उगादि / गुड़ी पड़वा
Ugadi and Gudi Padwa
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर हिंदू नववर्ष का आरंभ, जो नीम-गुड़, गुड़ी, नए पंचांग और नई शुरुआत के साथ मनाया जाता है।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| गुरुवार, 19 मार्च 2026 | उगादि / गुड़ी पड़वा |
| बुधवार, 7 अप्रैल 2027 | उगादि / गुड़ी पड़वा |
| सोमवार, 27 मार्च 2028 | उगादि / गुड़ी पड़वा |
परिचय
उगादि और गुड़ी पड़वा एक ही नववर्ष दिवस के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम हैं। यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को पड़ता है, यानी चैत्र मास के उजले पखवाड़े की पहली तिथि को। "युग" का अर्थ है युग या काल-खंड और "आदि" का अर्थ है आरंभ, इसलिए उगादि का अर्थ है नए युग की शुरुआत।
उत्तर भारत में इसी दिन विक्रम संवत् का नया वर्ष, यानी नवसंवत्सर, शुरू होता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शक संवत् भी इसी दिन बदलता है। प्रतिपदा दिन के बीच शुरू या समाप्त हो सकती है, इसलिए पर्व उस दिन मनाया जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो। अपने शहर का दिन इस पंचांग में देख लें। उत्तर भारत में यही चैत्र नवरात्रि का पहला दिन भी है।
शुक्ल पक्ष की तिथि होने से यह दिन दोनों पद्धतियों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही कहलाता है। अंतर इतना है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की अमान्त पद्धति में यह चैत्र मास का पहला दिन है, जबकि उत्तर भारत की पूर्णिमान्त पद्धति में चैत्र मास फाल्गुन पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू हो चुका होता है और यह दिन नववर्ष का आरंभ है।
महत्व और कथाएँ
मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि की रचना शुरू की, और कुछ परंपराएँ विष्णु के मत्स्य अवतार को भी इन्हीं दिनों से जोड़ती हैं; मत्स्य जयंती चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। कुछ क्षेत्रीय कथाएँ इस दिन को श्रीराम के राज्याभिषेक से जोड़ती हैं, और राजा शालिवाहन की विजय से भी, जिनके नाम से शक संवत् की परंपरा जुड़ी बताई जाती है।
महाराष्ट्र में गुड़ी विजय की पताका और समृद्धि का प्रतीक है। तेलुगु और कन्नड़ क्षेत्रों में पंचांग श्रवण होता है, यानी नए वर्ष का पंचांग सुना जाता है, जिसमें वर्ष के संभावित फल बताए जाते हैं।
आध्यात्मिक अर्थ में यह दिन जीवन के सभी स्वादों को संतुलन से अपनाना सिखाता है: सुख, दुख, क्रोध, आश्चर्य, भय और अरुचि।
पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तिल का तेल लगाएँ और स्नान करें। घर साफ़ करके द्वार पर आम के पत्तों का तोरण और रंगोली सजाएँ।
- नए या स्वच्छ वस्त्र पहनें। महाराष्ट्र में मुख्य द्वार या खिड़की के बाहर गुड़ी खड़ी करें।
- दीप जलाकर कुलदेवता की पूजा करें। फूल, हल्दी, कुमकुम, अक्षत और नववर्ष के नैवेद्य का भोग लगाएँ।
- सबसे पहले परंपरागत मिश्रण का थोड़ा-सा भाग लें। आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक में यह उगादि पचड़ी है, जिसमें छह स्वाद होते हैं: नीम के फूल, कच्चा आम, गुड़, इमली, मिर्च या काली मिर्च और नमक। उत्तर भारत में कई परिवार नीम की कोंपलें मिश्री या गुड़ के साथ खाते हैं।
