छठ पूजा
Chhath Puja
छठ चार दिन का कठिन व्रत है, जिसमें व्रती उपवास रखकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और सूर्य तथा छठी मइया के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
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| तारीख़ | पर्व या अवसर |
|---|---|
| रविवार, 15 नवंबर 2026 | छठ पूजा |
| गुरुवार, 4 नवंबर 2027 | छठ पूजा |
| सोमवार, 23 अक्टूबर 2028 | छठ पूजा |
परिचय
छठ पूजा प्राचीन और अत्यंत कठिन व्रतों में गिनी जाती है। यह सूर्य देव और छठी मइया (षष्ठी देवी) को समर्पित है, जिन्हें संतान की रक्षक माता माना जाता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई में इसका विशेष महत्व है।
मुख्य दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी है। शुक्ल पक्ष की तिथि होने के कारण पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में महीना कार्तिक ही रहता है। पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चार दिन चलता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को इसका छोटा रूप चैती छठ मनाया जाता है।
महत्व और कथाएँ
भारत में सूर्य की उपासना बहुत पुरानी है। छठ में सूर्य के प्रति आभार प्रकट किया जाता है और स्वास्थ्य, संतान तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। व्रती (लोक में परवैतिन) अधिकतर महिलाएँ होती हैं, पर पुरुष भी व्रत करते हैं।
कथाएँ कई हैं। एक लोक कथा में राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की मृत संतान को षष्ठी देवी की कृपा से जीवन मिला। लोक मान्यता है कि सीता जी ने भी छठ किया था; मुंगेर (बिहार) का सीताचरण इसी से जुड़ा माना जाता है। कुछ कथाएँ द्रौपदी और पांडवों से, तो कुछ सूर्यपुत्र कर्ण से जुड़ती हैं। परिवार अपने बड़ों से मिली कथा मानते हैं; पर्व का सार आभार और अनुशासन है। इसमें डूबते और उगते, दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, और किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती।
पूजा विधि
छठ में बहुत सावधानी की ज़रूरत होती है, इसलिए अपने परिवार के बड़ों से विधि सीखकर उसी का पालन करें।
- पहला दिन, नहाय-खाय (चतुर्थी): व्रती गंगा या स्वच्छ जल में स्नान करते हैं और घर की सफाई करते हैं। भोजन सादा होता है: घी में बनी लौकी की सब्ज़ी, चने की दाल और चावल, बिना प्याज-लहसुन के।
- दूसरा दिन, खरना (पंचमी): दिन भर उपवास रहता है, कई परिवारों में निर्जल। शाम की पूजा के बाद गुड़ और चावल की खीर (रसियाव) और रोटी का प्रसाद खाया और बाँटा जाता है। इसके बाद लगभग 36 घंटे का निर्जल व्रत शुरू होता है।
- तीसरा दिन, संध्या अर्घ्य (षष्ठी): ठेकुआ (गुड़ और आटे का पकवान), फल और गन्ना बाँस के सूप या डाला में सजाए जाते हैं। दोपहर बाद परिवार घाट जाता है, और सूर्यास्त के समय व्रती जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
- षष्ठी की रात: कई परिवार छठ के गीत गाते हैं, और मन्नत पूरी होने पर कोसी भरी जाती है, जिसमें गन्ने के घेरे के नीचे दीप सजते हैं।
- चौथा दिन, उषा अर्घ्य (सप्तमी): भोर से पहले परिवार फिर घाट पहुँचता है, और व्रती जल में खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
- अंतिम अर्घ्य के बाद व्रती प्रसाद और जल से पारण करते हैं।
पूजन सामग्री
- बाँस के सूप या डाला और नया स्वच्छ वस्त्र
- ठेकुआ और ऋतु के फल: केला, नारियल, नींबू, अनार, सिंघाड़ा
- पूरे गन्ने के डंठल
- मिट्टी के दीप, घी, धूप और रोली
- चावल, गुड़, गेहूँ का आटा और आम की लकड़ी
व्रत और भोजन
खरना के बाद का उपवास निर्जल होता है, कई परिवारों में लगभग 36 घंटे का, और यह शरीर के लिए बहुत कठिन है। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उतना ही उपवास रखें जितना उनके चिकित्सक उचित समझें। प्रसाद स्वच्छ रसोई में पूरी शुद्धता से बनता है, उसमें प्याज-लहसुन नहीं पड़ता, और अर्पण से पहले कुछ भी चखा नहीं जाता।
क्या करें
- पूरे पर्व में घर, रसोई और बर्तन बिल्कुल साफ़ रखें।
- स्नान के बाद ही प्रसाद बनाएँ और अर्पण से पहले न चखें।
- स्वच्छ और ताज़े धुले वस्त्र पहनें।
- अर्घ्य देने की विधि बड़ों से पूछकर करें।
- घाट पर जल्दी पहुँचें और गरम तथा सूखे कपड़े साथ रखें।
- व्रती का हाथ बँटाएँ और घाट स्वच्छ रखें।
क्या न करें
- इन दिनों मांसाहार, प्याज और लहसुन न खाएँ।
- हाथ धोए बिना प्रसाद की सामग्री न छुएँ, और सूप में टूटे या चखे हुए फल न रखें।
- घाट पर धक्का-मुक्की या ऊँची आवाज़ में शोर न करें।
- पूजा सामग्री और प्लास्टिक जल में न डालें।
- स्वास्थ्य खतरे में हो तो व्रत के लिए अड़ें नहीं; चिकित्सक और बड़ों से सलाह लें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
बिहार में पूरे गाँव गंगा, सोन और तालाबों के घाटों पर जुटते हैं, और भोजपुरी, मैथिली तथा मगही में छठ के गीत गूँजते हैं। मिथिला में रसोई और अर्पण के नियम बहुत कड़े होते हैं। काशी के घाटों पर बड़ी संख्या में परिवार अर्घ्य देते हैं, और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे डाला छठ भी कहते हैं। दिल्ली जैसे शहरों में सामुदायिक घाट बनाए जाते हैं, और मुंबई में लोग समुद्र तटों और झीलों पर जुटते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति मानें।
आज के समय में
जहाँ नदी पास में नहीं है, वहाँ नगर प्रशासन या समितियाँ कृत्रिम तालाब या बड़ी टंकियाँ बनवाती हैं, और वहीं जाना सुरक्षित रहता है। फ्लैट में रहने वाले कई परिवार बड़े टब में जल भरकर अर्घ्य देते हैं। निर्जल उपवास में कमज़ोरी आ सकती है, इसलिए गहरे या ठंडे जल में अकेले न उतरें, कोई परिजन पास रहे और बाद के लिए गरम पेय तैयार रखें। विदेश में बसे परिवार जलाशय और दीप के स्थानीय नियम पहले जान लें।
संबंधित पृष्ठ
परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।