होली

Holi

होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाने वाला रंगों का वसंत पर्व, जो उल्लास, मेल-मिलाप और पुराने झगड़े भुलाने का अवसर है।

देवता: श्रीकृष्ण, राधा, भगवान विष्णुअवधि: एक से दो दिन, पहले दिन की संध्या को होलिका दहनऋतु: वसंत ऋतुअन्य नाम: रंगवाली होली, धुलेंडी, फगुआ, दोल जात्रा, फगवा

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तारीख़पर्व या अवसर
बुधवार, 4 मार्च 2026होली (रंगवाली होली)
रविवार, 21 मार्च 2027होली (रंगवाली होली)
शुक्रवार, 10 मार्च 2028होली (रंगवाली होली)

परिचय

होली रंगों का पर्व है, जो होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है। यह फाल्गुन पूर्णिमा के अगले दिन पड़ती है, जिसे पूर्णिमान्त पंचांग में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा कहते हैं और अमान्त पंचांग में फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा। इसकी तिथि चन्द्रमा के अनुसार चलती है और हर साल बदलती है, इसलिए अपने शहर की गणना की हुई तिथि देख लें।

यह पर्व वसंत का स्वागत करता है और दोस्तों से मिलने, पुराने झगड़े भुलाने और रंग खेलने का दिन है। बहुत से क्षेत्रों में होलिका की आग के अगले दिन सुबह रंग खेला जाता है, इसीलिए इसे धुलेंडी भी कहते हैं, यानी धूल और रंग का दिन।

महत्व और कथाएँ

होली का नाता उस कथा से है जो होलिका दहन पर कही जाती है, जिसमें विष्णु-भक्त प्रह्लाद होलिका की अग्नि से सुरक्षित बच गए। होली अहंकार पर अच्छाई की जीत के बाद का आनंदमय दिन है।

ब्रज में होली का संबंध कृष्ण और राधा से भी जोड़ा जाता है। प्रसिद्ध लोककथा है कि साँवले कृष्ण को चिंता थी कि राधा गोरी हैं, तब माता यशोदा ने कहा कि वे राधा के मुख पर जिस रंग से चाहें रंग लगा दें। रंग खेलने की यही चंचल शुरुआत मानी जाती है। बरसाना, नंदगाँव और वृन्दावन अपनी लठमार और फूलों की होली के लिए प्रसिद्ध हैं।

काशी में फाल्गुन शुक्ल एकादशी, यानी रंगभरी एकादशी, से होली का रंग चढ़ने लगता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव विवाह के बाद माता पार्वती को पहली बार काशी लाए और गणों व भक्तों ने गुलाल से उनका स्वागत किया। बंगाल और ओडिशा में यह पर्व दोल जात्रा कहलाता है, जिसमें राधा-कृष्ण के लिए झूले सजाए जाते हैं। कुछ परंपराओं में होली शिव और कामदेव की कथा की भी याद दिलाती है।

पूजा विधि

  1. पिछली शाम होलिका दहन में शामिल हों, या सादी प्रार्थना कर लें।
  2. होली की सुबह स्नान करें, पुराने या सफ़ेद कपड़े पहनें जिन पर रंग चढ़ सके, और श्रीकृष्ण, विष्णु या अपने कुलदेवता को प्रणाम करें।
  3. सबसे पहले थोड़ा गुलाल देवता के चरणों में अर्पित करें और आशीर्वाद माँगें।
  4. बड़ों के माथे पर रंग का हल्का तिलक लगाएँ और उनके चरण छुएँ।
  5. परिवार और मित्रों को उनकी सहमति से रंग लगाएँ और "होली की शुभकामनाएँ" कहकर गले मिलें।
  6. गुझिया, मालपुआ, दही-भल्ले और ठंडाई बाँटें और साथ बैठकर खाएँ।
  7. शाम को नहाकर साफ़ कपड़े पहनें और मित्रों तथा बड़ों से मिलने जाएँ।

पूजन सामग्री

  • कई रंगों का गुलाल, अच्छा हो कि प्राकृतिक या हर्बल हो
  • देवता के लिए फूल, तुलसी, दीप और धूप
  • लोटे में जल और भोग के लिए मिठाई
  • गुझिया, मालपुआ, पूरन पोली या अन्य मिठाइयाँ
  • पिचकारी और खेलने के लिए पुराने कपड़े
  • ठंडाई की सामग्री: दूध, बादाम, सौंफ और इलायची

