अमावस्या

Amavasya (New Moon Day)

अमावस्या चन्द्रमा के लुप्त होने की तिथि है, जो पितरों के स्मरण, दान, प्रार्थना और शांत मन से बिताने के लिए मानी जाती है।

देवता: पितर, विष्णु, शिव, लक्ष्मीअवधि: एक दिनऋतु: हर मासअन्य नाम: अमावस, दर्श

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तारीख़पर्व या अवसर
सोमवार, 9 नवंबर 2026कार्तिक अमावस्या
मंगलवार, 8 दिसंबर 2026मार्गशीर्ष अमावस्या
गुरुवार, 7 जनवरी 2027पौष अमावस्या
शनिवार, 6 फ़रवरी 2027माघ अमावस्या
सोमवार, 8 मार्च 2027फाल्गुन अमावस्या
मंगलवार, 6 अप्रैल 2027चैत्र अमावस्या
गुरुवार, 6 मई 2027वैशाख अमावस्या
शुक्रवार, 4 जून 2027ज्येष्ठ अमावस्या
रविवार, 4 जुलाई 2027आषाढ़ अमावस्या
सोमवार, 2 अगस्त 2027श्रावण अमावस्या
मंगलवार, 31 अगस्त 2027भाद्रपद अमावस्या
गुरुवार, 30 सितंबर 2027आश्विन अमावस्या

परिचय

अमावस्या 30वीं तिथि है, जब चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। यह कृष्ण पक्ष को पूरा करती है और इसके बाद शुक्ल पक्ष का आरंभ होता है। यह हर चान्द्र मास में एक बार आती है। मास के नाम यहाँ पूर्णिमान्त गणना के अनुसार दिए गए हैं; जहाँ अमान्त नाम अलग है, वहाँ वह भी बताया गया है।

बहुत से परिवारों के लिए यह दिन पितरों के स्मरण, दान और शांत प्रार्थना का होता है।

महत्व और कथाएँ

अमावस्या को बहुत पुराने समय से पितरों के विशेष स्मरण का दिन माना गया है। उनके नाम से जल, भोजन और प्रार्थना अर्पित की जाती है। श्राद्ध और तर्पण की विधि का विस्तार पितरों से जुड़े पन्नों में दिया गया है।

कुछ लोग अमावस्या को अशुभ कहते हैं। असल में बात इतनी है कि इस दिन नए कार्य और उत्सव प्रायः आरंभ नहीं किए जाते, क्योंकि इसे भीतर की साधना का दिन माना जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूजा वर्जित है। उपासना की कई प्रमुख रात्रियाँ अमावस्या के आसपास ही पड़ती हैं, जैसे कार्तिक अमावस्या (अमान्त में आश्विन) पर दीपावली का लक्ष्मी पूजन, और शिव तथा देवी की मासिक उपासना। भय परंपरा का भाग नहीं है, और जो लोग सामान्य जीवन जीते हैं, उन्हें किसी हानि की चेतावनी परंपरा में नहीं दी गई है।

प्रमुख अमावस्याएँ

  • सोमवती अमावस्या सोमवार को पड़ती है। यह शिव पूजा और पवित्र स्नान के लिए शुभ मानी जाती है। कुछ परिवारों में स्त्रियाँ इस दिन पीपल की परिक्रमा करती हैं।
  • मौनी अमावस्या पूर्णिमान्त गणना के माघ मास की अमावस्या है (अमान्त में पौष)। इस दिन मौन रखकर स्नान और दान किया जाता है। प्रयागराज में यह प्रमुख स्नान पर्व है।
  • शनि अमावस्या शनिवार को पड़ती है। बहुत से लोग सरसों के तेल का दीप जलाते हैं और शनि या हनुमान मंदिर जाते हैं।
  • भौमवती अमावस्या मंगलवार को पड़ती है। इस दिन हनुमान जी की उपासना प्रचलित है।
  • सर्वपितृ अमावस्या पूर्णिमान्त गणना की आश्विन अमावस्या है (अमान्त में भाद्रपद)। यह पितृ पक्ष की समाप्ति पर आती है और सभी पितरों के लिए श्राद्ध का मुख्य दिन है।
  • दीपावली की अमावस्या कार्तिक (पूर्णिमान्त; अमान्त में आश्विन) की अमावस्या है, जो लक्ष्मी पूजन की रात्रि है।

