ओड़िया पंचांग
ओडिशा का पंचांग: सौर वर्ष और चान्द्र पर्व-तिथियाँ, बारह महीने, महाविषुव संक्रांति और विक्रम संवत् से अंतर।
यह कैसा पंचांग है
ओडिशा और दुनिया भर के ओड़िया परिवारों का पंचांग दो चक्रों को मिलाता है। वर्ष और उसके मास सौर हैं: सूर्य जिस दिन नई राशि में जाता है, उस दिन नया मास लगता है। पर धार्मिक तिथियाँ चन्द्रमा से, यानी तिथि और चान्द्र मास से तय होती हैं। वार्षिक ओड़िया पंचांग को पंजिका कहते हैं, और उसमें सौर तारीख़ तथा चान्द्र तिथि दोनों दी जाती हैं।
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की पंचांग-परंपरा अपनी अलग और बहुत पुरानी है, और अनेक पर्वों की तिथियाँ मंदिर के पंचांग को ध्यान में रखकर तय होती हैं। चान्द्र मासों के बारे में अधिकतर विवरण ओड़िया पद्धति को पूर्णिमान्त बताते हैं, पर स्रोत एकमत नहीं हैं। जो पंजिका आपका परिवार या मंदिर मानता है, वही मानें।
संवत् और वर्ष-संख्या
ओडिशा का अपना संवत् है। स्रोतों के अनुसार उत्कलीय संवत् (अमली या ओड़िया संवत् भी कहते हैं) ईसवी सन् 592 से गिना जाता है, इसलिए उसकी संख्या ईसवी वर्ष से लगभग 592 कम होती है। अनेक स्रोत बताते हैं कि वह भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को आरंभ हुआ, जिस दिन को सुनिया कहते हैं, और वर्ष-संख्या वहीं बदलती है, सौर नववर्ष पर नहीं। इस पर स्रोत भिन्न हैं, इसलिए अपनी पंजिका में छपी संख्या ही मानें।
एक अलग गणना अंक वर्ष है, जो पुरी के गजपति राजा के शासन-वर्ष गिनती है और सुनिया पर बदलती है। वह जगन्नाथ मंदिर के आयोजनों में दिखती है।
बारह महीने
| क्रम | ओड़िया मास | सूर्य किस राशि में |
|---|---|---|
| 1 | बैशाख | मेष |
| 2 | ज्येष्ठ | वृषभ |
| 3 | आषाढ़ | मिथुन |
| 4 | श्रावण | कर्क |
| 5 | भाद्रव | सिंह |
| 6 | आश्विन | कन्या |
| 7 | कार्तिक | तुला |
| 8 | मार्गशिर | वृश्चिक |
| 9 | पौष | धनु |
| 10 | माघ | मकर |
| 11 | फाल्गुन | कुंभ |
| 12 | चैत्र | मीन |
नववर्ष
ओड़िया नववर्ष महाविषुव संक्रांति है, जिसे पणा संक्रांति भी कहते हैं। यह बैशाख 1 को पड़ती है, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। "पणा" नाम उस मीठे, शीतल पेय से आया है जो देवताओं को चढ़ाया जाता है और घर आने वालों को पिलाया जाता है। मंदिरों में भीड़ रहती है, और पंजिका का नया सौर वर्ष इसी दिन से गिना जाता है।
ओडिशा के विशेष पर्व
ओडिशा अधिकतर पर्व शेष भारत के साथ मनाता है, पर कई की पहचान बहुत स्थानीय है।
- रथयात्रा: पुरी में आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को, राज्य का सबसे प्रसिद्ध पर्व।
- राजा पर्व: तीन दिन का (कुछ लोग चौथा दिन, वसुमती स्नान, भी गिनते हैं), सूर्य के मिथुन में प्रवेश के आसपास, पृथ्वी और नारीत्व के सम्मान में। इसमें पीठा (चावल की मिठाइयाँ) बनती हैं और अनेक स्थानों पर झूले डाले जाते हैं।
- नुआखाई: पश्चिमी ओडिशा में भाद्रपद शुक्ल पंचमी को, जब मौसम के नए चावल का पहला भोग देवता को लगाकर बाँटा जाता है।
- कार्तिक पूर्णिमा: बोइत बंदना में लोग कागज़ और पत्तों की छोटी नावें बहाकर ओड़िया व्यापारियों की प्राचीन समुद्र-यात्राओं को याद करते हैं।
- कुमार पूर्णिमा: आश्विन की पूर्णिमा, चन्द्रमा का पर्व, विशेषकर कन्याओं और युवाओं का।
दिन की गणना
दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है। राशि-प्रवेश किस दिन गिना जाए, यह एक नियम तय करता है, इसलिए पंजिकाओं में मास का आरंभ एक दिन भिन्न हो सकता है। पुरी जैसे मंदिर कभी-कभी अपनी तिथि स्वयं घोषित करते हैं; मंदिर के पर्वों के लिए वही मानें।
मुख्य पंचांग से अंतर
- ओड़िया वर्ष सूर्य के मेष में प्रवेश से शुरू होता है, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नहीं। पहला मास बैशाख है और अंतिम चैत्र।
- मास सौर हैं और सौर तिथि से शुरू होते हैं, फिर भी पर्व मुख्य पंचांग की तरह चान्द्र तिथि पर पड़ते हैं।
- संवत् उत्कलीय है, ईसवी वर्ष से लगभग 592 कम; विक्रम संवत् की तरह 56 या 57 अधिक नहीं।
रथयात्रा, कार्तिक पूर्णिमा और दीपावली जैसे चान्द्र पर्व मुख्य पंचांग वाली तिथि पर ही पड़ते हैं, इसलिए साइट की सामान्य तिथियाँ लागू होती हैं।