पितृ पक्ष: पितरों का पखवाड़ा
पितृ पक्ष क्या है, किस पितर का श्राद्ध किस तिथि को करें, मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या जैसे विशेष दिन, और परंपरा में क्या वर्जित माना जाता है।
पितृ पक्ष क्या है
पितृ पक्ष कृष्ण पक्ष का वह पखवाड़ा है जो पितरों के स्मरण के लिए है; इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहते हैं। परिवार हर पितर की मृत्यु-तिथि पर तर्पण या पूर्ण श्राद्ध करते हैं।
पखवाड़ा एक ही है, पर महीने का नाम पद्धति से बदलता है:
- अमान्त पद्धति में (पश्चिम और दक्षिण भारत के अधिकांश भाग) यह भाद्रपद का कृष्ण पक्ष है।
- पूर्णिमान्त पद्धति में (उत्तर भारत के अधिकांश भाग) यही आश्विन का कृष्ण पक्ष कहलाता है।
यह भाद्रपद पूर्णिमा के अगले दिन प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक चलता है। उसके अगले दिन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र का समय शुरू होता है। बहुत से परिवार पूर्णिमा जोड़कर सोलह दिन गिनते हैं, इसलिए पूर्णिमा भी श्राद्ध का दिन है। तिथि घटने या बढ़ने पर दिनों की गिनती एक-आध दिन बदल सकती है।
एक प्रचलित कथा
एक लोक-कथा कहती है कि दानवीर कर्ण को परलोक में केवल सोना मिला, क्योंकि उन्होंने पूर्वजों के नाम पर कभी अन्न दान नहीं किया था। उन्हें एक पखवाड़े के लिए लौटकर अन्न और जल अर्पित करने दिया गया। यह कथा सभी ग्रंथों में एक-सी नहीं मिलती और इसके रूप अलग-अलग हैं; इसे इन दिनों में अन्न, जल और दान के महत्व को समझाने वाली कथा के रूप में कहा जाता है।
किसके लिए कौन सी तिथि
सामान्य नियम सरल है: पितर का निधन जिस तिथि को हुआ, उसी तिथि को इस पखवाड़े में श्राद्ध करें। निधन शुक्ल पंचमी को हुआ हो या कृष्ण पंचमी को, श्राद्ध पितृ पक्ष की कृष्ण पंचमी को होगा; मास और पक्ष नहीं गिने जाते।
कुछ पंचांगों में विशेष तिथियाँ ये हैं। रीतियाँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हैं; इसे मार्गदर्शक मानें और संदेह हो तो पुरोहित से पूछें।
| तिथि | प्रायः किनके लिए |
|---|---|
| पूर्णिमा | जिनका निधन पूर्णिमा को हुआ। |
| प्रतिपदा से दशमी | उस तिथि के पितर। कई पंचांगों में प्रतिपदा को नाना-नानी का श्राद्ध भी बताया गया है, विशेषकर जब उनकी तिथि पता न हो। |
| नवमी | मातृ नवमी: माताएँ और वे विवाहित स्त्रियाँ जिनका निधन पति के जीवित रहते हुआ। कुछ क्षेत्रों में इसे अविधवा नवमी कहते हैं (अविधवा यानी वह स्त्री जो पति के जीवित रहते संसार से गई)। |
| एकादशी, द्वादशी | उन तिथियों के पितर। बहुत से पंचांगों में द्वादशी संन्यास लेने वालों के लिए भी है; इसमें परंपराएँ अलग हैं, इसलिए संन्यासी पितर के लिए अपने कुल पुरोहित से पूछें। |
| त्रयोदशी | उस तिथि के पितर। कुछ परिवार इसे छोटी आयु में गए बच्चों के लिए भी मानते हैं। |
| चतुर्दशी | अकाल या हिंसक मृत्यु (दुर्घटना, शस्त्र, युद्ध, आत्महत्या, अचानक आपदा) वालों के लिए, तिथि कोई भी हो। कहीं इसे घात या घायल चतुर्दशी कहते हैं। |
| अमावस्या | सर्वपितृ अमावस्या: सभी पितर, और वे भी जिनकी तिथि पता नहीं या छूट गई। |
कुछ पंचांग चतुर्दशी के स्वाभाविक निधन वालों का श्राद्ध अमावस्या को कराते हैं, ताकि चतुर्दशी अकाल मृत्यु के लिए रहे। यह क्षेत्रीय मत है, सार्वभौमिक नियम नहीं।
मातामह श्राद्ध (नाना का श्राद्ध, जो प्रायः दौहित्र यानी बेटी का बेटा करता है) कई परंपराओं में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, यानी पितृ पक्ष के अगले दिन, किया जाता है। इसका दिन भी परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलता है; पुरोहित से पूछ लें।
विशेष दिन
