नाग पंचमी
Nag Panchami
श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग देवताओं की पूजा का पर्व, जो प्रकृति, सुरक्षा और मनुष्य तथा साँपों के बीच संतुलन का सम्मान सिखाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| सोमवार, 17 अगस्त 2026 | नाग पंचमी |
| शुक्रवार, 6 अगस्त 2027 | नाग पंचमी |
| बुधवार, 26 जुलाई 2028 | नाग पंचमी |
परिचय
नाग पंचमी नागों की पूजा का पर्व है। अधिकतर क्षेत्रों में यह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष में पड़ने के कारण पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में तिथि एक ही रहती है। गुजरात में, जहाँ अमान्त गणना चलती है, यह पर्व श्रावण कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है, जो उत्तर भारत की गणना में भाद्रपद कृष्ण पंचमी है, यानी लगभग पंद्रह दिन बाद। कुछ अन्य क्षेत्रों में भी कृष्ण पक्ष की पंचमी पर यह पर्व मनाए जाने की बात कही जाती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
वर्षा में साँप बाढ़ में डूबे बिलों से निकलकर मनुष्यों से अधिक मिलने लगते हैं। इन्हीं जीवों के प्रति आदर से यह पर्व विकसित हुआ। वे चूहों का शिकार करके अनाज की रक्षा भी करते हैं। शिव गले में वासुकि को धारण करते हैं, और विष्णु शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं।
महत्व और कथाएँ
कई कथाएँ प्रचलित हैं। एक में भगवान कृष्ण यमुना में कालिया नाग का दमन करके उसे शांति से वहाँ से भेज देते हैं। दूसरी कथा राजा जनमेजय की है, जिन्होंने पिता परीक्षित की साँप के काटने से मृत्यु के बाद सर्पों के नाश के लिए बड़ा यज्ञ किया। ऋषि आस्तीक ने पंचमी के दिन वह यज्ञ रुकवाकर नागों की रक्षा की, इसीलिए यह तिथि पवित्र मानी जाती है।
पूजा में लिए जाने वाले नागों की सूची अलग-अलग मिलती है, पर आम तौर पर अनंत, वासुकि, शेष, कंबल, कर्कोटक, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिय के नाम आते हैं। यह पर्व सब प्राणियों के प्रति आदर की सीख देता है। यह साँपों को नुकसान पहुँचाने या हाथ में पकड़ने का दिन नहीं है।
काशी में जैतपुरा के प्राचीन नाग कुएँ (कर्कोटक नागेश्वर) पर इस दिन मेला लगता है। बताया जाता है कि कुआँ साल में एक बार इसी दिन के लिए खोला जाता है, और लोक मान्यता है कि महर्षि पतंजलि ने यहाँ तप किया था।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और घर के सामने की जगह साफ़ करें।
- दीवार, पट्टे या थाली पर साँप का चित्र बनाएँ या प्रतिमा रखें। बहुत से परिवार मिट्टी, हल्दी के लेप या चाँदी की आकृति लेते हैं।
- नागों की पूजा का संकल्प लें और चित्र पर दूध, चावल, हल्दी, रोली, फूल और दीप अर्पित करें।
- नागों के नाम या "ॐ नमः शिवाय" जैसे मंत्र का जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- नाग पंचमी की कथा पढ़ें या सुनें।
- लावा (खील), गुड़ या मिठाई का भोग लगाएँ।
- शिव या नाग मंदिर जाएँ, और जहाँ रीति हो वहाँ बाँबी के पास पूजा करें।
- प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
पूजन सामग्री
- साँप का चित्र, मिट्टी या चाँदी की आकृति
- दूध, शहद, जल, चावल और लावा (खील)
- हल्दी, रोली, चन्दन, फूल, बेलपत्र और दूर्वा
- धूप, दीपक, कपूर और मिठाई
व्रत और भोजन
बहुत से भक्त पूजा पूरी होने तक उपवास रखते हैं और फिर सादा शाकाहारी भोजन करते हैं। एक रीति है कि इस दिन लोहे के औज़ार से काटना, तलना या ज़मीन खोदना नहीं चाहिए, इसलिए कई परिवार पहले से बना या ठंडा भोजन करते हैं। रीतियाँ अलग-अलग हैं। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, गर्भवती स्त्रियों और दवा लेने वालों को उपवास उतना ही रखना चाहिए जितना उनके चिकित्सक उचित समझें।
क्या करें
- आदरभाव और स्पष्ट संकल्प के साथ चित्र की पूजा करें।
- दूध कटोरे में चित्र के सामने रखें, किसी जीवित साँप को न पिलाएँ।
- बच्चों को बताएँ कि साँप पर्यावरण के लिए क्यों ज़रूरी हैं।
- हो सके तो साँपों को बचाने वाली संस्था की मदद करें।
- शिव या नाग देवता के मंदिर जाएँ।
- घर साफ़ रखें, दीपक जलाएँ और प्रसाद बाँटें।
क्या न करें
- किसी साँप को मारें, फँसाएँ या छेड़ें नहीं।
- जीवित साँप को दूध न पिलाएँ, इससे उसे नुकसान होता है।
- परिवार में रीति हो तो इस दिन लोहे के औज़ार से मिट्टी न खोदें और सब्ज़ी न काटें।
- साँपों के बारे में डरावनी बातें न फैलाएँ, और नशा न करें।
- साँप को खुद न पकड़ें। भारत में साँप पकड़कर उनका प्रदर्शन कराना क़ानूनन अपराध है; घर में साँप निकले तो वन विभाग या प्रशिक्षित बचावकर्ता को बुलाएँ।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर भारत में दीवार या देहरी पर गोबर या लेप से साँप बनाए जाते हैं, और दूध तथा लावा चढ़ाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में इसी दिन गुड़िया का पर्व भी होता है, जिसमें बहनें कपड़े की गुड़िया बनाती हैं, भाई उसे डंडे से पीटते हैं, और कहीं-कहीं मेला तथा दंगल लगता है। मिथिला में नवविवाहिताएँ सावन में विषहरी की पूजा के साथ मधुश्रावणी मनाती हैं।
महाराष्ट्र में स्त्रियाँ बाँबी की पूजा करती हैं और गीत गाती हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु में बाँबी और नागराज मंदिरों में दूध चढ़ाया जाता है। केरल में नाग-पूजा का केंद्र सर्प-कावु नामक पवित्र वन-खंड हैं, जहाँ पूजा प्रायः आयिल्यम जैसे अन्य दिनों में होती है। बंगाल और ओडिशा में देवी मनसा की पूजा होती है। रीतियाँ बहुत अलग-अलग हैं।
आज के समय में
पूजा के लिए न जीवित साँप की ज़रूरत है, न बाँबी की। साँप का चित्र या चाँदी की आकृति, दूध का एक छोटा कटोरा और दीपक से घर पर पूरी पूजा हो जाती है। लावा और गुड़ आसानी से मिल जाते हैं। पूजा के बाद दूध को प्रसाद की तरह घर में उपयोग कर लें, बाहर किसी जानवर के लिए न रखें। बरसात में सोसाइटी या घर में साँप दिखे तो शांत रहें, दूरी बनाए रखें और बचावकर्ता को बुलाएँ। विदेश में रहने वाले परिवार भी खुले में वन्यजीवों के लिए दूध या भोजन न रखें, यह उनके लिए हानिकारक है और स्थानीय नियमों के विरुद्ध हो सकता है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।