वरलक्ष्मी व्रत
Varalakshmi Vratam
श्रावण में पूर्णिमा से पहले आने वाले शुक्रवार को सुहागिन महिलाएँ वर देने वाली माँ लक्ष्मी का व्रत और पूजन करती हैं।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 | वरलक्ष्मी व्रत |
| शुक्रवार, 13 अगस्त 2027 | वरलक्ष्मी व्रत |
| शुक्रवार, 4 अगस्त 2028 | वरलक्ष्मी व्रत |
परिचय
वरलक्ष्मी व्रत माँ लक्ष्मी के वरलक्ष्मी रूप को समर्पित है, यानी वर देने वाली लक्ष्मी। यह आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु में विशेष रूप से प्रचलित है। विवाहित महिलाएँ इसे परिवार के कल्याण, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्रार्थना के साथ करती हैं। कुछ परिवारों में अविवाहित कन्याएँ और पुरुष भी शामिल होते हैं।
यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा से ठीक पहले पड़ने वाले शुक्रवार को होता है। किसी वर्ष पंचांगों में एक सप्ताह का अंतर आ सकता है, इसलिए अपने स्थानीय मंदिर या पंचांग से पुष्टि कर लें। कर्नाटक में इसे अक्सर वरमहालक्ष्मी कहते हैं। यह शुक्ल पक्ष में होता है, इसलिए पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पंचांगों में इसका दिन एक ही है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
महत्व और कथाएँ
कथा मगध की एक श्रद्धालु नारी चारुमती की है। माँ लक्ष्मी ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर इसी शुक्रवार को व्रत करने को कहा। चारुमती ने पड़ोस की महिलाओं के साथ यह व्रत किया, और सबके परिवारों पर माँ की कृपा हुई। तभी से महिलाएँ मिलकर यह पूजा करती आ रही हैं।
लक्ष्मी की अष्टलक्ष्मी रूप में भी उपासना होती है: आदि, धन, धान्य, गज, संतान, वीर, विजय और विद्या लक्ष्मी। बहुत-से परिवार इसे घर की सुख-शांति की प्रार्थना और देवी के स्वागत का अवसर मानते हैं। यह आशीर्वाद की प्रार्थना है, धन की गारंटी नहीं। स्वच्छता, उदारता और कृतज्ञता इस व्रत का सार हैं।
पूजा विधि
- एक दिन पहले घर साफ़ करें। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, नई या पारंपरिक साड़ी पहनें।
- पूजा स्थान को रंगोली (कोलम), आम के पत्तों और फूलों से सजाएँ।
- चावल या जल से भरा कलश रखें। उस पर पान के पत्ते, सिक्का, आम के पत्ते और नारियल रखें। कलश पर देवी का मुख या चित्र लगाकर उसे साड़ी या वस्त्र पहनाएँ।
- संकल्प लें और सबसे पहले गणेश जी का आह्वान करें।
- कलश में लक्ष्मी जी का आह्वान करें और फूल, हल्दी, कुमकुम तथा धूप अर्पित करें।
- अष्टलक्ष्मी स्तोत्र या लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- फूलों के साथ नौ गाँठों वाला पीला धागा (तोरम) दाहिनी कलाई पर बाँधें; कुछ परिवार रीति के अनुसार इसे बाईं कलाई पर बाँधते हैं।
- वरलक्ष्मी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, नैवेद्य चढ़ाएँ और आरती करें।
- विवाहित महिलाओं को बुलाकर तांबूलम दें: पान के पत्ते, फल, चूड़ियाँ, हल्दी और कुमकुम।
- प्रसाद ग्रहण करें और सात्त्विक भोजन करें।
पूजन सामग्री
- चाँदी या पीतल का कलश, नारियल, आम और पान के पत्ते।
- चावल, हल्दी, कुमकुम और चंदन।
- नौ गाँठों वाला पीला धागा और फूल।
- कमल या अन्य फूल और मालाएँ।
- फल, मेवे और मिठाइयाँ, जैसे पोंगल, पायसम, कोझुकट्टै या पूरन पोली।
- धूप, घी के दीप और कपूर।
- तांबूलम के लिए पान के पत्ते, फल, चूड़ियाँ, ब्लाउज़ का कपड़ा, हल्दी और कुमकुम।
व्रत और भोजन
कई महिलाएँ पूजा पूरी होने तक उपवास रखती हैं और उसके बाद भोजन करती हैं। कुछ फल या दूध लेती हैं। नैवेद्य आमतौर पर शाकाहारी होता है और प्याज-लहसुन के बिना बनता है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें और हल्का व्रत चुनें। सरल पूजा भी उतनी ही स्वीकार्य है जितनी विस्तृत पूजा।
क्या करें
- एक दिन पहले घर साफ़ करें और सजाएँ।
- शांत और कृतज्ञ मन से पूजा करें और सखियों-पड़ोसिनों को बुलाएँ।
- आने वाली विवाहित महिलाओं को तांबूलम और छोटा उपहार दें।
- आरंभ में गणेश जी की प्रार्थना करें।
- सरल मिठाइयाँ बनाकर बाँटें।
- कृतज्ञता में दान करें।
- नई पीढ़ी की महिलाओं को कथा और रीतियाँ सिखाएँ।
क्या न करें
- इस दिन को धन या गहनों के दिखावे का अवसर न बनाएँ।
- स्वच्छता में ढील न दें; पूजा स्थान सुथरा रखें।
- उपवास में हों तो पूजा से पहले भोजन न करें।
- शराब और मांसाहार से दूर रहें।
- पूजा जल्दबाज़ी में न करें; इसे धीरे और ध्यान से करें।
- इस व्रत को समृद्धि की गारंटी न समझें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में घर कलश से सजता है और पूजा से पहले पीला धागा बाँधा जाता है। कर्नाटक में वरमहालक्ष्मी बड़ा पर्व है, जिसमें भव्य सजावट होती है। तमिलनाडु में भी बहुत-से परिवार यह व्रत करते हैं और कोझुकट्टै जैसी विशेष मिठाइयाँ बनाते हैं। कुछ परिवारों में देवी का चाँदी का मुख पीढ़ी दर पीढ़ी चला आता है। उत्तर भारत के शहरों में बसे दक्षिण भारतीय परिवार अपने मंदिरों और समाज-भवनों में सामूहिक पूजा रखते हैं।
आज के समय में
यह व्रत सदा शुक्रवार को पड़ता है, इसलिए अक्सर कामकाजी दिन होता है। कई मंदिरों में शाम को या निकटतम सप्ताहांत पर सामूहिक वरलक्ष्मी पूजा होती है, जिसमें महिलाएँ साथ जाती हैं। घर पर काम से लौटकर भी पूजा शुरू की जा सकती है। नारियल और आम के पत्तों वाला सादा कलश काफ़ी है; आम के पत्ते न हों तो पान के या कोई भी स्वच्छ हरे पत्ते लें। पूजा की दुकानों में इन दिनों पीला धागा, कुमकुम और पान के पत्ते आसानी से मिलते हैं। विदेश में रहने वाले परिवार ये सामान भारतीय दुकानों से ले सकते हैं। फ़्लैट में छोटे दीप सावधानी से जलाएँ।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।