बंगाली पंचांग
बंगाब्द का सौर पंचांग: बोइशाख से चोइत्रो तक बारह महीने, वर्ष-संख्या, पोइला बोइशाख और विक्रम संवत् से अंतर।
यह कैसा पंचांग है
बंगाली पड़ोसियों या रिश्तेदारों का पंचांग बंगाब्द (बांग्ला साल) है। यह सौर पंचांग पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, बांग्लादेश और दुनिया भर के बंगाली परिवारों में चलता है। सूर्य के नई राशि में जाने पर नया मास लगता है। पहला मास बोइशाख मेष संक्रांति के आसपास शुरू होता है।
इसके दो रूप हैं। पश्चिम बंगाल की परंपरागत पंजिका (पंचांग-पुस्तिका) सूर्य की वास्तविक स्थिति से मास गिनती है, इसलिए मास का आरंभ किसी वर्ष एक दिन आगे-पीछे हो सकता है। बांग्लादेश ने नागरिक कामकाज के लिए संशोधित रूप अपनाया, जिसमें मास की लंबाई और नववर्ष का दिन तय है। दोनों में वर्ष-संख्या और मास-नाम समान हैं।
संवत् और वर्ष-संख्या
पोइला बोइशाख के बाद ईसवी वर्ष में 593 घटाने पर बंगाब्द मिलता है। ईसवी वर्ष के आरंभ से नववर्ष तक 594 घटाएँ। वर्ष पोइला बोइशाख को बदलता है, ईसवी नववर्ष पर नहीं। संवत् की उत्पत्ति पर मतभेद है। कुछ लोग इसे अकबर के राजस्व-वर्ष सुधार से जोड़ते हैं, कुछ प्राचीन बंगाल के राजा शशांक से।
बारह महीने
| क्रम | बंगाली मास | सूर्य किस राशि में |
|---|---|---|
| 1 | बोइशाख (वैशाख) | मेष |
| 2 | जोइष्ठो (ज्येष्ठ) | वृषभ |
| 3 | आषाढ़ | मिथुन |
| 4 | श्रावण | कर्क |
| 5 | भाद्र | सिंह |
| 6 | आश्विन | कन्या |
| 7 | कार्तिक | तुला |
| 8 | अग्रहायण | वृश्चिक |
| 9 | पौष | धनु |
| 10 | माघ | मकर |
| 11 | फाल्गुन | कुंभ |
| 12 | चोइत्रो (चैत्र) | मीन |
बांग्लादेश के संशोधित पंचांग में आरंभ के पाँच मास 31 दिन के थे। कुछ वर्ष पहले हुए एक और संशोधन के बाद बोइशाख से आश्विन तक छह मास 31 दिन के हैं और बाक़ी अधिकतर 30 दिन के (फाल्गुन 29 दिन का, अधिवर्ष में 30 का); ब्योरों में स्रोत थोड़े अलग हैं। पश्चिम बंगाल में मास की लंबाई सूर्य की गति से तय होती है।
नववर्ष और पर्व
पोइला बोइशाख (बांग्लादेश में पोहेला बोइशाख) बोइशाख का पहला दिन है: नए कपड़े, विशेष भोजन, मेले और दुकानों में नए बही-खाते (हालखाता) का दिन। बांग्लादेश में यह ईसवी कैलेंडर की एक तय तारीख़ पर पड़ता है। चान्द्र पर्व भी रखे जाते हैं, अमान्त मासों के अनुसार। सौर मासों के अपने चिह्न ये हैं:
- चोइत्रो संक्रांति: वर्ष का अंतिम दिन, जिस दिन अनेक स्थानों पर चरक या गाजन होता है, जो शिव का ग्रामीण उत्सव है।
- पौष संक्रांति: फसल का पर्व, पीठे और पुली जैसी चावल की मिठाइयों के साथ।
- नबान्न: अग्रहायण में नए चावल का उत्सव।
- दुर्गा पूजा: आश्विन में, शारदीय नवरात्र के दिनों में; बंगाल का सबसे बड़ा पर्व।
- काली पूजा: दीपावली की अमावस्या की रात।
दिन की गणना
पंजिका में दिन सूर्योदय से गिना जाता है। राशि-प्रवेश मध्यरात्रि या सूर्योदय के पास हो, तो नियम तय करते हैं कि मास की पहली तारीख़ किस दिन गिनी जाए। इसी से दो पंचांगों में मास का आरंभ अगल-बगल के दिनों पर दिख सकता है।
मुख्य पंचांग से अंतर
- बंगाली मास सौर हैं और राशि-प्रवेश से शुरू होते हैं, जबकि विक्रम संवत् के मास चन्द्रमा से चलते हैं।
- संवत् अलग है: बंगाब्द ईसवी वर्ष से 593 या 594 कम है, विक्रम संवत् 56 या 57 अधिक।
- नववर्ष मेष संक्रांति का सौर पर्व है, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नहीं।
धार्मिक पंचांग फिर भी चन्द्रमा पर चलता है। दुर्गा पूजा, काली पूजा और सरस्वती पूजा प्रायः उन्हीं तिथियों पर पड़ती हैं जो मुख्य पंचांग में हैं, इसलिए इनके लिए मुख्य पंचांग देखा जा सकता है। बंगाल की पंजिका के अपने नियमों से कभी एक दिन का अंतर हो सकता है, तब पंजिका की बात मानें।