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान करें, संभव हो तो गंगा या किसी नदी में; नहीं तो घर पर पवित्र नदियों का स्मरण करके स्नान करें।
  2. अपने इष्टदेव के सामने दीप जलाएँ। पितरों का चित्र रखा हो तो उसके सामने भी दीप जलाएँ।
  3. परिवार की रीति हो तो पुरोहित की सलाह से पितरों के नाम पर तिल मिले जल से तर्पण करें।
  4. सादा भोजन बनाएँ, उसका एक भाग पितरों के लिए अर्पित करें, फिर किसी अतिथि, ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ।
  5. अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
  6. कुछ समय जप या शांत पाठ में बिताएँ।

पूजन सामग्री

  • दीप, धूप और फूल
  • जल और काले तिल (तर्पण के लिए)
  • चावल और भोग के लिए सादा भोजन
  • दान के लिए अनाज, वस्त्र या फल

व्रत और भोजन

बहुत से लोग हल्का उपवास रखते हैं या सादा सात्त्विक शाकाहारी भोजन करते हैं। जो परिवार श्राद्ध करते हैं, वे प्याज़ और लहसुन के बिना भोजन बनाते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।

बीमार लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग उपवास अपने चिकित्सक की सलाह से ही रखें और हल्का नियम लें।

क्या करें

  • दीप जलाकर और प्रार्थना करके पितरों को याद करें।
  • किसी ज़रूरतमंद को भोजन या धन दें।
  • घर को शांत और स्वच्छ रखें।
  • जप, ग्रंथ-पाठ या मौन में कुछ समय बिताएँ।
  • भोजन सादा और शाकाहारी रखें।
  • किसी बुज़ुर्ग की सहायता करें।

क्या न करें

  • इस दिन से डरें नहीं।
  • यदि आपकी परंपरा टालती है तो बड़े उत्सव या नए बड़े कार्य इस दिन आरंभ न करें।
  • व्रत का पालन कर रहे हों तो मांस और मदिरा से दूर रहें।
  • झगड़ा न करें और कठोर शब्द न बोलें।
  • परिवार की रीति में हो तो इस दिन बाल न कटवाएँ और नाखून न काटें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

उत्तर प्रदेश और बिहार में अमावस्या पर गंगा या अन्य नदियों में स्नान और दान बहुत प्रचलित है। विशेषकर मौनी और सोमवती अमावस्या पर काशी, प्रयागराज और हरिद्वार के घाटों पर बहुत भीड़ रहती है। ओडिशा में भी नदी-स्नान का चलन है। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में अमावस्या का संबंध पितरों के स्मरण और मंदिर की पूजा से गहरा है। बंगाल में दीपावली की अमावस्या (पूर्णिमान्त का कार्तिक) पर काली पूजा होती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

कार्य-दिवस पर भी अमावस्या को शांति से निभाया जा सकता है। सुबह एक दीप, पितरों के लिए छोटी प्रार्थना और दिन में किसी मंदिर की रसोई या ज़रूरतमंद को दान पर्याप्त है।

तर्पण घर में एक छोटे बर्तन में जल और तिल लेकर किया जा सकता है, और बाद में वह जल किसी पौधे में डाला जा सकता है। नदी पास न हो तो घर पर ही पवित्र नदियों का स्मरण करके स्नान कर लें। अपने शहर के लिए अमावस्या तिथि का समय पंचांग में देख लें, क्योंकि कभी-कभी तिथि दो दिन तक फैल जाती है। विदेश में रहने वाले परिवार भी इसी तरह घर पर यह दिन निभा सकते हैं।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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