रथ सप्तमी

Ratha Saptami

माघ शुक्ल सप्तमी पर सूर्य देव और उनके सात घोड़ों वाले रथ की पूजा, जब दिन गर्म और उजले होने लगते हैं।

देवता: सूर्य देवअवधि: एक दिनऋतु: शिशिर का अंत, वसंत का आगमनअन्य नाम: सूर्य जयंती, माघ सप्तमी, अचला सप्तमी

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तारीख़पर्व या अवसर
रविवार, 25 जनवरी 2026रथ सप्तमी
शनिवार, 13 फ़रवरी 2027रथ सप्तमी
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2028रथ सप्तमी

परिचय

रथ सप्तमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। रथ का अर्थ गाड़ी है और सप्तमी सातवीं तिथि। इस दिन सूर्य देव के उस रथ को याद किया जाता है, जिसे सात घोड़े खींचते हैं। इसे सूर्य जयंती यानी सूर्य के प्रकट होने का दिन भी कहते हैं। उत्तर भारत में यही दिन अचला सप्तमी या माघ सप्तमी कहलाता है।

यह पर्व मकर संक्रांति के कुछ सप्ताह बाद आता है। मान्यता है कि अब सूर्य का रथ और गर्म, और उजले दिनों की ओर बढ़ चला है। माघ का शुक्ल पक्ष पूर्णिमान्त और अमान्त, दोनों गणनाओं में एक ही है, इसलिए पूरे देश में यह एक ही दिन पड़ता है। पूजा का मुख्य समय सूर्योदय है, इसलिए अपने शहर का समय इस पंचांग में देख लें।

महत्व और कथाएँ

सात घोड़ों को कई तरह से समझाया जाता है: प्रकाश के सात रंग, सप्ताह के सात वार या सात वैदिक छंद। रथ का एक पहिया वर्ष माना गया है और उसकी बारह तीलियाँ बारह महीने हैं।

वेदों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, क्योंकि उनका प्रकाश हर प्राणी रोज़ देखता है। लोग इस दिन उनसे स्वास्थ्य, नेत्र-ज्योति और ऊर्जा की प्रार्थना करते हैं। वाल्मीकि रामायण में अगस्त्य ऋषि ने युद्ध से पहले श्रीराम को आदित्य हृदय स्तोत्र सुनाया था, जो आज भी सूर्य उपासना का प्रिय पाठ है।

दक्षिण भारत में एक विशेष रीति है: स्नान से पहले आक (मदार) के सात पत्ते, थोड़े चावल और हल्दी के साथ सिर और कंधों पर रखे जाते हैं। मान्यता है कि इससे बीते वर्ष के दोषों की शुद्धि होती है। यह आस्था और पारिवारिक परंपरा की बात है।

पूजा विधि

  1. सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। परिवार की रीति हो तो आक के पत्तों के साथ स्नान करें।
  2. आँगन में या थाली में चावल के आटे अथवा रंगों से सात घोड़ों वाले रथ का छोटा चौक बनाएँ।
  3. पूर्व की ओर मुख करके ताँबे या स्वच्छ पात्र से उगते सूर्य को अर्घ्य दें। साथ में लाल फूल और अक्षत चढ़ाएँ। जल की धार को देखें, सूर्य को सीधे न देखें।
  4. धूप में नई मिट्टी की हाँड़ी में दूध, चावल और गुड़ पकाएँ और उसे उफनने दें। कई स्थानों पर यही मुख्य भोग है।
  5. "ॐ सूर्याय नमः", आदित्य हृदय स्तोत्र या गायत्री मंत्र का पाठ करें। सही उच्चारण के लिए किसी विद्वान या पुरोहित से पूछ लें।
  6. मीठे भोग का नैवेद्य लगाएँ, दीप जलाकर आरती करें और प्रसाद बाँटें।

