लोहड़ी

Lohri

लोहड़ी पंजाब का शीतकालीन अलाव पर्व है, जो फसल की ख़ुशी और नई शुरुआत का उत्सव है और मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है।

देवता: अग्नि देव और सूर्य देवअवधि: एक संध्याऋतु: शिशिर की कड़ाके की ठंडअन्य नाम: लाल लोई, लोहदी

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तारीख़पर्व या अवसर
मंगलवार, 13 जनवरी 2026लोहड़ी
बुधवार, 13 जनवरी 2027लोहड़ी
शुक्रवार, 14 जनवरी 2028लोहड़ी

परिचय

लोहड़ी शीत ऋतु का अलाव पर्व है। यह विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में तथा दुनिया भर में बसे पंजाबी परिवारों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के शहरों में रहने वाले पंजाबी और सिंधी परिवार भी इसे उसी चाव से मनाते हैं। यह पर्व मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को आता है, यानी पंजाब की सौर गणना में पौष की अंतिम रात को। यह सूर्य की गति पर चलता है, इसलिए सौर कैलेंडर में हर वर्ष लगभग उसी समय पड़ता है।

यह त्योहार सबसे ठंडे दिनों के बीतने और दिनों के धीरे-धीरे लंबे होने का संकेत है। साथ ही यह रबी की फसल का उत्सव है। इस समय खेतों में गन्ना, गेहूँ और सरसों लहलहाते दिखते हैं।

महत्व और कथाएँ

लोहड़ी का केंद्र अग्नि है। लोग अलाव के चारों ओर जमा होते हैं, उसमें तिल, गुड़, मूँगफली और मक्के की लाई अर्पित करते हैं, परिक्रमा करते हैं और गीत गाते हैं। इसे अग्नि देव और सूर्य को अर्पण माना जाता है, जिसमें गर्मी और फसल के लिए आभार प्रकट किया जाता है और आने वाले वर्ष की मंगलकामना की जाती है।

सबसे प्रचलित कथा दुल्ला भट्टी की है। वे मुगल काल में पंजाब के लोकनायक थे, जिन्हें लड़कियों को बचाने और उनका विवाह करवाने के लिए याद किया जाता है। "सुंदर मुंदरिये" जैसे लोहड़ी के गीतों में उनकी प्रशंसा गाई जाती है। बच्चे घर-घर जाकर ये गीत गाते हैं और बदले में मिठाई, रेवड़ी या पैसे पाते हैं।

अनेक परिवार नवजात शिशु या नवविवाहित जोड़े के घर की पहली लोहड़ी को विशेष रूप से मनाते हैं। यह उनके लिए साथ बिताया पहला आनंदमय त्योहार होता है।

पूजा विधि

लोहड़ी में पुरोहित द्वारा कराई जाने वाली कोई निश्चित पूजा नहीं होती। परिवारों में प्रचलित रीति इस प्रकार है।

  1. सूर्यास्त के बाद परिवार और मित्र खुली जगह पर तैयार किए गए अलाव के पास जमा हों। पास में पानी की बाल्टी रखें।
  2. अलाव सब मिलकर जलाएँ। यह काम अक्सर घर के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य, नवविवाहित जोड़े या नवजात के माता-पिता करते हैं।
  3. तिल, गुड़, मूँगफली, मक्के की लाई और रेवड़ी को आभार की छोटी प्रार्थना के साथ अग्नि में अर्पित करें।
  4. अग्नि की तीन या अधिक परिक्रमा करें और स्वास्थ्य तथा समृद्धि की प्रार्थना करें।
  5. लोकगीत गाएँ और भांगड़ा या गिद्धा करें।
  6. अर्पित सामग्री को प्रसाद के रूप में बाँटें और उत्सव का भोजन करें।

