प्रदोष व्रत

Pradosh Vrat

प्रदोष व्रत त्रयोदशी को शिव-पार्वती के लिए रखा जाता है, जिसमें सूर्यास्त के समय की संध्या में पूजा होती है और यह हर चन्द्र मास में दो बार आता है।

देवता: शिव, पार्वतीअवधि: एक संध्याऋतु: हर महीने दो बारअन्य नाम: प्रदोषम, त्रयोदशी व्रत

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तारीख़पर्व या अवसर
शुक्रवार, 6 नवंबर 2026प्रदोष व्रत
रविवार, 22 नवंबर 2026प्रदोष व्रत
रविवार, 6 दिसंबर 2026प्रदोष व्रत
सोमवार, 21 दिसंबर 2026प्रदोष व्रत
मंगलवार, 5 जनवरी 2027प्रदोष व्रत
बुधवार, 20 जनवरी 2027प्रदोष व्रत
बुधवार, 3 फ़रवरी 2027प्रदोष व्रत
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2027प्रदोष व्रत
शुक्रवार, 5 मार्च 2027प्रदोष व्रत
शनिवार, 20 मार्च 2027प्रदोष व्रत
रविवार, 4 अप्रैल 2027प्रदोष व्रत
रविवार, 18 अप्रैल 2027प्रदोष व्रत

परिचय

प्रदोष का अर्थ है रात्रि से पहले की संध्या, यानी सूर्यास्त के आसपास का वह समय जब दिन ढलकर शाम में बदलता है। प्रदोष व्रत शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की त्रयोदशी को रखा जाता है, उस दिन जब त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में मिले। इस तरह यह वर्ष में लगभग 24 बार आता है।

यह व्रत शिव और पार्वती को समर्पित है। उत्तर भारत में इसे प्रदोष व्रत कहते हैं और दक्षिण भारत में प्रदोषम; शिव मंदिरों में इसका विशेष आयोजन होता है। प्रदोष काल की अवधि अलग-अलग पंचांगों में अलग गिनी जाती है: कुछ सूर्यास्त के आसपास का लगभग डेढ़ घंटा लेते हैं, तो कुछ सूर्यास्त के बाद के लगभग ढाई घंटे (तीन मुहूर्त, यानी 2 घंटे 24 मिनट) तक का समय। इस पंचांग में आपके नगर का समय दिखाया जाता है।

महत्व और कथाएँ

परंपरा कहती है कि संध्या की इस बेला में शिव विशेष प्रसन्न रहते हैं और आनंद में नृत्य करते हैं, जबकि देवता उनके दर्शन के लिए एकत्र होते हैं। इसी कारण त्रयोदशी की संध्या को शिव मंदिर जाना या घर पर छोटी पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है।

बहुत-से परिवार घर की शांति, स्वास्थ्य और बच्चों के कल्याण के लिए यह व्रत रखते हैं। ये परंपरागत कामनाएँ हैं, कोई गारंटी नहीं।

वार के अनुसार विशेष प्रदोष

जिस वार को प्रदोष पड़ता है, उससे उसका नाम और परंपरा में एक विशेष भाव जुड़ जाता है:

  • सोम प्रदोष (सोमवार): मन की शांति के लिए विशेष माना जाता है।
  • भौम प्रदोष (मंगलवार): परंपरा में ऋण और कष्टों से राहत से जुड़ा है।
  • शनि प्रदोष (शनिवार): शनि के प्रभाव से जुड़ा और शिव पूजा के लिए विशेष महत्व का माना जाता है; संतान की कामना वाले भी इसे रखते हैं।

ये बातें परंपरा से आई हैं और सांत्वना के रूप में कही जाती हैं, वचन के रूप में नहीं।

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान करके प्रदोष व्रत का संकल्प लें।
  2. दिन हल्के भोजन या फल पर रहें, वाणी शांत रखें और शिव नाम का जप करें।
  3. प्रदोष काल शुरू होने से कुछ पहले फिर स्नान करें, या हाथ-पैर धो लें।
  4. शिवलिंग या शिव-पार्वती, गणेश और नंदी का चित्र स्थापित करें।
  5. प्रदोष काल में जल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें, फिर शुद्ध जल से।
  6. बेलपत्र, सफ़ेद फूल, धूप और दीप चढ़ाएँ। "ॐ नमः शिवाय" का जप करें और शिव स्तुति या प्रदोष कथा पढ़ें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  7. आरती करें, प्रसाद बाँटें और पूजा के बाद सादा भोजन करके व्रत खोलें।

पूजन सामग्री

  • शिवलिंग या शिव-पार्वती का चित्र
  • जल, दूध, दही, शहद, घी
  • बेलपत्र, सफ़ेद फूल; परंपरा हो तो धतूरा या आक का फूल
  • धूप, दीप, कपूर
  • चंदन और भस्म
  • फल और सादी मिठाई

व्रत और भोजन

अधिकतर लोग दिन में केवल फल और दूध लेते हैं और संध्या की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं। कुछ लोग पूजा होने तक कठोर उपवास रखते हैं, और कुछ एक बार अनाज-रहित भोजन करते हैं। जितना सहजता से निभ सके, उतना चुनें। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, दवा लेने वाले और गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएँ उपवास उतना ही रखें जितना डॉक्टर की सलाह से ठीक हो; हल्का व्रत भी मान्य है।

क्या करें

  • अपने नगर का प्रदोष काल देखें और उससे पहले तैयार रहें।
  • पूजा सरल और सच्ची रखें।
  • पास में शिव मंदिर हो तो संध्या को दर्शन करें।
  • शुद्ध जल और बेलपत्र श्रद्धा से चढ़ाएँ।
  • व्रत के बाद किसी को भोजन कराएँ या थोड़ा दान दें।
  • दिन में शांत मन से शिव नाम जपें।

क्या न करें

  • पूर्ण उपवास रखें तो पूजा से पहले ठोस भोजन न करें।
  • शिव पूजा में तुलसी न चढ़ाएँ।
  • शिवलिंग पर हल्दी और कुमकुम न लगाएँ।
  • दिन भर बहस और क्रोध से बचें।
  • अस्वस्थ हों तो कठोर उपवास न रखें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

तमिलनाडु और कर्नाटक में प्रदोषम पर मंदिरों में विशेष अभिषेक और नंदी पूजा होती है, और शनि प्रदोषम पर बड़ी भीड़ जुटती है। उत्तर भारत में, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित, इसे प्रदोष व्रत कहते हैं और घरों में प्रदोष कथा पढ़ी-सुनी जाती है। काशी जैसे शिवनगरों में लोग संध्या को अपने मोहल्ले के शिवालय में दर्शन करने जाते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास पड़ता है, इसलिए कामकाजी दिन पर पूजा घर लौटकर करनी पड़ सकती है। अपने नगर का समय पंचांग में देख लें, क्योंकि वह ऋतु के साथ बदलता है। घर के अभिषेक के लिए छोटा शिवलिंग, एक थाली और थोड़ा दूध-जल पर्याप्त है; अभिषेक का जल इकट्ठा करके बाद में किसी पौधे में डाल दें। जिनके पास मंदिर नहीं है, वे घर पर दीप और बेलपत्र से पूजा कर सकते हैं। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर का सूर्यास्त देखकर पूजा करें; कई मंदिर पास के सप्ताहांत पर संध्या को प्रदोष पूजा रखते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।