बेस्तु वरस (गुजराती नववर्ष)
Bestu Varas (Gujarati New Year)
बेस्तु वरस गुजराती नववर्ष है, कार्तिकादि विक्रम संवत् का पहला दिन, जो शुभकामनाओं, मंदिर दर्शन और नए बही-खातों के साथ मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| मंगलवार, 10 नवंबर 2026 | गोवर्धन पूजा |
| शनिवार, 30 अक्टूबर 2027 | गोवर्धन पूजा |
| बुधवार, 18 अक्टूबर 2028 | गोवर्धन पूजा |
परिचय
बेस्तु वरस गुजराती नववर्ष है। यह कार्तिकादि विक्रम संवत् का पहला दिन है, जो कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को आता है, यानी गुजरात में दीपावली की मुख्य रात्रि के अगले दिन। "बेस्तु" का अर्थ है आरंभ और "वरस" का अर्थ है वर्ष। गुजराती इसे नूतन वर्ष भी कहते हैं। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का नाम पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों गणनाओं में एक ही है।
महत्व और कथाएँ
अक्सर पूछा जाता है कि उत्तर भारत में नववर्ष वसंत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, फिर गुजरात में वर्ष शरद ऋतु में क्यों बदलता है। दोनों जगह गणना विक्रम संवत् की ही है। अंतर इतना है कि वर्ष की संख्या कहाँ बदलती है।
गुजरात में संख्या कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, दीपावली के तुरंत बाद बदलती है। इसे कार्तिकादि गणना कहते हैं। उत्तर भारत में संख्या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बदलती है, जिसे चैत्रादि गणना कहते हैं। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दीपावली तक गुजराती वर्ष-संख्या उत्तर भारतीय संख्या से एक कम रहती है, और बेस्तु वरस से अगली चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तक दोनों में संख्या एक ही रहती है। कृष्ण पक्ष के मास-नाम भी अलग दिख सकते हैं, क्योंकि उत्तर भारत में अधिकतर महीना पूर्णिमा से पूर्णिमा तक (पूर्णिमान्त) और गुजरात में अमावस्या से अमावस्या तक (अमान्त) गिना जाता है।
नववर्ष दीपावली और चोपड़ा पूजन के बाद आता है। चोपड़ा पूजन दीपावली की रात बही-खातों की पूजा है, जो व्यापारिक वर्ष को पूरा करती है। बेस्तु वरस नया वर्ष खोलता है। परिवार इसे नए पन्ने की तरह देखते हैं: क्षमा करें, फिर से शुरुआत करें और आने वाले वर्ष के लिए आशीर्वाद माँगें।
परंपरा में यही दिन अन्नकूट और गोवर्धन पूजा का भी है। विक्रम संवत् का आरंभ परंपरा में राजा विक्रमादित्य से जोड़ा जाता है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान करें और नए या स्वच्छ वस्त्र पहनें, प्रायः परिवार के सबसे अच्छे कपड़े।
- द्वार पर रंगोली बनाएँ या ताज़ा करें, और दीप तथा तोरण लगे रहने दें।
- घर के देवस्थान में दीप जलाएँ। लक्ष्मी, गणेश और कुल देवता को फूल, कुमकुम, अक्षत और मिठाई अर्पित करें।
- बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लें। संभव हो तो मंदिर जाएँ।
- रिश्तेदारों, पड़ोसियों और मित्रों को शुभकामनाएँ दें। प्रचलित अभिवादन "साल मुबारक" है; इसके उत्तर में भी "साल मुबारक" या "नूतन वर्षाभिनंदन" कहा जाता है।
- व्यापारी परिवार छोटी प्रार्थना के साथ नया बही-खाता (चोपड़ा) शुरू करते हैं, प्रायः पहले पन्ने पर "शुभ", "लाभ" और स्वस्तिक लिखते हैं।
