महाशिवरात्रि
Maha Shivaratri
शिव की महान रात्रि, जिसमें फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को उपवास, रात्रि जागरण और निशीथ काल में शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| रविवार, 15 फ़रवरी 2026 | महाशिवरात्रि |
| शनिवार, 6 मार्च 2027 | महाशिवरात्रि |
| बुधवार, 23 फ़रवरी 2028 | महाशिवरात्रि |
परिचय
महाशिवरात्रि शिवभक्तों के लिए वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण रात है। उत्तर भारत की पूर्णिमान्त गणना में यह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्षिण भारत की अमान्त गणना में यही रात माघ कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है। दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है।
हर महीने कृष्ण चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि आती है, पर यह उन सबमें बड़ी है। पर्व रात्रि का है, इसलिए मुख्य नियम निशीथ काल का है, यानी अर्धरात्रि का वह समय जब चतुर्दशी हो। रात कभी दो दिनों में बँट जाती है, इसलिए अपने शहर का समय पंचांग में देख लें।
महत्व और कथाएँ
इस रात के बारे में कई कथाएँ हैं। एक के अनुसार यह शिव और पार्वती के विवाह की रात है। दूसरी के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के बड़प्पन का विवाद सुलझाने के लिए शिव इसी रात अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ, यानी ज्योतिर्लिंग, के रूप में प्रकट हुए।
तीसरी कथा समुद्र मंथन की है। मंथन से हलाहल विष निकला, जिसे शिव ने संसार की रक्षा के लिए पीकर कंठ में रोक लिया। कंठ नीला पड़ गया, इसीलिए वे नीलकंठ कहलाए। भक्त इस निःस्वार्थ कर्म को रात भर की प्रार्थना से याद करते हैं।
एक शिकारी की कथा भी है। अलग-अलग कथाओं में उसका नाम लुब्धक या गुरुद्रुह मिलता है। वह रात भर भूखा-प्यासा बेल के पेड़ पर जागता रहा और अनजाने में बेलपत्र नीचे के शिवलिंग पर गिराता रहा, और उसे शिव की कृपा मिली। कथा सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा पूर्णता से अधिक मायने रखती है। अनेक लोगों के लिए यह रात ध्यान और भीतर की शांति की भी है।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करें और व्रत तथा जागरण का संकल्प लें। शाम को रात की पूजा से पहले फिर स्नान करें।
- स्वच्छ ऊँचे स्थान पर शिवलिंग या शिव का चित्र रखें। बहुत से लोग रात के चारों प्रहर में, यानी हर तीन घंटे के पहरे में, एक-एक पूजा करते हैं।
- हर प्रहर में शिवलिंग को जल से स्नान कराएँ, फिर परंपरा हो तो दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें, और अंत में फिर जल चढ़ाएँ।
- बेलपत्र, सफ़ेद फूल, चन्दन या भस्म चढ़ाएँ और साथ में "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- दीप और धूप जलाएँ, और परंपरा हो तो फल-मिठाई का भोग लगाएँ।
- रात भर भजन, ग्रंथ-पाठ, रुद्राष्टाध्यायी या ध्यान के साथ जागें। सबसे मुख्य पूजा निशीथ काल में करें।
- भोर में स्नान करके अंतिम प्रार्थना करें और पंचांग में दिए पारण के समय के भीतर प्रसाद से व्रत खोलें।
पूजन सामग्री
- शिवलिंग या शिव का चित्र
- जल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर
- साबुत बेलपत्र, अच्छा हो कि तीन पत्तियों वाले
- सफ़ेद फूल, तथा परंपरा हो तो धतूरा और आक के फूल
- भस्म, चन्दन, फल, मिठाई, दीपक, धूप, कपूर और घंटी
व्रत और भोजन
बहुत से भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं। कुछ केवल जल लेते हैं (निर्जला), और कुछ फलाहार में फल, दूध, साबूदाना, आलू, सेंधा नमक और मखाना खाते हैं। अन्न और साधारण नमक सामान्यतः नहीं खाए जाते। कुछ परिवार केवल शाम की पूजा तक उपवास रखते हैं। व्रत अगली सुबह अंतिम पूजा के बाद सादे भोजन से खोलें।
बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, गर्भवती स्त्रियों और दवा लेने वालों को उपवास उतना ही रखना चाहिए जितना उनके चिकित्सक उचित समझें; वे फल और दूध लेकर हल्का व्रत रख सकते हैं।
क्या करें
- साबुत बेलपत्र एक-एक करके साफ़ और शांत मन से चढ़ाएँ।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार रात भर "ॐ नमः शिवाय" का जप करें।
- चारों पूजा न हो सकें तो हर पूजा छोटी और सच्ची रखें।
- जागरण भजन, शांत ध्यान या शिव पुराण के पाठ के साथ करें।
- अगले दिन किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दें।
क्या न करें
- शिव को तुलसी, केतकी और चम्पा न चढ़ाएँ; बहुत सी परंपराओं में इनका निषेध है, यद्यपि रीतियाँ अलग हो सकती हैं।
- जहाँ परंपरा हल्दी और कुमकुम का निषेध करती है, वहाँ शिवलिंग पर भस्म और चन्दन ही चढ़ाएँ।
- फटे या टूटे बेलपत्र न चढ़ाएँ; अनेक परिवार इन्हें एक दिन पहले चुन लेते हैं।
- जागरण का संकल्प हो तो सोएँ नहीं, पर स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी हो तो आराम कर लें।
- इस दिन झगड़ा, निंदा, शराब या मांसाहार से दूर रहें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
- उत्तर भारत (पूर्णिमान्त): काशी विश्वनाथ में लंबी कतारें लगती हैं और शहर में शिव की बारात निकलती है। झारखंड के देवघर में बाबा वैद्यनाथ धाम जैसे शिवालयों में भी बड़ी भीड़ जुटती है। कुछ जगह शिव को भाँग मिली ठंडाई चढ़ाने की परंपरा है, पर यह आवश्यक नहीं।
- गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्षिण भारत (अमान्त): सोमनाथ, त्र्यंबकेश्वर और श्रीशैलम जैसे ज्योतिर्लिंग मंदिरों में विशेष पूजा होती है। दक्षिण में रात भर रुद्रम् का पाठ और हर प्रहर में अभिषेक होता है।
- नेपाल: पशुपतिनाथ में बहुत बड़ा जमावड़ा होता है।
- कश्मीर: कश्मीरी पंडित इसे हेरथ (हर-रात्रि) कहते हैं, जो प्रायः फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को पड़ता है, और वटुक भैरव की पूजा करते हैं।
परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
शिवरात्रि अक्सर कामकाजी रात पर पड़ती है। आप शाम को घर पर छोटी पूजा कर सकते हैं और पास में मंदिर हो तो निशीथ काल की पूजा में शामिल हो सकते हैं। फ्लैट में छोटा शिवलिंग थाली में रखें और नीचे कटोरा रखें ताकि अभिषेक का जल इकट्ठा हो जाए, फिर उसे नाली की जगह पौधे में डाल दें। बेलपत्र मंदिर या फूल वाले से एक दिन पहले ले आएँ, जप धीमे स्वर में करें, और घी के दीपक तथा कपूर पर्दों से दूर रखें। विदेश में रहने वाले परिवार मंदिर का चारों प्रहर की पूजा का कार्यक्रम पहले से देख लें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।