होलिका दहन

Holika Dahan

फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को भद्रा रहित काल में जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि, जो अहंकार पर श्रद्धा की विजय की याद दिलाती है।

देवता: भगवान विष्णु (नृसिंह), भक्त प्रह्लाद, अग्नि देवअवधि: एक संध्याऋतु: शीत ऋतु का अंत और वसंत का आरंभअन्य नाम: छोटी होली, होलिका दीपक, कामदहन, सम्मत जलाना

वाराणसी के लिए दिखाया गया; पृष्ठ के ऊपर से अपना शहर चुनें।

तारीख़पर्व या अवसर
मंगलवार, 3 मार्च 2026होलिका दहन
शनिवार, 20 मार्च 2027होलिका दहन
गुरुवार, 9 मार्च 2028होलिका दहन

परिचय

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि है। अगले दिन रंगों की होली होती है। दोनों मिलकर सर्दी की विदाई और वसंत के आगमन का उत्सव हैं। फाल्गुन पूर्णिमा का नाम पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों गणनाओं में एक ही है।

इसका समय दो बातों से तय होता है। अग्नि सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में जलाई जाती है, जब पूर्णिमा तिथि हो। साथ ही भद्रा का समय बचाया जाता है, जो नए शुभ कार्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता। भद्रा संध्या को घेर ले, तो उसके बीतने के बाद अग्नि जलाई जाती है, और कुछ वर्षों में सही समय देर रात तक खिसक जाता है। भद्रा आधी रात के बाद तक रहे, तो समय पुरोहित से पूछकर तय करें। जिस दिन सूर्यास्त के बाद पूर्णिमा रहती है, वही दहन का दिन है। अपने शहर के लिए गणना किया गया समय देख लें।

महत्व और कथाएँ

सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु-भक्त बालक प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकशिपु की है, जो चाहता था कि सब उसी की पूजा करें। प्रह्लाद ने विष्णु का नाम लेना नहीं छोड़ा, तो राजा ने उसे कई बार मारने का प्रयास किया। उसकी बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठी, पर प्रह्लाद अपनी भक्ति के कारण बच गया और होलिका जल गई। बाद में विष्णु नृसिंह रूप में प्रकट हुए और राजा के अत्याचार का अंत किया।

यह अग्नि अहंकार, द्वेष और नकारात्मकता के जलने तथा सच्ची श्रद्धा की रक्षा की प्रतीक है। बिहार के पूर्णिया ज़िले (बनमनखी) में सिकलीगढ़ को लोक मान्यता में इस कथा का स्थान माना जाता है। दक्षिण भारत के कुछ भागों में यही रात शिव द्वारा कामदेव के भस्म होने की याद दिलाती है, जिसे कामदहन कहते हैं। यह रबी की फ़सल का भी उत्सव है: नए अन्न की बालियाँ या हरे चने की डालियाँ अग्नि में भूनी जाती हैं, और "होला" शब्द का संबंध इसी से बताया जाता है।

पूजा विधि

  1. दिन भर मोहल्ले के लोग लकड़ी, सूखी टहनियाँ और गोबर के उपले किसी तय खुली जगह पर इकट्ठा करते हैं। बीच में प्रह्लाद के प्रतीक के रूप में एक डाली गाड़ी जाती है, और कई स्थानों पर होलिका का पुतला भी रखा जाता है।
  2. सूर्यास्त के बाद भद्रा बीतने पर स्नान करें और साफ़ कपड़े पहनें। पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें।
  3. संकल्प लें और ढेर का पूजन करें: जल, रोली, अक्षत, फूल, हल्दी, कच्चा सूत, गुड़ और नारियल अर्पित करें।
  4. कच्चे सूत को ढेर के चारों ओर प्रायः तीन या सात बार, घड़ी की दिशा में लपेटें।
  5. अग्नि पुरोहित या कोई बुज़ुर्ग प्रज्वलित करें। सुरक्षा और सद्भाव की प्रार्थना करें।
  6. भुना अनाज, नारियल, तिल या चना अग्नि में अर्पित करें और परिक्रमा करते हुए स्वास्थ्य व शांति की कामना करें।
  7. अगली सुबह कई परिवार ठंडी राख थोड़ी-सी घर ले जाते हैं। कुछ स्थानों पर उसका तिलक लगाने की रीति है।

