गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)
Govardhan Puja (Annakut)
गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण को समर्पित पर्व, जिसमें प्रकृति, गौधन और अन्न के प्रति आभार में अन्नकूट का भोग लगता है।
वाराणसी के लिए दिखाया गया; पृष्ठ के ऊपर से अपना शहर चुनें।
| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| मंगलवार, 10 नवंबर 2026 | गोवर्धन पूजा |
| शनिवार, 30 अक्टूबर 2027 | गोवर्धन पूजा |
| बुधवार, 18 अक्टूबर 2028 | गोवर्धन पूजा |
परिचय
गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होती है, यानी कार्तिक के उजले पक्ष के पहले दिन। शुक्ल पक्ष की तिथि होने से पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों पंचांगों में इसका मास एक ही रहता है। यह प्रायः दीपावली की अमावस्या के अगले दिन आती है और पाँच दिन के दीपोत्सव का चौथा दिन मानी जाती है: धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज। तिथि किसी भी घड़ी शुरू या ख़त्म हो सकती है, इसलिए कभी-कभी दिन खिसक जाता है। पूजा का समय प्रातःकाल या सायंकाल बताया जाता है; अपने शहर का पंचांग देख लें।
इस पर्व को अन्नकूट भी कहते हैं। "कूट" का अर्थ ढेर है, यानी अन्न का पहाड़। इस दिन तरह-तरह के पकवानों का ऊँचा ढेर श्रीकृष्ण को भोग लगाया जाता है।
महत्व और कथाएँ
भागवत पुराण के अनुसार, जब कृष्ण बालक थे, तब वृन्दावन के गोप हर साल वर्षा के देवता इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। कृष्ण ने सरलता से पूछा कि जो पर्वत उनकी गायों को घास, जल और आश्रय देता है, उसका सम्मान क्यों न किया जाए। ब्रजवासियों ने अपना भोग गोवर्धन को अर्पित किया।
इससे इन्द्र रुष्ट हुए और उन्होंने मूसलाधार वर्षा कर दी। तब कृष्ण ने अपनी सबसे छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। ब्रजवासी और उनके पशु सात दिन तक उसके नीचे सुरक्षित रहे। अंत में इन्द्र ने अपनी भूल मानी। लोक मान्यता है कि उन सात दिनों में कृष्ण ने कुछ नहीं खाया था, इसलिए आठ पहर के हिसाब से 7 गुणा 8, यानी छप्पन व्यंजनों का भोग लगाया गया। इसी से मंदिरों में छप्पन भोग की रीति चली मानी जाती है। यह पर्वत आज भी मथुरा के पास ब्रज में पूजा जाता है और प्रेम से गिरिराज कहलाता है।
पर्व का संदेश है कि जो भूमि, पशु और अन्न हमारा जीवन चलाते हैं, उनके प्रति कृतज्ञ रहें।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और घर के मंदिर में छोटा दीप जलाएँ।
- आँगन में या किसी पटरे या थाल पर गोवर्धन की आकृति बनाएँ। परंपरा में यह गाय के गोबर से बनती है, कहीं लेटे हुए पुरुष के रूप में, कहीं टीले के रूप में। साफ़ मिट्टी, आटे की लोई या चित्र भी चलता है।
- आकृति को फूलों और मिट्टी के छोटे दीयों से सजाएँ। कुछ घरों में नाभि की जगह रखी कटोरी में दूध, दही, शहद और बताशे डाले जाते हैं।
- सामने दीप, धूप, रोली, अक्षत और फूल रखें। पहले जल, फिर रोली या चंदन, फिर फूल अर्पित करें।
- चारों ओर भोग सजाएँ। परिवार की रीति हो तो हर पकवान पर तुलसी दल रखें।
- श्रीकृष्ण की आरती गाएँ या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" बोलें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
- जगह हो तो आकृति को दाहिनी ओर रखते हुए परिक्रमा करें, फिर भोग को प्रसाद के रूप में बाँटें। कुछ घरों में इस दिन गाय-बैलों को नहलाकर सजाया और खिलाया जाता है।
पूजन सामग्री
- पटरा या थाल, और गोबर, मिट्टी या आटे की लोई
- फूल, तुलसी दल, रोली, हल्दी और अक्षत
- दीप, धूप, कपूर, और पंचामृत के लिए दूध, दही, शहद
- भोग के लिए कई शाकाहारी पकवान: कढ़ी, चावल, पूड़ी, दाल, सब्ज़ियाँ और मिठाइयाँ
- अन्न के ढेर के लिए गेहूँ और गुड़
व्रत और भोजन
गोवर्धन पूजा उपवास का नहीं, भोज का दिन है। भोग पूरी तरह शाकाहारी होता है और अधिकतर परंपराओं में बिना प्याज़ और लहसुन के बनता है। कुछ स्थानों पर कढ़ी के साथ बाजरे की खिचड़ी भी बनती है। कई मंदिरों में दर्जनों या सैकड़ों व्यंजन बनते हैं। भोग के बाद सब मिलकर प्रसाद पाते हैं।
क्या करें
- साफ़ हाथों और शांत मन से भोग तैयार करें और उसे खुले दिल से बाँटें।
- बच्चों को गोवर्धन की छोटी आकृति बनाने में शामिल करें।
- गाय, पक्षियों और कुत्तों के लिए भी कुछ भोजन अलग रखें।
- अन्न उगाने और पकाने वालों को मन में धन्यवाद कहें।
- हो सके तो किसी कृष्ण या वैष्णव मंदिर में अन्नकूट के दर्शन करें।
क्या न करें
- अन्न की बर्बादी न करें, क्योंकि पर्व इसी के प्रति कृतज्ञता का है।
- बासी या पहले से चखा हुआ भोजन भोग में न रखें।
- काम की जल्दी में भोग हड़बड़ी में न चढ़ाएँ। सादी पूजा भी पूर्ण मानी जाती है।
- रीति के ढंग पर बहस न करें। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
- आकृति के पास जलते दीप को अकेला न छोड़ें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
ब्रज में श्रद्धालु लगभग 21 किलोमीटर लंबी गोवर्धन परिक्रमा करते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से गाँवों में आँगन में गोबर से गोवर्धन बनाकर पूरा परिवार पूजा करता है। काशी के अन्नपूर्णा मंदिर में धनतेरस से अन्नकूट तक माँ अन्नपूर्णा की स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन होते हैं, और अन्नकूट के दिन माँ के दरबार में पकवानों का विशाल अन्नकूट सजाया जाता है। राजस्थान में नाथद्वारा का अन्नकूट बहुत बड़ा उत्सव है। महाराष्ट्र में यह दिन बलि प्रतिपदा कहलाता है, जब पत्नियाँ पति की आरती करती हैं और पति उपहार देते हैं। गुजरात में यह बेस्तु वरस, यानी नववर्ष है।
आज के समय में
फ़्लैट में गोबर का गोवर्धन बनाना कठिन हो तो साफ़ मिट्टी या आटे की छोटी आकृति, या गोवर्धन जी का चित्र काफ़ी है। धुएँ या अलार्म की चिंता हो तो बिजली का दीया रखें। तिथि कार्य-दिवस पर पड़े तो काम पर जाने से पहले छोटी पूजा करें और शाम को परिवार के साथ सादा भोग लगाकर भोजन करें।
कई मंदिर और हाउसिंग सोसायटी पास के सप्ताहांत में सामूहिक अन्नकूट रखते हैं, इसलिए समय पहले पूछ लें। विदेश में रहने वाले परिवारों को भी अधिकतर पकवानों की सामग्री भारतीय दुकानों में मिल जाती है।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।