व्रत और भोजन

होली में उपवास नहीं होता, यह भोज का दिन है। इस दिन गुझिया (खोए से भरी मिठाई), मालपुआ, दही-भल्ले, काँजी, पूरन पोली, मठरी और ठंडाई बनती हैं। बिहार और पूर्वांचल में पुआ, दही-बड़ा और कचौड़ी की धूम रहती है। उत्तर भारत में ठंडाई में कभी भाँग भी मिलाई जाती है। भाँग नशीली है और हर किसी की परंपरा का हिस्सा नहीं है। इससे बचना ही बेहतर है, ख़ासकर बच्चों, बीमारों और गाड़ी चलाने वालों के लिए। किसी को भाँग या शराब के लिए मजबूर न करें।

क्या करें

  • रंग लगाने से पहले पूछ लें और किसी के "ना" का सम्मान करें।
  • प्राकृतिक, त्वचा के लिए सुरक्षित, खाने योग्य या हर्बल रंगों का उपयोग करें।
  • खेलने से पहले त्वचा और बालों में तेल लगा लें, और आँखों की सुरक्षा का ध्यान रखें।
  • रंग को पालतू जानवरों और अपनी आँख, कान, मुँह से दूर रखें, और पानी ख़ूब पिएँ।
  • गले मिलें और क्षमा करें। इस दिन को पुराने झगड़े ख़त्म करने का मौक़ा बनाएँ।
  • खेलने के बाद सफ़ाई करें ताकि रंग पड़ोसियों की दीवारों और गलियों में दाग़ न छोड़ें।

क्या न करें

  • जो रंग नहीं लगवाना चाहते, उन पर या अजनबियों और राहगीरों पर रंग न फेंकें।
  • रासायनिक रंग, पक्का पेंट, इंजन का तेल, चमक या कीचड़ का प्रयोग न करें।
  • पानी के गुब्बारे या कठोर वस्तुएँ न फेंकें, और नशा करके गाड़ी न चलाएँ।
  • त्योहार की आड़ में किसी को छेड़ें नहीं, अपमानित न करें और अनुचित स्पर्श न करें।
  • सार्वजनिक संपत्ति, गाड़ियों या दूसरों के घरों पर रंग न पोतें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • ब्रज: बरसाना और नंदगाँव की लठमार होली, वृन्दावन की फूलों की होली, और कई दिन पहले शुरू होने वाले उत्सव।
  • काशी: रंगभरी एकादशी से शुरुआत। इसके अगले दिन मणिकर्णिका घाट पर शिवभक्त और साधु चिता-भस्म से मसान की होली खेलते हैं, जो काशी की अपनी परंपरा है।
  • बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश: फगुआ के गीत, ढोलक-झाँझ की संगत और पुआ-पकवान।
  • कुमाऊँ: बैठकी होली, यानी रागों पर बैठकर गायन, और खड़ी होली, जिसमें लोग खड़े होकर गाते-नाचते हैं।
  • पंजाब: आनंदपुर साहिब में सिख परंपरा का होला मोहल्ला, जिसमें शस्त्र-कौशल के प्रदर्शन होते हैं।
  • बंगाल और ओडिशा: दोल जात्रा या वसंत उत्सव, सफ़ेद वस्त्र, अबीर और देवताओं के झूले; शांतिनिकेतन का वसंत उत्सव प्रसिद्ध है।
  • महाराष्ट्र और गुजरात: शिमगा, और कुछ दिन बाद रंग पंचमी।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

शहर की सोसायटियों में होली अक्सर साझा मैदान या छत पर खेली जाती है। रंग खेलने से पहले सोसायटी के नियम और पड़ोसियों की सुविधा का ध्यान रखें। हर्बल या सूखा गुलाल लें, जो त्वचा और पानी, दोनों के लिए अच्छा है। जिन्हें एलर्जी, दमा या संवेदनशील त्वचा की शिकायत हो, उन्हें अपनी गति से शामिल होने दें। दफ़्तर या कॉलेज में रंग खेलना ऐच्छिक रखें।

विदेश में रहने वाले परिवार अक्सर पास के सप्ताहांत पर होली रखते हैं। ठंडे मौसम में कार्यक्रम किसी हॉल या मंदिर परिसर में हो सकता है। जगह चुनने से पहले प्रबंधक से पूछ लें कि रंग की अनुमति है या नहीं, और फ़ोटो सहमति से लें। सुरक्षा और सहमति उतनी ही ज़रूरी है जितना उल्लास।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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