पूजन सामग्री

  • लकड़ी, सूखी टहनियाँ और जहाँ चलन हो वहाँ गोबर के उपले
  • कच्चा सूत और लोटे में जल
  • रोली, अक्षत, हल्दी और फूल
  • गुड़, नारियल और नया अन्न (गेहूँ या जौ की बालियाँ, चना)
  • तिल, बताशे, मिठाई, दीप और धूप

व्रत और भोजन

उपवास आवश्यक नहीं है, पर कुछ परिवार दिन भर व्रत रखकर अग्नि के बाद खाते हैं। गुझिया और मालपुआ होली के लिए बनते हैं, पर कुछ घरों में होलिका पूजन से पहले खाए नहीं जाते। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास तभी रखें जब चिकित्सक अनुमति दें।

क्या करें

  • अग्नि जलाने से पहले अपने स्थान के लिए मुहूर्त और भद्रा का समय देख लें।
  • केवल सूखी लकड़ी और प्राकृतिक चीज़ें इस्तेमाल करें।
  • पास में पानी की बाल्टी या नली रखें और हर समय कोई वयस्क निगरानी रखे।
  • बच्चों और दर्शकों को अग्नि से दूर रखें, और ढीले कपड़ों को लपटों से बचाएँ।
  • सुरक्षा, साहस और अहंकार के जलने की प्रार्थना करें।
  • जाने से पहले यह सुनिश्चित करें कि अग्नि पूरी तरह बुझ गई है, फिर सफ़ाई करें और ठंडी राख का निपटान ज़िम्मेदारी से करें।

क्या न करें

  • हरे पेड़ न काटें और सार्वजनिक संपत्ति से लकड़ी न उठाएँ।
  • प्लास्टिक, टायर, रंगी हुई लकड़ी या कूड़ा न जलाएँ।
  • पेट्रोल, मिट्टी का तेल या अन्य ज्वलनशील पदार्थ न डालें।
  • सड़क पर, बिजली के तारों या ट्रांसफ़ॉर्मर के पास अग्नि न जलाएँ।
  • अग्नि को अकेला न छोड़ें और अंगारे गर्म हों तब तक न जाएँ।
  • तेज़ हवा में अग्नि न जलाएँ।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • उत्तर भारत: हर मोहल्ले में सामूहिक होलिका, होलिका का पुतला और प्रह्लाद की डाली। कई घरों की स्त्रियाँ गोबर के उपलों की मालाएँ चढ़ाती हैं।
  • बिहार और पूर्वांचल: कई स्थानों पर इसे सम्मत जलाना कहते हैं।
  • गुजरात और महाराष्ट्र: होलिका दहन या शिमगा, जिसमें स्त्रियाँ होलिका पूजन करती हैं और अग्नि के चारों ओर गीत गाती हैं।
  • दक्षिण भारत: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कामदहन।
  • बंगाल और ओडिशा: दोल जात्रा से पहले की शाम अलाव जलाया जाता है। स्थानीय नाम अलग-अलग हैं।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

आज बहुत से शहरों में खुली आग के नियम हैं, और फ़्लैट की छत या बालकनी में अग्नि जलाना ख़तरनाक है। अपनी सोसायटी या मोहल्ले की सामूहिक होलिका में शामिल होना सबसे सुरक्षित तरीक़ा है, जहाँ जगह तय हो और अग्निशमन का इंतज़ाम हो। हर गली में अलग ढेर जलाने से बेहतर है कि कम लकड़ी में एक छोटी सामूहिक होलिका रखी जाए।

अग्नि जलाना संभव न हो तो घर के मंदिर में दीप जलाकर प्रह्लाद की कथा पढ़ना और सादी प्रार्थना करना पूरी तरह स्वीकार्य है। विदेश में रहने वाले परिवार स्थानीय नियम और अनुमति देखकर ही मंदिर या सामुदायिक आयोजन में भाग लें, और खुले में अपनी ओर से अग्नि न जलाएँ। भद्रा का समय पहले देख लें और मेहमानों को सही शुरुआत का समय बता दें।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

कोई तिथि न चूकें

इस पर्व और अपने चुने हुए अन्य पर्वों से पहले, आपके शहर के अनुसार, ईमेल पाएँ।

रिमाइंडर पाएँ