नृसिंह जयंती
Narasimha Jayanti
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए संध्या के समय विष्णु के नृसिंह रूप में प्रकट होने की स्मृति का व्रत।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| गुरुवार, 30 अप्रैल 2026 | नृसिंह जयंती |
| मंगलवार, 18 मई 2027 | नृसिंह जयंती |
| रविवार, 7 मई 2028 | नृसिंह जयंती |
परिचय
नृसिंह जयंती भगवान विष्णु के चौथे अवतार नृसिंह के प्राकट्य का दिन है, जिनका रूप आधा मनुष्य और आधा सिंह है। यह वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है; शुक्ल पक्ष में होने से महीने का नाम पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पद्धतियों में एक ही रहता है।
कथा के अनुसार नृसिंह संध्या के समय प्रकट हुए थे, इसलिए मुख्य पूजा सायंकाल में होती है, उस दिन जब सूर्यास्त के समय चतुर्दशी तिथि हो। व्रत दिन भर रखा जाता है। आपके नगर का पूजा-समय पंचांग में दिया गया है। यह पर्व श्रीवैष्णव और माध्व संप्रदायों में तथा आंध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के अनेक मंदिरों में विशेष भाव से मनाया जाता है।
महत्व और कथाएँ
यह कथा भागवत पुराण में मिलती है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने वरदान पाया था कि उसे न मनुष्य मारे, न पशु; न घर के भीतर, न बाहर; न दिन में, न रात में; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र से। अहंकार में वह स्वयं को ईश्वर मानकर पूजा करवाना चाहता था।
उसका छोटा पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था और उसने पिता की बात नहीं मानी। कष्ट देने के अनेक प्रयास विफल हुए, तो राजा ने व्यंग्य से पूछा कि क्या तुम्हारा विष्णु इस खंभे में भी है। तब उसी खंभे से नृसिंह प्रकट हुए। संध्या की बेला में, देहली पर, हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में रखकर उन्होंने नखों से उसका अंत किया। वरदान की हर शर्त बनी रही। होलिका दहन का प्रसंग भी इसी कथा से जुड़ा है।
कथा सिखाती है कि आस्था भक्त की रक्षा करती है, अहंकार का अंत होता है और ईश्वर अप्रत्याशित रूप में भी सामने आ सकते हैं। नृसिंह भय हरने वाले रक्षक माने जाते हैं; उनका उग्र रूप भक्त के लिए कोमल है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। दिन सादा और शांत रखें।
- दिन भर नृसिंह का नाम-स्मरण करें या प्रह्लाद की कथा पढ़ें-सुनें।
- सायंकाल सूर्यास्त से पहले फिर स्नान करें और लक्ष्मी-नृसिंह या विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
- तुलसी, फूल, चंदन और फल चढ़ाएँ। पानक (गुड़, अदरक और इलायची का शरबत) जैसी ठंडी चीज़ें अर्पित करें, क्योंकि नृसिंह का रूप उग्र माना जाता है और यह ग्रीष्म का आरंभ है। दीप-धूप जलाएँ।
- नृसिंह कवच या लक्ष्मी नृसिंह करावलम्ब स्तोत्र का पाठ करें, अथवा मंत्र की पहली पंक्ति जपें: "ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्"। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- प्राकट्य के समय, यानी संध्या को, आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- पूजा के बाद पारण करें; परिवार की रीति से वह उसी रात या अगली सुबह होता है।
पूजन सामग्री
- नृसिंह या लक्ष्मी-नृसिंह की मूर्ति अथवा चित्र
- तुलसी दल, फूल, चंदन, रोली
- पानक, ठंडे पेय, फल, गुड़, दही-भात
- नारियल, पान, मेवे
- दीपक, धूप, कपूर
व्रत और भोजन
बहुत-से लोग पूरे दिन उपवास रखकर संध्या की पूजा के बाद पारण करते हैं; कुछ दिन में फल, दूध और जल लेते हैं। ग्रीष्म और नृसिंह के उग्र रूप को देखते हुए पानक, छाछ, दही-भात और फल जैसी ठंडी चीज़ें चढ़ाई और खाई जाती हैं। व्रत में अनाज, प्याज और लहसुन नहीं लिया जाता। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, दवा लेने वाले और गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएँ उपवास उतना ही रखें जितना डॉक्टर की सलाह से ठीक हो; हल्का व्रत भी मान्य है।
क्या करें
- मुख्य पूजा संध्या के समय करें, जब नृसिंह प्रकट हुए थे।
- बच्चों को प्रह्लाद की कथा सुनाएँ।
- नृसिंह को पानक या ठंडा पेय अर्पित करें और सबके साथ बाँटें।
- शांत मन से नृसिंह मंत्र का जप करें।
- ज़रूरतमंदों को जल, भोजन या वस्त्र का दान दें।
- पूजा पूरी होने के बाद ही पारण करें।
क्या न करें
- देवता के पास भय के भाव से न जाएँ; नृसिंह भक्त के रक्षक हैं।
- व्रत रखें तो अनाज, प्याज और लहसुन न खाएँ।
- कठोर वाणी और क्रोध से बचें, क्योंकि यह पर्व अहंकार पर विजय का है।
- बासी या अशुद्ध वस्तुएँ न चढ़ाएँ।
- पूजा में जल्दबाज़ी न करें।
- कथा को किसी के प्रति द्वेष का कारण न बनाएँ।
क्षेत्रीय परंपराएँ
- बिहार: पूर्णिया ज़िले के बनमनखी क्षेत्र में सिकलीगढ़ धरहरा का नृसिंह मंदिर और माणिक्य स्तंभ है। स्थानीय मान्यता है कि नृसिंह इसी खंभे से प्रकट हुए थे।
- उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य भाग: विष्णु मंदिरों में सायं आरती, विष्णु सहस्रनाम और कथा।
- आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: सिंहाचलम, यादाद्रि और अहोबिलम में विशेष अभिषेक।
- कर्नाटक और तमिलनाडु: मेलकोटे और शोलिंगुर में विशेष पूजा; पानक सामान्य प्रसाद है।
- वैष्णव और इस्कॉन परिवार: संध्या तक उपवास, फिर कीर्तन और प्रह्लाद की कथा।
परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
पूजा संध्या को होती है, इसलिए नौकरी करने वाले परिवारों के लिए यह सुविधाजनक है। दिन में जितना संभव हो उपवास रखें और पानक पहले से तैयार कर लें। छोटी मूर्ति या चित्र और एक दीपक भी पर्याप्त है। फ़्लैट में कपूर और धूप का धुआँ कम रखें। चाहें तो पास के विष्णु मंदिर की सायं आरती में जाएँ। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर के सूर्यास्त के अनुसार पूजा का समय देखें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।