- मिठाई और नमकीन के साथ उत्सव का भोजन साथ बैठकर करें।
पूजन सामग्री
- घी या तेल का दीप, धूप, कपूर
- कुमकुम, हल्दी, अक्षत, फूल
- लक्ष्मी, गणेश और कुल देवता की मूर्ति या चित्र
- नया बही-खाता या डायरी और क़लम
- भोग के लिए मिठाई, फल, सूखे मेवे
- रंगोली के रंग या फूलों की पंखुड़ियाँ
व्रत और भोजन
इस दिन उपवास नहीं होता। परिवार उत्सव का शाकाहारी भोजन बनाते हैं, जिसमें मोहनथाल या श्रीखंड जैसी मिठाइयाँ, घूघरा और मठरी जैसे नमकीन और फरसाण होते हैं। यही दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का भी है, इसलिए बहुत से घरों में परिवार के भोजन से पहले अनेक व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
क्या करें
- दिन की शुरुआत शांत दीप और छोटी प्रार्थना से करें।
- बड़ों से मिलकर या फ़ोन पर "साल मुबारक" कहें और प्रणाम करें।
- छोटे मनमुटाव सुलझाएँ और नए वर्ष से पहले क्षमा माँग लें।
- नई डायरी या व्यापार के बही-खाते की शुरुआत सरल प्रार्थना से करें।
- मंदिर या घर के देवस्थान में दर्शन करें और प्रसाद बाँटें।
क्या न करें
- दोनों वर्ष-आरंभों को आपस में न मिलाएँ। बताएँ कि आप विक्रम संवत् की कौन-सी गणना की बात कर रहे हैं।
- पुराने बक़ाया या अधूरे मामलों को, जो प्रेम से निपट सकते हों, अनदेखा न छोड़ें।
- दिन की शुरुआत झगड़े या कठोर शब्दों से न करें।
- व्यस्तता के कारण बड़ों का आशीर्वाद न छोड़ें। मिलना न हो सके तो फ़ोन भी ठीक है।
- हर रीति को अंतिम न मानें। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
गुजरात और दुनिया भर के गुजराती समाज में बेस्तु वरस वर्ष का सबसे बड़ा सामाजिक दिन है। परिवार मिठाई लेकर एक-दूसरे के घर जाते हैं और मंदिरों में अन्नकूट होता है। अहमदाबाद और सूरत जैसे नगरों के व्यापारी बही-खाते की रीतियाँ निभाते हैं। उत्तर भारत में यही दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का है, और काशी जैसे तीर्थों के मंदिरों में अन्नकूट के दर्शन होते हैं। महाराष्ट्र में यह पाडवा या बलिप्रतिपदा है। राजस्थान के व्यापारी, विशेषकर मारवाड़ी परिवार, भी दीपावली के आसपास नए बही-खातों से नया व्यापारिक वर्ष आरंभ करते हैं, पर रीतियाँ परिवार के अनुसार अलग हो सकती हैं।
जैन परिवार भी नववर्ष मनाते हैं और मंदिर जाते हैं। जैन वीर निर्वाण संवत् का नया वर्ष भी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से, यानी दीपावली के अगले दिन से, शुरू होता है।
आज के समय में
गुजरात से बाहर बसे परिवार और विदेश के गुजराती संगठन प्रायः निकट के सप्ताहांत में नववर्ष मिलन आयोजित करते हैं। तिथि कार्य-दिवस पर पड़े तो सुबह फ़ोन पर परिवार को शुभकामना दें, काम पर जाने से पहले दीप जलाएँ और मुख्य मिलन शाम या सप्ताहांत में रखें। मिठाई और फरसाण गुजराती दुकानों में मिलते हैं, या घर पर कोई सरल चीज़ बना लें। व्यापार हो तो नई बही या कॉपी शुरू करके छोटी प्रार्थना कर लें। फ़्लैट के गलियारे में रंगोली के स्टिकर लगाने से पहले इमारत के नियम देख लें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।