पूजन सामग्री

  • अर्घ्य के लिए ताँबे का लोटा या स्वच्छ पात्र।
  • आक के सात पत्ते, या वे पत्ते जो आपकी परंपरा में चलते हैं।
  • लाल फूल, रोली, अक्षत और हल्दी।
  • रंगोली के लिए चावल का आटा या रंग।
  • नई हाँड़ी, दूध, चावल और गुड़।
  • दीप, धूप और कपूर।

व्रत और भोजन

उपवास आवश्यक नहीं है। कई लोग सूर्य पूजा के बाद ही भोजन करते हैं और कुछ दोपहर तक हल्का उपवास रखते हैं। मुख्य प्रसाद दूध-गुड़ की खीर या मीठे चावल हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग उपवास केवल अपने चिकित्सक की अनुमति से रखें।

क्या करें

  • सुबह जल्दी उठें और पहली धूप का स्वागत करें।
  • शांत, स्वच्छ स्थान पर खड़े होकर सूर्य को जल चढ़ाएँ।
  • बच्चों के साथ रथ की रंगोली बनाएँ और सात घोड़ों का अर्थ समझाएँ।
  • सूर्य नमस्कार या हल्का व्यायाम करें, यदि वह आपकी दिनचर्या में है।
  • प्रकाश और स्वास्थ्य के लिए कृतज्ञ रहें और प्रसाद सबमें बाँटें।

क्या न करें

  • सूर्य को देर तक सीधे न देखें, इससे आँखों को हानि हो सकती है।
  • आक के रस से त्वचा या आँखों में जलन हो सकती है, इसलिए असुविधा हो तो उसके पत्ते न लें।
  • जिस परिवार में सूर्य पूजा से पहले कुछ न खाने की रीति है, वहाँ पहले भोजन न करें।
  • आज के दिन झगड़े और कटु वचन से बचें।
  • भोजन और प्रसाद को व्यर्थ न जाने दें।

क्षेत्रीय परंपराएँ

  • उत्तर प्रदेश और बिहार: अचला सप्तमी पर कई लोग गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते और दान करते हैं। काशी खंड में वर्णित काशी के द्वादश आदित्य (बारह सूर्य-स्थल) प्रसिद्ध हैं, जहाँ सूर्य उपासक दर्शन करने जाते हैं; सूचियाँ ग्रंथों और परंपराओं में थोड़ी अलग मिलती हैं।
  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: यह बड़ा पर्व है। धूप में दूध-गुड़ का पोंगल बनता है और आँगन में रथ की रंगोली सजती है। तिरुमला में इस दिन एक दिन का ब्रह्मोत्सव होता है, जिसमें भगवान की अनेक वाहन-शोभायात्राएँ निकलती हैं।
  • कर्नाटक और तमिलनाडु: आक के पत्तों के साथ स्नान और सूर्य की प्रार्थना होती है।
  • ओडिशा: माघ सप्तमी पर कोणार्क के सूर्य मंदिर के पास चन्द्रभागा मेले में भक्त जुटते हैं।

परंपराएँ अलग-अलग हैं; अपने परिवार की रीति या पुरोहित की सलाह मानें।

आज के समय में

फ़्लैट में रहते हों तो सूर्योदय का अर्घ्य खिड़की, छत या बालकनी से दे सकते हैं। हाँड़ी न हो तो स्टील या ताँबे के छोटे पतीले में दूध-गुड़ का भोग रसोई में पकाकर कुछ देर धूप में रख दें। दफ़्तर जाना हो तो सुबह का अर्घ्य और छोटा पाठ ही पर्याप्त है। आक के पत्ते न मिलें तो उन्हें छोड़ देना ठीक है। विदेश में जहाँ सर्दियों में सूर्योदय देर से होता है, वहाँ खिड़की से पहली किरणों की ओर खड़े होकर जल अर्पित करें।

संबंधित पृष्ठ

परंपराएँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह पृष्ठ प्रचलित रीति बताता है; अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह को ही मानें।

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