- भरणी। पितृ पक्ष में अपराह्न में भरणी नक्षत्र हो तो कुछ पंचांगों में महाभरणी श्राद्ध बताया जाता है; भरणी के स्वामी मृत्यु के देवता यम हैं। यह पितृ पक्ष के आरंभिक दिनों में पड़ता है, पर किस तिथि को पड़ेगा यह हर वर्ष बदलता है, इसलिए पंचांग में देखें। रखना है या नहीं, यह परिवार की रीति पर है।
- सर्वपितृ अमावस्या। अंतिम दिन, जब सभी पितरों को एक साथ याद किया जाता है। कहीं शाम को पितरों के लिए दीप जलाते हैं। यही दिन महालय अमावस्या है, और बंगाल में इसी दिन से दुर्गा उत्सव के समय का आरंभ माना जाता है।
दिन का सही समय
श्राद्ध परंपरा से दिन के उत्तरार्ध में, अपराह्न में किया जाता है (दिन के पाँच भागों में चौथा)। पंचांगों में श्राद्ध आरंभ करने के लिए सबसे उत्तम समय कुतप काल और रौहिण मुहूर्त बताए जाते हैं, जो दिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ और नौवाँ हैं और मध्याह्न के आसपास पड़ते हैं। इन्हें अपराह्न से कैसे जोड़ा जाए, इसमें पंचांगों और पुरोहितों के बीच थोड़ा अंतर है। केवल तर्पण प्रायः सुबह स्नान के बाद किया जाता है।
तिथि दिन में बदलती है, इसलिए सामान्यतः वह दिन चुनें जिसके अपराह्न में तिथि हो, चाहे सूर्योदय की तिथि कोई भी हो। अधिकतर पर्वों में सूर्योदय की तिथि मानी जाती है, पर श्राद्ध में यह अलग है। यदि तिथि दोनों दिन अपराह्न को छूती हो, या किसी दिन न छूती हो, तो कोई एक सर्वमान्य नियम नहीं है; पंचांग और पुरोहित अलग-अलग नियम लगाते हैं, इसलिए दिन अपने कुल पुरोहित से पक्का करा लें। अपने शहर का कुतप काल और अपराह्न पंचांग में देखें। भोर से पहले और देर शाम को पितृ कर्म प्रायः नहीं किए जाते।
परंपरा में क्या टाला जाता है
ये दिन शांत स्मरण के माने जाते हैं, उत्सव के नहीं। बहुत से परिवार, विशेषकर उत्तर और पश्चिम में, इस पखवाड़े में वाहन, मकान या सोना खरीदना, विवाह और गृह प्रवेश जैसी नई शुरुआतें नहीं करते। यह रीति है, कोई धमकी नहीं, और परिवारों में बहुत अंतर है; कोई आयोजन टल न सके तो बड़ों से पूछ लें। भोजन सादा सात्विक, बिना प्याज-लहसुन का, रखा जाता है; बहुत से परिवार श्राद्ध के भोजन में मसूर की दाल नहीं रखते।
क्या करें
- हर पितर की मृत्यु-तिथि पहले से लिख लें और अपने शहर के अनुसार दिन पक्का करें।
- स्नान करके स्वच्छ, हो सके तो सफ़ेद या सादे, वस्त्र पहनें।
- दक्षिण की ओर मुँह करके जल और काले तिल से तर्पण करें।
- सादा भोजन बनाएँ, एक भाग पितरों को अर्पित करें, फिर सब साथ खाएँ।
- पितरों के नाम पर पुरोहित या ज़रूरतमंद को भोजन या राशन दें, और गाय, पक्षी, कुत्ते या कौओं को खिलाएँ।
- बच्चों को पितर की कथाएँ सुनाएँ।
क्या न करें
- श्राद्ध के दिन घर में झगड़ा न करें, और पितरों के भोजन में मांस, मदिरा, प्याज या लहसुन न रखें।
- अर्पण से पहले स्वयं न खाएँ। बच्चे, बुज़ुर्ग, रोगी, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल उतना ही करें जितना उनके चिकित्सक अनुमति दें।
- लोहे के पात्र न लें। ताँबा, पीतल, पत्तल या मिट्टी परंपरागत हैं; स्टील पर परंपराएँ अलग हैं।
- कर्म शाम या रात में शुरू न करें, और द्वार पर आए अतिथि या भोजन माँगने वाले को न लौटाएँ।
- कोई चूक हो जाए तो चिंता न करें; भावना और आदर सबसे महत्वपूर्ण हैं।
आज के समय में
तिथि कामकाजी दिन पड़े तो बहुत से लोग सुबह संक्षिप्त तर्पण करते हैं और भोजन का अर्पण दोपहर में, आधे दिन की छुट्टी लेकर करते हैं। देर शाम के लिए पुरोहित से पूछ लें। फ्लैट में छोटा दीप और कम धुआँ रखें। विदेश में रहने वाले अपने शहर के पंचांग से तिथि और कुतप काल देखें। अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।