- परंपरा हो तो नए वर्ष का पंचांग सुनें और बड़ों से आशीर्वाद लें।
- उत्सव का भोजन सबके साथ करें। गुड़ी को सूर्यास्त के समय उतारें।
पूजन सामग्री
- गुड़ी के लिए बाँस की लकड़ी, चमकीला कपड़ा, नीम और आम के पत्ते, फूल, शक्कर की माला और उलटा रखने के लिए ताँबे या चाँदी का लोटा।
- पचड़ी के लिए नीम के फूल या पत्ते, कच्चा आम, गुड़, इमली, काली मिर्च और नमक।
- आम के पत्ते, रंगोली का सामान और सुबह की मालिश के लिए तिल का तेल।
- हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप।
व्रत और भोजन
यह भोज का दिन है, उपवास का नहीं। दक्षिण में उगादि पचड़ी, बोब्बट्लु (मीठी रोटी), पुलिहोरा, पायसम और आम के व्यंजन बनते हैं; महाराष्ट्र में पूरन पोली, श्रीखंड और पूरी। उत्तर भारत में जो परिवार इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का उपवास शुरू करते हैं, वे सात्त्विक व्रत का भोजन लेते हैं।
नीम कड़वा और तेज़ होता है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उसका बस थोड़ा स्वाद लें या अपने चिकित्सक की सलाह मानें।
क्या करें
- भोर से पहले घर साफ़ करें और आम के पत्तों तथा रंगोली से सजाएँ।
- पचड़ी या नीम-गुड़ का मिश्रण ध्यान से चखें।
- नए या ताज़े वस्त्र पहनें और बड़ों को आदर से प्रणाम करें।
- वर्ष के लिए एक छोटा अच्छा लक्ष्य तय करके लिख लें।
- मिठाई बाँटें और ज़रूरतमंद को भोजन या थोड़ा दान दें।
क्या न करें
- दिन की शुरुआत क्रोध या बहस से न करें।
- जिस परिवार में पूजा से पहले कुछ न खाने की रीति है, वहाँ पहले कुछ न खाएँ।
- गुड़ी ऐसी जगह न लगाएँ जहाँ हवा उसे गिरा दे; उसे मज़बूती से बाँधें।
- भोजन और प्रसाद को व्यर्थ न जाने दें।
- इसे भारत का एकमात्र नववर्ष न मानें; विशु, पुथांडु, बैसाखी और दीपावली के बाद का नववर्ष अन्य दिनों पर मनते हैं।
क्षेत्रीय परंपराएँ
- महाराष्ट्र और गोवा (गुड़ी पड़वा): गुड़ी खड़ी होती है, नीम-गुड़ खाया जाता है और शोभायात्राएँ निकलती हैं।
- आंध्र प्रदेश और तेलंगाना (उगादि): उगादि पचड़ी, बोब्बट्लु और पंचांग श्रवण।
- कर्नाटक (युगादि): नीम और गुड़ का बेवु-बेल्ला तथा ओब्बट्टू।
- कश्मीर (नवरेह): कश्मीरी पंडित थाल सजाते हैं, जिसमें चावल, दही, अखरोट, फूल, दर्पण, कलम और नया पंचांग रहता है। सुबह सबसे पहले उसी के दर्शन किए जाते हैं।
- सिंधी (चेटीचंड): झूलेलाल जयंती चैत्र शुक्ल द्वितीया को, यानी प्रायः नववर्ष के अगले दिन मनाई जाती है।
- उत्तर भारत: विक्रम संवत् का नववर्ष और चैत्र नवरात्रि की घटस्थापना।
परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।
आज के समय में
यह पर्व अक्सर कामकाजी दिन पड़ता है। सुबह तेल-स्नान, पूजा और थोड़ी-सी पचड़ी निपटा लें, और शाम को परिवार के साथ भोजन रखें। नीम के फूल न मिलें तो कुछ ताज़े या सूखे नीम के पत्ते ले लें। कच्चा आम, इमली और गुड़ आसानी से मिल जाते हैं। फ़्लैट में गुड़ी के लिए बालकनी में छोटी लकड़ी काफ़ी है, पर सोसायटी के नियम देखें और उसे मज़बूती से बाँधें। विदेश में तेलुगु, कन्नड़ और मराठी संगठन सप्ताहांत पर पंचांग श्रवण और सामूहिक भोज करते हैं।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।