वट सावित्री व्रत
Vat Savitri Vrat
सुहागिन महिलाओं का व्रत, जो सावित्री की स्मृति में वट वृक्ष के नीचे पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से रखा जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शनिवार, 16 मई 2026 | वट सावित्री व्रत |
| शुक्रवार, 4 जून 2027 | वट सावित्री व्रत |
| बुधवार, 24 मई 2028 | वट सावित्री व्रत |
परिचय
वट सावित्री व्रत उपवास और प्रार्थना का दिन है, जिसे मुख्यतः विवाहित महिलाएँ पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख की कामना से रखती हैं। इस दिन का केंद्र वट यानी बरगद का वृक्ष है, और कथा सावित्री की है, जिन्हें निष्ठा, बुद्धि और साहस के लिए याद किया जाता है।
तिथि इस पर निर्भर है कि आपका परिवार कौन सा पंचांग मानता है। उत्तर भारत के पूर्णिमान्त पंचांग में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को होता है; इसी अमावस्या पर शनि जयंती भी पड़ती है, इसलिए दोनों प्रायः एक ही दिन आते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ भागों में, जहाँ अमान्त पंचांग चलता है, यह ज्येष्ठ पूर्णिमा को होता है और वट पूर्णिमा कहलाता है। इसलिए दोनों व्रत लगभग एक पखवाड़े के अंतर पर पड़ते हैं। अमान्त गणना में उत्तर भारत की अमावस्या वैशाख कृष्ण पक्ष की होती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
महत्व और कथाएँ
कथा महाभारत से आती है। राजकुमारी सावित्री ने सत्यवान को पति चुना, यद्यपि नारद मुनि ने चेताया था कि वे केवल एक वर्ष जीवित रहेंगे। निश्चित दिन सत्यवान लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े। यमराज उनके प्राण लेने आए तो सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं। उनकी बुद्धिमानी और दृढ़ता से यमराज प्रसन्न हुए और कई वर दिए। सावित्री ने अंतिम वर इस तरह माँगा कि वह तभी पूरा हो सकता था जब सत्यवान को जीवन लौटा दिया जाए।
बरगद को दीर्घायु और फैली जड़ों-शाखाओं के कारण परिवार के स्थायी बंधन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि उसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास है। कुछ कथाओं में सत्यवान बरगद के नीचे ही जीवित हुए।
पूजा विधि
- सुबह जल्दी स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। अनेक महिलाएँ लाल, पीले या हरे वस्त्र और चूड़ियाँ, सिंदूर जैसे सुहाग के शृंगार करती हैं।
- पति और परिवार के कल्याण के लिए व्रत का संकल्प लें।
- वट वृक्ष के पास जाएँ। वहाँ न पहुँच सकें तो घर पर सावित्री-सत्यवान का छोटा चित्र या मिट्टी की प्रतिमा रखें।
- वृक्ष की जड़ के पास सफ़ाई करके जल चढ़ाएँ और हल्दी, रोली तथा अक्षत लगाएँ।
- फूल, फल, भीगे हुए चने और दीप अर्पित करें, धूप जलाएँ।
- वृक्ष के तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करें; प्रायः सात बार या 108 बार। संख्या परिवार की रीति से अलग होती है।
- सावित्री और सत्यवान की कथा सुनें या पढ़ें।
- फल और मिठाई चढ़ाएँ, फिर बड़ों का आशीर्वाद लें। कई महिलाएँ किसी सुहागिन या पुरोहित को छोटा उपहार भी देती हैं।
- पूजा के बाद परिवार की रीति से पारण करें, प्रायः फल और फिर सादा भोजन।
पूजन सामग्री
- सावित्री और सत्यवान के चित्र या मिट्टी की प्रतिमाएँ; परिवार की रीति हो तो यमराज की भी।
- कच्चा सूत।
- लोटे में जल, चावल, हल्दी और रोली।
- फूल, धूप, घी या तेल का दीप।
- भीगे हुए साबुत चने, मौसमी फल (आम प्रचलित है) और मिठाई।
- सुहाग सामग्री: चूड़ियाँ, सिंदूर और छोटा दर्पण; कुछ रीतियों में बाँस का पंखा।
व्रत और भोजन
अनेक महिलाएँ दिन भर उपवास रखती हैं, कुछ निर्जल, कुछ केवल फल और पानी पर, और कुछ पूजा के बाद एक समय भोजन करती हैं। आंशिक या फलाहारी उपवास भी उतना ही मान्य है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें। पारण प्रायः भीगे चने, फल और प्याज-लहसुन रहित सादे शाकाहारी भोजन से होता है।
क्या करें
- शांत मन और सच्चे संकल्प से व्रत रखें, कठोरता के लिए नहीं।
- सावित्री की कथा छोटों को सुनाएँ।
- स्वच्छ, पारंपरिक वस्त्र पहनें और निर्धारित समय पर पूजा पूरी करें।
- बरगद उपलब्ध हो तो उसे जल और देखभाल दें।
- प्रसाद बाँटें, और सेहत के लिए ज़रूरी हो तो पानी या फल का रस लें।
क्या न करें
- पत्ते तोड़ने के लिए बरगद की शाखाएँ न तोड़ें।
- यदि आपकी परंपरा मना करती है तो उपवास में अन्न, नमक या मांसाहार न लें।
- अस्वस्थ हों तो पूरा उपवास रखने के दबाव में न आएँ।
- कथा न छोड़ें; वही इस दिन का हृदय है।
- झगड़े और कठोर वाणी से बचें।
- चढ़ावे में प्लास्टिक या न गलने वाली चीज़ें न रखें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
महाराष्ट्र और गुजरात में यह वट पूर्णिमा है, जहाँ महिलाएँ मिलकर वृक्ष पर सूत लपेटती हैं, अक्सर मंदिर के पास के वट उपवन में। उत्तर प्रदेश और बिहार में अमावस्या की तिथि मानी जाती है और वृक्षों के नीचे सामूहिक पूजा होती है। मिथिला में इसे बरसाइत कहते हैं; कई परिवारों में नवविवाहिता की पहली बरसाइत विशेष उत्साह से मनाई जाती है, और मायके से पूजा की सामग्री तथा उपहार भेजे जाते हैं। ओडिशा के कुछ भागों में यह सावित्री व्रत कहलाता है और उसकी अपनी रीतियाँ हैं। चढ़ावा, फेरों की संख्या और गीत हर घर में अलग होते हैं।
आज के समय में
शहरों में बरगद कॉलोनी, मंदिर या पार्क में मिल जाता है, इसलिए पूजा की थाली लेकर वहीं जाएँ। पेड़ तक पहुँचना कठिन हो तो घर पर चित्र रखें, या साफ़ तख़्ते पर वृक्ष का चित्र बनाकर उसकी परिक्रमा करें। कामकाजी दिन हो तो पूजा सुबह जल्दी या शाम को कर लें। चने रात भर भिगो दें; कच्चा सूत, हल्दी और रोली पूजा की दुकान पर मिल जाते हैं। विदेश में बरगद दुर्लभ है, इसलिए चित्र या मंदिर के प्रतीकात्मक वट का उपयोग करें। फ़्लैट में दीप और धूप सुरक्षित ढंग से रखें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।