नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
Naraka Chaturdashi (Choti Diwali)
दीपावली का दूसरा दिन, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी: भोर में तेल-उबटन से स्नान, संध्या को दीपदान और नरकासुर पर कृष्ण की विजय की स्मृति।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| शनिवार, 7 नवंबर 2026 | काली चौदस |
| रविवार, 8 नवंबर 2026 | नरक चतुर्दशी |
| बुधवार, 27 अक्टूबर 2027 | काली चौदस |
| गुरुवार, 28 अक्टूबर 2027 | नरक चतुर्दशी |
| सोमवार, 16 अक्टूबर 2028 | काली चौदस |
| मंगलवार, 17 अक्टूबर 2028 | नरक चतुर्दशी |
परिचय
नरक चतुर्दशी दीपावली के पाँच दिनों में दूसरा दिन है। यह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है, यानी अमावस्या से एक दिन पहले। उत्तर भारत की पूर्णिमान्त पद्धति में, जहाँ महीना पूर्णिमा पर पूरा होता है, यह कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण की अमान्त पद्धति में, जहाँ महीना अमावस्या पर पूरा होता है, यही दिन आश्विन कृष्ण चतुर्दशी कहलाता है। दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे छोटी दिवाली कहते हैं; राजस्थान में रूप चौदस और गुजरात में काली चौदस। मुख्य लक्ष्मी पूजा इसके अगले दिन, अमावस्या पर होती है। इस दिन का मुख्य कर्म अभ्यंग स्नान है: सूर्योदय से पहले, जब तक चतुर्दशी तिथि रहे, तेल लगाकर उबटन से नहाना। कुछ परंपराएँ इस स्नान का समय अरुणोदय से गिनती हैं। इस पंचांग में आपके नगर का स्नान-समय दिखाया जाता है।
महत्व और कथाएँ
नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुर (आज का असम क्षेत्र) का राजा था और उसने हज़ारों कन्याओं को बंदी बना रखा था। वैष्णव कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध किया। कहते हैं कि अंत समय में नरकासुर ने वर माँगा कि उसकी मृत्यु का दिन शोक में नहीं, दीपों और आनंद में याद किया जाए। इसी से इस दिन दीप जलते हैं।
तेल-स्नान को आलस्य और नकारात्मक विचारों को धो देने का प्रतीक माना जाता है। कुछ परंपराओं में यमराज के नाम का दीप जलाया जाता है; मान्यता है कि इससे मृत्यु का भय दूर होता है। यह परंपरागत विश्वास है।
गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में चतुर्दशी की रात काली चौदस कहलाती है, जब माँ काली की उपासना होती है और कुछ लोग हनुमान की भी पूजा करते हैं। यह सांस्कृतिक मान्यता है, सब पर लागू नहीं। बहुत-से परिवार केवल तेल-स्नान और दीप निभाते हैं।
पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले उठें। तिल या सरसों के तेल की मालिश करें, फिर बेसन, हल्दी और दूध या तेल से बना उबटन लगाएँ।
- अपने नगर के लिए बताए गए स्नान मुहूर्त में नहाएँ। कुछ क्षेत्रों में जल में अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनी डालने की रीति है।
- नए या स्वच्छ वस्त्र पहनें और तिलक लगाएँ।
- श्रीकृष्ण या विष्णु का स्मरण करें और फल-मिठाई चढ़ाएँ।
- संध्या को मुख्य द्वार, आँगन, रसोई और तुलसी के पास दीप जलाएँ।
- कई परिवार धनतेरस की तरह यमराज के नाम का एक दीप दक्षिण दिशा में रखते हैं।
- जिन घरों में परंपरा है, वे रात में काली या हनुमान की पूजा करते हैं।
पूजन सामग्री
- तिल या सरसों का तेल; बेसन, हल्दी, दूध
- नए या स्वच्छ वस्त्र
- दीपक, घी या तेल, बाती, फूल, धूप
- परंपरा के अनुसार कृष्ण, विष्णु, काली या हनुमान का चित्र
- मिठाई, फल, अक्षत, रोली
व्रत और भोजन
इस दिन व्रत नहीं होता। स्नान के बाद उत्सव का नाश्ता किया जाता है। उत्तर भारत में पकवान और मिठाइयाँ बनती हैं; महाराष्ट्र में पोहा और फराळ (चिवड़ा, लड्डू, करंजी); दक्षिण में दीपावली मरुंदु, यानी औषधीय जड़ी-बूटियों का लेह, और मिठाइयाँ। भोर में जल्दी उठना और तेल-स्नान बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करें।
क्या करें
- सेहत ठीक हो तो सूर्योदय से पहले तेल-स्नान करें।
- ठंड में तेल और पानी गुनगुना रखें; उबटन हल्के हाथ से लगाएँ।
- संध्या को सुरक्षित जगह पर दीप जलाएँ।
- लक्ष्मी पूजा के लिए घर की सफ़ाई और सजावट पूरी कर लें।
- पड़ोसियों के साथ मिठाई बाँटें।
क्या न करें
- कड़ाके की ठंड में खुले में जल्दबाज़ी से न नहाएँ।
- गर्म तेल को चूल्हे या लौ के पास न रखें।
- दीप पर्दों और कागज़ की झालरों के पास न छोड़ें।
- बच्चों को भूत-प्रेत का डर न दिखाएँ; परंपरा इसकी माँग नहीं करती।
- तंत्र-मंत्र न करें; दिन को सरल भक्ति तक रखें।
- किसी को रात की क्षेत्रीय रीतियाँ मानने के लिए बाध्य न करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर प्रदेश और बिहार के कई घरों में शाम को द्वार पर चौमुखी या यम का दीप जलता है और घर-आँगन दीपों से सजता है। महाराष्ट्र में यह अभ्यंग स्नान का दिन है, यानी दीपावली की उल्लास-भरी पहली सुबह। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में यही दीपावली का मुख्य दिन है, जिसमें भोर में तेल-स्नान, नए वस्त्र, पटाखे और विशेष भोजन होता है। गुजरात में काली चौदस रात को मनाई जाती है। बंगाल में इसे भूत चतुर्दशी कहते हैं, जब चौदह दीप जलाए जाते हैं और चौदह प्रकार के साग खाए जाते हैं; काली पूजा अगली रात अमावस्या को होती है।
कभी-कभी चतुर्दशी और अमावस्या एक ही दिन पड़ जाती हैं या तिथि खिसक जाती है। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
स्नान का समय सूर्योदय से पहले है, इसलिए कामकाजी दिन पर थोड़ा जल्दी उठना पड़ सकता है। तेल की मालिश के बाद गुनगुने पानी से नहाएँ और फिसलन से सावधान रहें। फ़्लैट में दीप बालकनी या थाली में, पर्दों से दूर रखें; चाहें तो बिजली के दीप भी लगाएँ। सुबह समय न मिले, तब भी संध्या के दीप का नियम निभाया जा सकता है। विदेश में रहने वाले परिवार अपने शहर के सूर्योदय के अनुसार स्नान का समय देखें, क्योंकि वहाँ चतुर्दशी दो दिनों में फैल सकती है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।