांत पर मंदिर या समुदाय के आयोजन में शामिल हो सकते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।