पूजन सामग्री

  • सूखी लकड़ी या आग रखने का सुरक्षित पात्र
  • तिल, गुड़, मूँगफली और मक्के की लाई
  • रेवड़ी, गजक या तिल की अन्य मिठाइयाँ
  • गन्ने से बनी चीज़ें, जहाँ मिलें
  • भोजन के लिए सरसों का साग और मक्के की रोटी
  • पहली लोहड़ी हो तो नए वस्त्र

व्रत और भोजन

लोहड़ी दावत का पर्व है, उपवास का नहीं। पारंपरिक भोजन सरसों का साग और मक्के की रोटी है। साथ में गुड़, तिल की मिठाइयाँ, मूँगफली, गजक, रेवड़ी और मीठे चावल परोसे जाते हैं। परिवार भोजन शाकाहारी रखते हैं या अपनी परंपरा के अनुसार चलते हैं।

क्या करें

  • परिवार और पड़ोसियों के साथ जमा हों और बच्चों को भी उत्सव में शामिल करें।
  • अग्नि में थोड़ा तिल और गुड़ आभार के साथ अर्पित करें।
  • आग के पास पानी की बाल्टी या बुझाने का साधन रखें।
  • बच्चों और ढीले कपड़ों को लपटों से दूर रखें।
  • बच्चों को दुल्ला भट्टी की कथा सुनाएँ।
  • अकेले रहने वालों या परिवार से दूर लोगों के साथ भोजन बाँटें।
  • उत्सव के बाद आग को पूरी तरह बुझाएँ और जगह साफ़ करें।

क्या न करें

  • जहाँ अनुमति न हो वहाँ, या स्थानीय नियम देखे बिना, अलाव न जलाएँ।
  • आग तेज़ करने के लिए पेट्रोल, मिट्टी का तेल या कोई ज्वलनशील तरल न डालें।
  • आग को कभी अकेला न छोड़ें।
  • प्लास्टिक, टायर, उपचारित लकड़ी या कूड़ा न जलाएँ, इससे हवा ज़हरीली होती है।
  • साफ़ सूखी लकड़ी और परंपरागत सामग्री के अलावा कुछ और अग्नि में न डालें।
  • नशा करके आग की देखभाल न करें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • पंजाब: बच्चे घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाते और लोहड़ी माँगते हैं। बच्चे या नई बहू की पहली लोहड़ी बड़ा पारिवारिक समारोह होती है। अगले दिन माघी पर पवित्र स्नान और खिचड़ी का चलन है।
  • हरियाणा और दिल्ली: ऐसे ही अलाव जलते हैं और गजक तथा रेवड़ी बाँटी जाती है।
  • सिंधी परिवार: लाल लोई के रूप में इसी तरह अग्नि और गीतों के साथ मनाते हैं।
  • हिमाचल और जम्मू: यहाँ इसे लोहड़ी या लोहदी कहते हैं और स्थानीय लोकगीत गाए जाते हैं।
  • उत्तर प्रदेश और बिहार: अधिकतर परिवारों के लिए अगला दिन मकर संक्रांति का खिचड़ी पर्व है; लोहड़ी वहाँ मुख्यतः पंजाबी समुदाय मनाता है।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।

आज के समय में

शहरों में खुले अलाव पर नियम और रोक होती है, इसलिए नगर निगम या सोसाइटी की अनुमति देख लें। फ्लैट की बालकनी, छत, पार्किंग या इमारत के पास आग कभी न जलाएँ। सुरक्षित तरीका है सोसाइटी के मैदान में निर्धारित जगह पर सामूहिक अलाव, या लोहे की अंगीठी, या एक दीपक जलाकर घर के भीतर गीत गाना। कड़ाके की सर्दी और कोहरे में गर्म कपड़े पहनें और बुज़ुर्गों तथा बच्चों का ध्यान रखें। लोहड़ी अक्सर कामकाजी दिन पड़ती है, इसलिए कई समुदाय उत्सव निकटतम सप्ताहांत पर रखते हैं। विदेश में रहने वाले परिवार वहाँ के आग संबंधी नियम देखें और मंदिर या गुरुद्वारे के सामूहिक आयोजन में शामिल हों।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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